Ved-Mantra MEMORIZE Challenge

 Ved-Mantra MEMORIZE Challenge

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नवरात्री आ गयी 

नवरात्री के नौ दिन पौराणिक व्यक्ति नियम से (1)उपवास करेंगे, (2) नित्य माताजी के मन्दिर जायेंगे, घंटा बजायेंगे (2) चंडी-पाठ करेंगे, दुर्गा सप्तशती  पढेंगे आदि आदि 

लेकिन ......

लेकिन 

आप क्या करेंगे ????

आप पौराणिक हों या वैदिक !!!! लेकिन खाली न बैठें !!!!

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खाली बैठने वाले को वेद में दस्यु कहा है | ऋग्वेद 10/22/8 मन्त्र में कहा है "अकर्मा दस्यु:" अर्थात् कर्म न करने वाला ...... हम तो आर्य हैं और आर्य का मतलब होता है श्रेष्ठ | श्रेष्ठ वह व्यक्ति होता है जो निर्माण करे....कुछ नया सीखे, आगे बढ़े आदि 

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तो नौ दिनों में हम क्या करें ?

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नौ (9) दिनों में हम वेद के नौ (9) मन्त्रों को याद करेंगे | 

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वेद के बहुत सारे मन्त्रों में से कोई भी नौ (9) मन्त्र चुन लीजिये और याद कीजिये | प्रतिदिन एक मन्त्र याद कीजिये | 

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यदि मन्त्र पहले से याद हैं तो Challenge के तीन स्तर नीचे अनुसार हैं उसमें अपने आपको परखें  :-

मान लीजिये, आपको ईश्वर-स्तुति-प्रार्थना-उपासना के आठ मन्त्र और गायत्री मन्त्र याद है तो हो गए नौ | इन नौ मन्त्रों को नीचे के चुनौती स्तर से परखें |

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१) 

कण्ठस्थ मन्त्रों को पुस्तक के साथ पढ़ें, पुस्तक सामने रख कर धीरे-धीरे मन्त्र देख कर पढ़ें और स्वयं देखें की कहीं गलती तो नहीं हो रही, कहीं छोटी मात्रा (ह्रस्व) को बड़ी मात्रा (दीर्घ) न बोलें, आधे अक्षर को पूरा न बोलें आदि-आदि | यदि कोई उच्चारण दोष हो तो सुधारें | 

२)

यदि पहले स्तर को पार कर लें तो ......चुनौती का दूसरा स्तर है मन्त्र याद करने के बाद उसे लिख कर देखें की कहीं दोष तो नहीं है | जो पढ़ा है वही याद है या कुछ और ............और जो याद है वही लिखा जा रहा है या कुछ और ? ऐसे करके अपने आपको परखें | परखेंगे तो निखरेंगे और बन जायेंगे आर्य | महात्मा प्रभुआश्रित जी ध्यान की अलग-अलग विधियों में एक विधि यह भी बतलाते हैं की साधक अपनी बन्द आँखों के सामने मन्त्र लिखे और ओ३म् जाप करता रहे | ठीक इसी तरह आप भी कागज पर मन्त्र लिख कर देखें और फिर मिलान करें पुस्तक के साथ | यदि कोई दोष हो तो उसे सुधारें, फिर दुबारा लिखें और तब तक यही क्रम जारी रखें जब तक आपका लेखन शुद्ध न हो जाए | 

३) 

चुनौती का अगला स्तर है मन्त्र के अर्थ को याद करना, अर्थ को समझना, उसकी व्याख्या को पढ़ना, मनन करना आदि |

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तो आइये ! नवरात्री के नौ दिनों में नीचे के चुने हुए मन्त्र याद करें और अपना जीवन वेद की रक्षा में लगायें | 

1) 

ओ३म् त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ |

अधा ते सुम्नमीमहे | (ऋग्वेद 8/98/11)

अर्थात् :- हे बहुविध उद्यमों को कर, सबको बसाने वाले परमात्मन् ! तू ही हमारा जनक है और तू ही हमारी जननी है, अतः हम तेरा अपने प्रति सु-मन, सुष्ठु-मन चाहते हैं, तेरी अपने प्रति शुभ-कामनाएँ (Good Wishes) चाहते हैं |

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2) 

ओ३म् उपह्वरे गिरिणां संगथे च नदीनाम् |

धिया विप्रो अजायत || (ऋग्वेद 8/6/28)

