🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷


दिनांक  - -    १५ अक्तूबर २०२२ ईस्वी 

 

दिन  - -  शनिवार 


  🌖 तिथि - - -  षष्ठी ( पूरी रात्रि )


🪐 नक्षत्र -  - मृगशीर्ष ( २३:३२ तक तत्पश्चात आर्द्रा)


पक्ष  - -  कृष्ण 


 मास  - -   कार्तिक 


ऋतु  - -  शरद 

,  

सूर्य  - -  दक्षिणायन


🌞 सूर्योदय  - - दिल्ली में प्रातः  ६:२२ पर


🌞 सूर्यास्त  - -  १७:५२ पर 


🌖 चन्द्रोदय  - -  २१:३९  पर 


🌖चन्द्रास्त  - -  ११:२७ पर 


सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२३


कलयुगाब्द  - - ५१२३


विक्रम संवत्  - - २०७९


शक संवत्  - - १९४४


दयानंदाब्द  - - १९८


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🚩‼️ओ३म्‼️🚩


🔥 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।

अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ।। 

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   जिसने मन को इच्छाओं को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा।


जब कोई प्रशंसा करता है, तब हमें लगता है कि सुख मिल रहा है। ओर जब कोई निंदा करता है, तब लगता है कि दुख मिल रहा है। लेकिन सुख और दुख का मूल कारण हमारे भीतर होता है वह है हमारा अहंकार। जैसे-जैसे हम सशक्त होते जाते हैं, यह जरूरी हो जाता है कि हम ज्यादा उदार हृदय और जिम्मेदार बनें, न कि प्रतिक्रियावादी या बेबस। किसी ने सही कहा है कि यदि हम जीवन को एक संभावना के रूप में देखते हैं, तो हम हर जगह संभावना ही देखेंगे। यदि हम जीवन को एक समस्या के रूप में देखते हैं, तो हर ओर हमें समस्याएं ही समस्याएं नजर आएंगी। इसलिए हमारे लिए जरूरी है कि हम समाधान का हिस्सा बनें, समस्या का नहीं। 


   याद रखें कामनाओं का कोई अंत नहीं होता है, हां, कामनाओं की पूर्ति करते करते व्यक्ति का अंत अवश्य हो जाता है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं का दास नहीं बने, बल्कि अपनी इच्छाओं को अपना दास बनाए, तभी उसका जीवन सार्थक और खास होगा। जो अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वह सतत अपने परम शत्रु के साथ निवास करता है और इस तरह उसका जीवन तथा लक्ष्य दोनों ही नष्ट हो जाते हैं ।


   जब तक मन अविजित शत्रु बना रहता है, तब तक मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आज्ञाओं का पालन करना होता है। किन्तु जब मन पर विजय प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य इच्छानुसार उस ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है जो सब के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित है।


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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩


   🌷 ओ३म् अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृँह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । धर्त्रमसि दिवं दृँह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामि चित स्थोर्ध्वचितो भृगूणामड़्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ।। ( यजुर्वेद १\१८ )


     💐 अर्थ  ;-  इस मंच में  श्लेषालंकार है । ईश्वर का यह उपदेश है कि हे मनुष्यो ! तुम विद्वानों की उन्नति तथा मूर्खपन का नाश वा सब शत्रुओं की निवृत्ति से राज्य बढाने के लिए वेदविद्या का ग्रहण करो तथा वृद्धि का हेतु अग्नि व सब का धारण करनेवाला वायु, अग्निमय सूर्य और ईश्वर उन्हें सब दिशाओं में व्याप्त जानकर यज्ञसिद्धि वा विमान आदि यानों की रचना धर्म के साथ करो तथा इनसे इनको सिद्ध करके दुःखों को दूर करके शत्रुओं को जीतो ।।


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 🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- त्रिविंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२३ ) सृष्ट्यब्दे】【 नवसप्तत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०७९ ) वैक्रमाब्दे 】 【 अष्टनवत्यधिकशततमे ( १९८ ) दयानन्दाब्दे, नल-संवत्सरे,  रवि- दक्षिणयाने शरद -ऋतौ, कार्तिक -मासे , कृष्ण - पक्षे, - षष्ठयां  तिथौ,  -     मृगशीर्ष  नक्षत्रे, शनिवासरे , तदनुसार  १५ अक्टूबर  , २०२२ ईस्वी , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे 

आर्यावर्तान्तर्गते.....प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,  रोग, शोक, निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे


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