आज का वेद मंत्र

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷


दिनांक  - -    १२ सितम्बर २०२२ ईस्वी 

 

दिन  - -   सोमवार 


  🌔 तिथि - - -  द्वितीया ( ११:३५ तक तत्पश्चात तृतीया  )



🪐 नक्षत्र -  -  उत्तराभाद्रपद  ( ०६:५९ तक तत्पश्चात रेवती )


पक्ष  - -  कृष्ण 


 मास  - -   आश्विन 


ऋतु  - -  शरद 

,  

सूर्य  - -  दक्षिणायन


🌞 सूर्योदय  - - दिल्ली में प्रातः  ६:०४ पर


🌞 सूर्यास्त  - -  १८:३० पर 


🌔 चन्द्रोदय  - -  १९:५४  पर 


🌔चन्द्रास्त  - -  ०७:४७ पर


सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२३


कलयुगाब्द  - - ५१२३


विक्रम संवत्  - - २०७९


शक संवत्  - - १९४४


दयानंदाब्द  - - १९८


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🚩‼️ओ३म्‼️🚩


   🔥प्रश्न  :-  ईश्वर आनन्द स्वरूप है - कैसे कह सकते हैं ? आनन्द की अनुभूति किसको होती है ?

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   🌷उत्तर - आनन्द की अनुभूति आत्मा को होती है । इन्द्रियों से जो तृप्ति होती है उसको सुख कहते हैं । जो इन्द्रियों को अच्छा लगता है उसको सुख कहते हैं ; जो आत्मा को अच्छा लगता है वह आनन्द है । सुख शरीर को मिलता है । आनन्द आत्मा की भूख है जो आनन्द की अनुभूति से मिटती है ।


   प्रकृति से जो सुख मिलता है उसमें कहीं न कहीं दुःख मिश्रित होता है । अतिसुख अंत में दुःख का कारण बन जाता है, परन्तु  आनंद में जब आत्मा डूबता है तो डूबता ही चला जाता है । उस आनन्द का वर्णन किसी भी भाषा में करना असंभव है । जैसे सुख का उल्टा दुःख होता है, वैसे आनंद का उल्टा शब्द कोई नहीं होता ।


  आनन्द का (आनन्द) आत्मा को अनादि काल से अनेक बार मिला है, तभी तो वह हर योनि में उसे खोजता रहता है और हर सम्भव प्रयत्न करता है । 


  सांसारिक सुख मिलने पर भी वह नाखुश रहता है । वह क्या वस्तु है जिसे वह हर जन्म में ढूंढता रहता है ? आनन्द - केवल आनन्द ! ईश्वर के पास आनन्द का अनन्त खजाना है । इसलिए ईश्वर को आनन्द स्वरूप कहा है। ईश्वर पूर्ण है। 


   जो वस्तु जिसके पास होती है या जहाँ होती है, उसके पास रहने वाले को उसकी प्राप्ति होती है । ईश्वर के पास केवल आनन्द ही आनन्द है  


    "स्व१र्यस्य च केवलम्"  (अथर्ववेद-१०.८.१), 


अतः उसके समीप जो होता है वह आनन्दित होता है, जैसे : अग्नि से समीप बैठेंगे तो ही तपिश का अनुभव होता है, शरीर में गर्मी आती है, उसी प्रकार बर्फ के पास बैठने से ठण्डक मिलती है । ईश्वर की उपासना से जो वस्तु (गुण) ईश्वर के पास है वही प्राप्त होती है अर्थात् आनन्द के भण्डार से आनन्द ही प्राप्त होता है । जड़ प्रकृति के सम्पर्क से जड़ता का प्रभाव पड़ता है और चेतन के संस्पर्श से उसके गुण-कर्म-स्वभाव का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है । जीव और ईश्वर दोनों चेतन सत्ता हैं । जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है । जीव सत् - चित् है, आनन्द-रहित है ; परन्तु ईश्वर सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, अतः ईश्वर में आनन्द है - "स्व१र्यस्य च केवलम्" । यह वेदवाणी है कि ईश्वर में आनन्द ही आनन्द है । जो जीवात्मा उसके सम्पर्क में आता है वह भी आनन्दित हो जाता है । योग-साधना से समाधि-अवस्था में आनन्द का अनुभव हो जाता है यह प्रमाणित है ।


   ऋषि-मुनि-आप्तपुरुषों के वाक्यों को भी प्रमाण में लाया जा सकता है, अतः ईश्वर में आनन्द है । वह सब सद्गुणों-सद्कर्मों-सद्स्वभावों का  भण्डार है, अतः आनन्दानुभव जो आत्मा की भूख है, वह उस पूर्ण ईश्वर के संस्पर्श (उपासना) से ही सम्भव है क्योंकि  'मन्द्र:' (ऋग्वेद ४.९.३)  अर्थात् ईश्वर आनन्दस्वरूप है । 


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🕉️📚 आज का वेद मंत्र 📚🕉️


🌷 ओ३म् समिद्धेऽअग्नावधि मामहानऽउक्थपत्रऽईडय़ो गृभीत:।तप्तं घर्म्मं परिगृह्यायजन्तोर्जा यद्यज्ञमयजन्त देवा:॥ यजुर्वेद १७-५५॥


 💐 अर्थ  :- हे मनुष्य, तुम ज्ञानवान महापुरुषों से सीखो कि यज्ञ(त्याग) दूसरों के कल्याण के लिए कैसे किया जाता है। तुम भी श्रेष्ठतम कर्म दूसरों के हित के लिए संमर्पण और अति उर्जा से करो। यही उस प्रभु  की सच्ची उपासना है। 


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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- त्रिविंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२३ ) सृष्ट्यब्दे】【 नवसप्तत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०७९ ) वैक्रमाब्दे 】 【 अष्टनवत्यधिकशततमे ( १९८ ) दयानन्दाब्दे, नल-संवत्सरे,  रवि- दक्षिणयाने शरद -ऋतौ, आश्विन -मासे ,कृष्ण  - पक्षे, - द्वितीयायां  तिथौ,  - उत्तराभाद्रपद  नक्षत्रे, सोमवासरे , तदनुसार  १२ सितम्बर , २०२२ ईस्वी , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे 

आर्यावर्तान्तर्गते.....प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,  रोग, शोक, निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे


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