ऋग्वेद यज्ञ एवं वेदकथा-

 ओ३म्

-ऋग्वेद यज्ञ एवं वेदकथा-

“हमें दयानन्द जी को समाने रखकर आर्यसमाज का काम करना है और आलोचनाओं से विचलित नहीं होना हैः शैलेशमुनि सत्यार्थी”

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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के मंत्री श्री पे्रम प्रकश शर्मा जी के दूनविहार-जाखन-राजपुररोड स्थित निवास पर दिनांक 7-9-2022 से ऋग्वेद यज्ञ एवं वेदकथा का आयोजन चल रहा है। आयोजन में प्रातः व सायं लगभग डेढ़ घंटे तक यज्ञ किया जाता है एवं शेष डेढ़ घंटे में भजन एवं प्रवचन का कार्यक्रम सम्पन्न किया जाता है। शुक्रवार दिनांक 9-9-2022 को आयोजन के तीसरे दिन प्रातः 8.00 बजे से यज्ञ का सफल आयोजन किया गया। यज्ञ के ब्रह्मा आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी थे। यज्ञ में मन्त्रोच्चार द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की आचार्या श्रद्धा जी एवं दो छात्राओं ने मिलकर किया। यज्ञ के यजमान श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी, उनके परिवार के सदस्य एवं मित्रगण थे। यज्ञ की समाप्ति के बाद सभी यजमानों एवं यज्ञ में उपस्थित बन्धुओं को यज्ञ के ब्रह्मा जी द्वारा वैदिक वचनों को बोलकर आशीर्वाद दिया गया।  


यज्ञ सम्पन्न होने के बाद कार्यक्रम में बिजनौर से पधारे आर्य भजनोपदेशक श्री नरेन्द्र दत्त आर्य जी के भजन हुए। उनके द्वारा गाये गये एक भजन के शब्द थे ‘प्रभु का करो कीर्तन सुख मिलेगा, करो कीर्तन उसका कीर्ति हो जिसकी। गुणों का करो तुम मनन सुख मिलेगा। भक्ति में हो मन मगन सुख मिलेगा। प्रभु का करो कीर्तिन सुख मिलेगा।।’ पंडित नरेन्द्र दत्त आर्य जी ने दूसरा भजन सुनाया जिसके बोल थे ‘जिसने ईक्षण से अखिल विश्व को बनाया है, वही विश्वकर्मा सारे विश्व में कहाया है। हाथ औजार बिन संसार बनाया जिसने, पशु पक्षी ही नहीं पर्वतों को भी है बनाया जिसने। फल व फूलों से सकल सृष्टि को सजाया जिसने, वही विश्वकर्मा सारे विश्व में कहाया है।।’ पंडित नरेन्द्र आर्य जी ने कहा कि परमात्मा की रचना अन्दर से बाहर की ओर होती है। मनुष्यों की रचना बाहर से बाहर की ओर होती है। उन्होंने कहा कि ईश्वर द्वारा बनाई गई सभी रचनायें अद्वितीय हैं। परमात्मा की सभी रचनायें अद्भूत हैं। पं. नरेन्द्र दत्त आर्य जी ने कहा कि परमात्मा बनाता भी नियम पूर्वक है और मिटाता भी नियम पूर्वक है। इस विषय को स्पष्ट करने में पंडित जी ने वृक्ष की उत्पत्ति व रचना का उदाहरण दिया। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि हमें परमात्मा के गुणों का चिन्तन करना चाहिये। पंडित जी ने एक भजन और प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘प्रभु का करो कीर्तन सुख मिलेगा। भक्ति में हों मगन सुख मिलेगा। भरण पोषण विशम्भर सकल जगत का करता, खाओ ख्लिाकर भोजन सुख मिलेगा।।’ अन्त में पंडित जी ने जो भजन प्रस्तुत किया उसके शब्द थे ‘हे प्रभु परम पिता तुम गुणों की खान हो तुम अनादि तुम अनन्त पूर्ण तुम महान हो।’ पंडित नरेन्द्र जी द्वारा प्रस्तुत सभी भजन अत्यन्त मधुर, श्रद्धा-भक्ति व ज्ञानरस से भरपूर थे जिसका श्रोताओं ने भरपूर आनन्द लिया। पंडित नरेन्द्र जी के पश्चात श्री सत्यपाल आर्य जी ने ढोलक पर एक भजन प्रस्तुत किया जिसके आरम्भ के शब्द थे ‘गुरुदेव दयानन्द को अपनो ने रुलाया था। गुरुदेव दयानन्द को अपनो ने सताया था। स्त्री और शूद्रों को अपमानित किया करते थे, हर पाप किया जाता किंचित न डरते थे।’ पंडित सत्यपाल आर्य जी ने यह भजन भक्तिभाव में डूब कर प्रस्तुत किया जिसे सभी बन्धुओं ने पसन्द किया। 