अर्थात् :- पर्वतों के समीप वा पर्वतों की उपत्यकाओं में और नदियों के संगम पर ध्यान करने अर्थात् योगाभ्यास करने से मनुष्य विप्र-ज्ञानी, मेधावी, विवेकी, ब्रह्मज्ञानी हो जाता है | 

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3) 

मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः |

मान्तः स्थुर्नो अरातय: || (ऋग्वेद 10/57/1)

अर्थात् :- हे परमेश्वर ! हम सत्पथ से कभी विचलित न हों | हम ऐश्वर्यशाली हो कर यज्ञ आदि शुभ कार्यों से कभी विचलित न हों | यज्ञादि शुभ कर्मों में बाधा उत्पन्न करने वाले अराति भाव - अदानभाव  , स्वार्थभाव या काम-क्रोध आदि शत्रु हमारे भीतर न रहें |

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4) 

ओ३म् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च 

नमः शङ्कराय च मयस्कराय च 

नमः शिवाय च शिवतराय च || यजुर्वेद अध्याय 16 मन्त्र 41

अर्थात् :- जो सुखस्वरूप संसार के उत्तम सुखों का देनेवाला कल्याण का कर्त्ता मोक्षस्वरूप , धर्मयुक्त कामों को ही करनेवाला अपने भक्तों को सुख का देने वाला और धर्म-कामों में युक्त करनेवाला, अत्यन्त मङ्गल स्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्षसुख देने हारा है उसको हमारा बारम्बार नमस्कार हो | 

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5)

यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः |

उशतीरिव मातर: || (सामवेद  1838)

अर्थात् :- हे सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी प्रभो ! जो आपका अत्यन्त कल्याणकारी रस है, उसका इस मानव चोले में हमें बच्चों का कल्याण करना चाहनेवाली माताओं के समान सेवन कराओ |

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6)

उपहूतो वाचस्पतिरूपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम् 

सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि || (अथर्ववेद 1/1/4)

अर्थात् :- परमात्मा या आचार्य को हमने अपनी समीपता के लिए बुलाया है, वाचस्पति भी हमको अपने समीप बुलाकर रखे, सुने हुए ज्ञान के साथ हमारा संयोग रहे, ज्ञान से मेरा वियोग न हो |

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7)

अनुव्रतः पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना: |

जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् || (अथर्ववेद  3/2/2)

अर्थात् :- पुत्र पिता का अनुव्रती हो, पिता के अनुकूल कर्म करनेवाला हो, माता के साथ समान मनवाला - एक मनवाला हो, पत्नी पति मधुमयी शान्तियुक्त वाणि बोलें || 

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8 ) 

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा  स्वसारमुत स्वसा |

समयञ्च सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया || (अथर्ववेद 3/30/3)

अर्थात् :- भाई-भाई से द्वेष न करे और बहन बहन से द्वेष न करे | तुम सब एक मतवाले और एक व्रतवाले होकर परस्पर भद्र वाणी बोलें |

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9)

ओ३म् अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति, 

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति || (अथर्ववेद 10/8/32)

अर्थात् :- मनुष्य ! समीप विराजमान भगवान् को न छोड़ता हुआ है, और समीप विद्यमान भगवान् को न देखता है | दिव्य देव के काव्य को देखो, जो न कभी मरता है और न जीर्ण होता है|

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10) 

विजयादशमी का :-(एक अतिरिक्त मन्त्र)

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयनतां पावमानी द्विजानाम् | आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्  | मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् || (अथर्ववेद 19/71/1)

अर्थात् :- हे मनुष्यों ! द्विजों को पवित्र करनेवाली वरदा वेदमाता मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई वा स्तुत की गई है तुम भी उसका प्रचार करो, उससे औरों को प्रेरित करो | यह आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन-बल और ब्रह्मतेज-ब्रह्मबलरूप वरों को देनेवाली है | तुम यह सब-कुछ मुझे प्रदान कर ब्रह्मलोक की ओर चलो |

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मन्दिर में कलश-स्थापन या घट-स्थापन हुआ है वैसे ही आप नवरात्री के दिनों में नौ मन्त्र याद करने का संकल्प स्थापन करें और वेद रक्षा में अपना योगदान दें |

धन्यवाद

नमस्तेजी

सादर

विदुषामनुचर

विश्वप्रिय वेदानुरागी

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