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आज का वेद मंत्र 🚩

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️ 🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷 दिनांक  - -    ०१ अक्तूबर २०२२ ईस्वी    दिन  - -  शनिवार    🌒 तिथि - - -षष्ठी ( २०:४९ तक तत्पश्चात सप्तमी ) 🪐 नक्षत्र -  -  ज्येष्ठा ( २८:२८ तक तत्पश्चात मूल ) पक्ष  - -  शुक्ल    मास  - -   आश्विन  ऋतु  - -  शरद  ,   सूर्य  - -  दक्षिणायन 🌞 सूर्योदय  - - दिल्ली में प्रातः  ६:१८ पर 🌞 सूर्यास्त  - -  १८:०४ पर  🌒 चन्द्रोदय  - -  ११:२९  पर  🌒चन्द्रास्त  - -  २२:०७  पर  सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२३ कलयुगाब्द  - - ५१२३ विक्रम संवत्  - - २०७९ शक संवत्  - - १९४४ दयानंदाब्द  - - १९८ 🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀 🚩‼️ओ३म्‼️🚩 🔥 क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।। भगवद्गीता २\६३    क्रोध करने से मूढ़ता उत्पन्न होती है। मूढ़ता से स्मृति में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। स्मृति में भ्रम उत्पन्न होने से बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से फिर मनुष्य का पूर्णतः पतन हो जाता है। जो मनुष्य क्रोध करता है उसे बाद में दुखी होना पड़ता है। क्रोध मनुष्य के सोचने समझने की शक्ति को खत्म कर

नेपाल के शहीद

 नेपाल के शहीद  आर्यवीर शुक्रराज शास्त्री का बलिदान  लेखक :- श्रद्धेय स्वामी ओमानंद सरस्वती  पुस्तक :- आर्यसमाज के बलिदान  प्रस्तुति :- अमित सिवाहा               नेपाल राज्य आर्यराज्य होते हुये भी पौराणिक पाखण्डियों के जाल में फंसा हुआ था । आज तक इसी कारण विजय दशमी के पवित्र पर्व पर हजारों मूक निरपराध भैंसे बकरे आदि प्राणियों की बाल कल्पित मिथ्या पत्थर के देवी देवताओं पर चढ़ाई जाती है । इस वाम मार्ग के नंगे बीभत्स नृत्य से उपासना के पवित्र मन्दिरों में भगवान की पूजा के नाम पर रक्त की धारा बहती है । आर्यसमाज के लिये इस प्रकार के अत्याचार असह्य हैं अतः आर्यसमाज के वीरों ने इस प्रकार के दुष्कृत्य के विरुद्ध नेपाल में भी मोर्चा लेना प्रारम्भ किया । आर्यसमाज से प्रभावित एक नाथ सम्प्रदाय के सन्त स्वामी ब्रह्मनाथ जी थे , जिन का जन्म इस आर्य राज्य नेपाल में हुआ था । वे भारत वर्ष में भी भ्रमणार्थ व तीर्थयात्रा के लिये आते जाते रहते थे । वे आर्यसमाज के सच्चे पवित्र सिद्धान्तों के व्याख्यान सुनकर प्रभावित हुये और आर्यसमाजी बन गये । उन्होंने नेपाली भाषा में सत्यार्थप्रकाश छपवाया किन्तु इस पवित्र ग

पुरुष सूक्त पढ़ और सुन कर लाभ लें व शंकायें दूर करें।

 🌺 पुरुष सूक्त पढ़ और सुन कर लाभ लें व शंकायें दूर करें। (ऋग्वेद  १०।९०।०१ से १६) 🔥सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङुलम् ॥१॥ 🌺 भावार्थ - पुरुष-सूक्त (पुरुष) पुर में व्यापक शक्ति वाले राजा के तुल्य समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापक परम पुरुप परमात्मा (सहस्र-शीपः) हजारों शिरों वाला है। (सः) वह (भूमि) सब जगत् के उत्पादक, सर्वाश्रय प्रकृति को ( विश्वतः धृत्वा ) सब ओर से, सब प्रकार से चरण कर, व्याप कर (देश अंगुलम् अति अतिष्ठत् ) दश अंगुल अतिक्रमण करके विराजता है। अंगुल यह इन्द्रिय,वा देह को उपलक्षण है, अर्थात् वह दश इन्द्रियों के भोग और कर्म के क्षेत्र से बाहर है। वह न कर्म-बन्धन में बद्ध रहता है और न मन का विषय है। समस्त संसार के शिर उसके शिर हैं और समस्त संसार के चक्षु और चरण भी उसी के चक्षु और चरणवत् हैं । सर्वत्र उसी की दर्शन शक्ति और गतिशक्ति कार्य कर रही है।  🔥 पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥ 🌺 भावार्थ - (पुरुपः एव इदं सर्वम्) यह सब कुछ वह पुरुष ही है। ( यद् भूतं यत् च भव्यम् ) ये जो भूत अर्थात् उ

दलित नेता जब बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर पर भाषण देते है