वेदकथा आरम्भ करते हुए वैदिक विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि हमें अपनी जिन्दगी में दयानन्द जी को समाने रखकर आर्यसमाज का काम करना है और अपनी आलोचनाओं से विचलित नहीं होना है। ऐसा करने पर हमारे अन्दर निराशा के भाव नहीं आयेंगे। आचार्य जी ने आर्य वानप्रस्थ आश्रम, हरिद्वार के प्रधान रहे प्रसिद्ध ऋषिभक्त विद्वान महात्मा आर्यभिक्षु जी की चर्चा की। उन्होंने बताया कि उन्होंने संन्यास लेने पर अपनी धर्मपत्नी को पृथक कुटिया में रखा। वह उनके द्वारा बनाया भोजन भी ग्रहण नहीं करते थे। इतना ही नहीं वह स्वपत्नी को संन्यासी बनने के बाद माता कहकर पुकारते थे। आचार्य शैलेश मुनि आर्य जी ने महात्मा आर्यभिक्षु जी के अनेकानेक गुणों को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि महात्मा आर्यभिक्षु जी आदर्श संन्यासी थे। उन्होंने यह भी कहा कि संन्यासी सबके पिता के समान होता है। श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने बताया कि महात्मा आर्यभिक्षु जी ने मृत्यु से पूर्व अपनी समस्त सम्पत्ति जिसमें उनके स्वर्ण च चांदी आदि के आभूषण भी थे, का दान किया था जिनका मूल्य 31.00 लाख रुपये था। आचार्य जी ने बताया कि इस धनराशि के ब्याज से विद्वानों का सम्मान करने सहित परोपकार के कार्य किये जाते हैं। आचार्य जी ने कहा कि हमें धर्म को जानना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा सामान्य मनुष्यों में से चुन कर उन्हें विशेष प्रतिभा देकर विशेष कार्यों को सम्पन्न कराते हैं। 


आचार्य जी ने गीता में श्री कृष्ण अर्जुन सम्वाद की चर्चा की। कृष्ण जी ने अर्जुन को संशय न पालने की सलाह दी थी। कृष्ण जी ने अर्जुन के गुणों की प्रशंसा की थी। कृष्ण जी ने अर्जुन को समझाया कि तुम अपने कर्तव्य को जानों व उसका पालन करो। फल की कामना बिना कर्म नहीं होता। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र एवं फल पाने में परतन्त्र है। आचार्य जी ने बताया कि हम बिना कर्म किये संसार में नही रह सकते। आचार्य जी ने गुलर वृक्ष के फलों की चर्चा की और कहा कि जब हम इसे तोड़ते हैं तो इसमें से मच्छरों के समान सैकड़ों पक्षी जैसे किटाणु उड़ कर बाहर भाग जाते हैं। उन्होंने आश्चर्य के शब्दों में कहा कि कैसे प्रभु ने इस फल का निर्माण किया? फल के बाहर कहीं कोई भी छिद्र नहीं है। कैसे इसके भीतर सूक्ष्म पक्षी वा किटाणु डाल दिए? उन्होंने कहा कि ईश्वर की रचना भीतर से होती है इसका यह प्रमाण है। आचार्य जी ने यह भी कहा कि जब हम वृक्षों से तोड़कर इस फल को खाते थे तो इसका हमें विशेष स्वाद अनुभव होता था। 


आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि मनुष्य का मन जड़ है। यह प्रकृति से बना हुआ है। प्रकृति के गुण सत, रज तथा तम इस मन में होते हैं। मनुष्य का मन हृदय के भीतर रहता है। आचार्य जी ने कहा कि मन जिस इन्द्रिय के साथ लग जाता है वही इन्द्रिय काम करती है। यदि मन आंख से लग जाये तो आंख देखती है। इसी प्रकार न के अन्य इन्द्रियों से जुड़ने से वह-वह इन्द्रिय काम करती हैं। विद्वान आचार्य जी ने कहा कि मन का काम गति देने का है। उन्होंने कहा कि यदि मन में रजो गुणों प्रधान होता है तो मनुष्य पाप करता है और यदि सत गुण प्रधान होता है तो मनुष्य पुण्य कर्मों यथा परोपकार एवं सन्ध्या व यज्ञ आदि किया करता है। 


आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि पंतजलि ऋषि योगदर्शन में कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन को खुश रखना चाहिये। यदि हमारा मन खुश होगा तो हम अच्छे काम कर सकेंगे। हमें उन मनुष्यों से मित्रता करनी चाहिये जो मनुष्य सुखी हों। यदि हम सुखी मनुष्यों के सम्पर्क में आते हैं तो हमें सुख का अनुभव होता है। आचार्य जी ने कहा कि 50 वर्ष व अधिक आयु के मनुष्यों को घर में दो वर्ष के बच्चों के साथ खेलना चाहिये। ऐसा करने से सुख मिलता है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि बच्चों को बच्चा इसलिए कहते हैं कि वह अनेक दुर्गुणों से बचे हुए होते हैं। आचार्य जी ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों के साथ खेलने से ऊर्जा प्राप्त होती है। इसी क्रम में आचार्य जी ने बताया कि धनवान मनुष्य समाज के लिए लाभकारी होता है। धनवान व्यक्तियों को हमें सामाजिक कार्यों में सहयोग करने की प्रेरणा करनी चाहिये। उन्होंने  धनवान व्यक्तियों से भी मित्रता करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि हमें निर्बलों पर दया करनी चाहिये। निर्बलों पर दया करने से जुड़ा एक उदाहरण आचार्य जी ने प्रस्तुत कर बताया कि किसी चढ़ाई के स्थान पर एक दुबुल व्यक्ति की बैलगाड़ी चढ़ नहीं रही थी तो पास में बैठे ऋषि दयानन्द ने उस गाड़ी को अपने बल का सहारा देकर चढ़ाई को पार करा दिया था। आचार्य जी ने आरएसएस के सेवा कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यदि उनका कोई साथी रूग्णता आदि कारणों से शाखा में नहीं आता तो वह सब उसका हाल पूछने उसके घर पहुंच जाते हैं और उसकी हर प्रकार से सेवा सहायता करते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि वह शाखा जाना नही छोड़ पाता। आचार्य जी ने कहा कि आर्यसमाज के लोगों को भी अपने सदस्यों व वैदिक विचारधारा के लोगों से सम्पर्क बनाकर रखना चाहिये और उन्हें समाज मन्दिर के सत्संगों व सामाजिक आयोजनों में साथ ले जाने की पे्ररणा करनी चाहिये। 