 दलित नेता जब बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर पर भाषण देते है तब बड़ी धूर्तता से उस व्यक्ति का नाम ही नही लेते जिसने उन्हें "बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर" बनाया | महाराजा सयाजी गायकवाड़ ने उन्हें  ब्रिटेन और अमेरिका पढने के लिए पूरा खर्चा दिया | यहाँ तक भी रहने का इंतजाम भी महाराजा ने किया था और तो और जब बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर PHD करके वापस आये तो कोई भी उन्हें नौकरी नही दे रहा था, तब एक बार फिर महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनका साथ दिया और उन्हें अपनी रियासत का महामंत्री नियुक्त किया और उस जमाने में उन्हें दस हजार रुपये महीने वेतन दिया जो आज दस करोड़ के बराबर है | लेकिन गाँव गाँव जो तथाकथित अम्बेडकरवादी घूमते है वो दलितों को ये बात नही बताते | वो तो छोड़िए उनका पूरा नाम तक नहीं बताते।  .  वड़ोदरा नरेश श्रीमान् महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ [1863-1939 ई.] का प्रेरक वक्तव्य ● ------------------------ ● जो धर्म समाज का हित करता है वह आदरणीय होता है। ● जहां बुद्वि का प्रमाण नहीं माना जाता उस धर्म को प्रजा मान्य नहीं करती। ● आज जिसे हम हिन्दू धर्म मानते हैं वह वस्तुतः हिन्दू धर्म नहीं। ● वैदिक

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा

 स्वामी दयानन्द और गोरक्षा                                                                * गावो विश्वस्य मातर: * जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है। प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है।  इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।                  

आदिवासी समाज और ईसाइयत

 आदिवासी समाज और ईसाइयत  #डॉविवेकआर्य   भारत जैसे बड़े देश में करोड़ों लोग वन क्षेत्र में सदियों से निवास करते है। कुछ लोग उन्हें आदिवासी कहते है क्योंकि उनका मानना है कि आदिकाल में सबसे प्रथम जनजाति इन्हीं के समान थी। कालांतर में लोग विकसित होकर शहरों में बसते गए जबकि आदिवासी वैसे के वैसे ही रहे। हम इसे भ्रान्ति मानते है। इसलिए आदिवासी के स्थान पर वनवासी उपयुक्त शब्द है। भारत में अधिकांश आदिवासी समाज झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल और पूर्वोत्तर आदि राज्यों में रहते हैं। यह जनता अत्यंत निर्धन, शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा आदि सुविधाओं से वंचित हैं। भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी विकास से कोसो दूर है। ऐसे में ईसाई मिशनरियों के लिए अत्यंत उपजाऊ खेत है, जिसमें ईसा मसीह की खेती करी जा सके। यह स्थिति आज एकदम से नहीं बनी है। इसी अत्यंत सुनियोजित रूप में अंग्रेज सरकार, ईसाई चर्च और अंग्रेज व्यापारियों ने मिलकर पिछले 200 वर्षों में निर्मित किया।  1857 में प्रथम संघर्ष के असफल होने के पश्चात हज़ारों कारण हज़ारों क्रांतिकारियों ने जंगलों को अपना घर बनाया और छापे-मार युद्ध के माध्यम

जय गौमाता एक बार अवश्य पढ़ें।

 जय गौमाता एक बार अवश्य पढ़ें। राजीव दीक्षित ने सारे आंकड़े कोर्ट के सामने रखे.  एक स्वस्थ गाय का वजन साढ़े तीन क्विंटल होता है।  लेकिन, जब इसे काटा जाता है, तो केवल 70 किलो मांस ही प्राप्त होता है।  जब एक किलो बीफ का निर्यात किया जाता है, तो आपको 5050 मिलते हैं, यानी रु। 3,500.  हड्डियों के लिए 25 लीटर खून, 1,500 रुपये से 2,000 रुपये और 1,000 रुपये से 1,200 रुपये।  इसका मतलब यह हुआ कि एक कसाई जो गाय को मारकर उसका मांस, खून और हड्डियाँ बेचता है उसे अधिकतम 7,000 रुपये ही मिलेंगे। (और ये आंकड़े स्वस्थ गायों के लिए हैं। बूढ़ी गायों को इतनी आय नहीं मिलती है।) लेकिन, अगर आप उसे जीवित रखते हैं तो आपको कितना पैसा मिलेगा? अब उनके आंकड़े देखिए। एक गाय प्रतिदिन 10 किलो गोबर और 3 लीटर गोमूत्र देती है। 1 किलो गोबर से 33 किलो खाद मिलती है।  इसे जैविक खाद कहते हैं।  न्यायाधीश ने आश्चर्य से पूछा, "यह कैसे संभव है?"  दीक्षित ने कहा, "हमें समय और स्थान दो।  हम इसे साबित करेंगे।"  कोर्ट की इजाजत से दीक्षित ने अपनी बात साबित कर दी.  उन्होंने न्यायाधीश से कहा, "अब आई आर सी  चलो शो