आचार्य जी ने रामायण से श्री राम के वन से लौटने के बाद राजतिलक का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रामचन्द्र जी ने रात्रि में भरत को जगाया और कहा कि केवट ने वनगमन में उनकी सहायता की थी। उसे भी राजतिलक के उत्सव में सम्मान के साथ लाने की व्यवस्था करो। केवट को भी राजतिलक में लाया गया था। आचार्य जी ने कहा कि हमें इस घटना से प्रेरणा लेकर अपने उपकारी बन्धुओं के उपकारों को नहीं भूलना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित श्रीमती कान्ता काम्बोज जी उदार एवं दानशील प्रवृत्ति वाली बहिन हैं। उन्होंने पिछले दिनों चकराता के आर्यसमाज के उत्सव में किसी व्यक्ति के निवेदन करने पर दो निर्धन कन्याओं की स्कूल की वार्षिक फीस जमा करा दी थी। हम भी तपोवन, आर्यसमाज राजपुर आदि स्थानों पर बहिन जी को नाना प्रकार से सेवा करते हुए देखते हैं। उनका सेवा कार्यों से युक्त अनुकरणीय जीवन है। 


पं. शैलेशमुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि हमें विद्वानों से शंका समाधान तो करना चाहिये परन्तु ऐसे प्रश्न नहीं पूछने चाहिये जिनके उत्तर हमें ज्ञात हों। उन्होंने कहा कि हमें विद्वानों की परीक्षा नहीं लेनी चाहिये। हमें सत्संगों में विद्वानों की सुनी सत्य व युक्तिपूर्ण बातों को अपने जीवन में उतारना चाहिये। उन्होंने कहा विद्वान जब उपदेश करते हैं तो हमारी शंकाओं का स्वतः समाधान हो जाता है। हमें उनसे शंका करने का अवसर ही नहीं होता। यदि वस्तुतः हो तो शंका का समाधान कर लेना चाहिये। हमें विद्वानों के आचरणों को देखना चाहिये और वैसा ही आचरण हमें भी अपने जीवन में करना चाहिये। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि हमें दुर्जनों की उपेक्षा करनी चाहिये और उनसे दूरी बना कर रखनी चाहिये। आचार्य जी ने दुर्जनों के साथ वाद विवाद होने पर होने वाले दुष्परिणामों को यथार्थ उदाहरण देकर श्रोताओं को बताया। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द जी ने उनको दुर्वचन बोलने वाले एकबन्धु को फलों का टोकरा भिजवा कर उसे अपना प्रशंसक बना लिया था। हमें भी इस घटना से प्रेरणा लेनी चाहिये। 


आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने सबको अतिथि यज्ञ करने की प्रेरणा की। आचार्य जी ने श्रोताओं को अपने घरों में विद्वानों को आमंत्रित करने और उनका सम्मान व सेवा-सत्कार करने की प्रेरणा भी की। आचार्य जी ने कहा कि तामसिक भोजन करने से मनुष्य की बुद्धि भी तामसिक हो जाती है। ऐसा मनुष्य अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म समझने लगता है। तामसिक बुद्धि वाले मनुष्य के द्वारा बहुत से अधर्म के कार्य धर्म समझ कर किये जाते हैं जिससे कालान्तर में उसे दुःख मिलता है। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य को तामसिक भोजन नहीं करना चाहिये। आचार्य जी ने प्रेरणा करते हुए कहा कि अपने भोजन पर ध्यान दें और शुद्ध शाकाहारी एवं स्वास्थ्यप्रद भोजन ही करें। आचार्य जी ने कहा कि अपने मन को आप सदा प्रसन्न रखें और विद्वानों का संग करें। इसी के साथ आचार्य सत्यार्थी जी ने अपने व्याख्यान को विराम दिया। इसके बाद द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की तीन आचार्या एवं दो छात्राओं ने शान्ति पाठ कराया और वैदिक धर्म एवं ऋषि दयानन्द आदि के जयघोष लगाये। आतिथेय श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी ने सभी विद्वानों एवं अतिथियों का धन्यवाद किया। इसके बाद सभी ने प्रातराश लिया। ओ३म् शम्।


-मनमोहन कुमार आर्य

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