आज का वेद मंत्र

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷


दिनांक  - -    १९ सितम्बर २०२२ ईस्वी 

 

दिन  - -  सोमवार 


  🌓 तिथि - - -  नवमी ( १९:०४ तक तत्पश्चात दशमी)



🪐 नक्षत्र -  -  आर्द्रा ( पूरी रात्रि )


पक्ष  - -  कृष्ण 


 मास  - -   आश्विन 


ऋतु  - -  शरद 

,  

सूर्य  - -  दक्षिणायन


🌞 सूर्योदय  - - दिल्ली में प्रातः  ६:१२ पर


🌞 सूर्यास्त  - -  १८:१८ पर 


🌓 चन्द्रोदय  - -  २४:५०+  पर 


🌓चन्द्रास्त  - -  १४:१५  पर 


सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२३


कलयुगाब्द  - - ५१२३


विक्रम संवत्  - - २०७९


शक संवत्  - - १९४४


दयानंदाब्द  - - १९८


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 🚩‼️ओ३म्‼️🚩


🔥अन्त: करण चतुष्टय !

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 🌷अन्त: करण चार है!

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    मन :- चिन्तन करना,किसी कार्य की योजना करना, ध्येय बनाना, संकल्प करना आदि मन के काम है। 'चंचलत्वं मनो धर्मो वह्रि धर्मोयथोष्णता ' के अनुसार मन सदा गतिशील, चंचल, अत्यन्त तीव्र गति वाला है। इसके सहयोग के बिना बुद्धि काम नही कर सकती,कोई भी इन्द्रिय अपने विषय से सम्बन्ध नहीं रख सकती और शरीर कोई गतिविधि या कार्य नही कर सकता ।दरअसल मन शरीर रूपी राज्य का राजा और शासक है।यह प्रकाश की भी गति से कितनी भी दूर तक पहुंच सकता है ।


   बुद्धि  :- किसी भी पदार्थ का बोध कराना,उचित या अनुचित का निर्णय करना और अच्छे बुरे को समझना बुद्धि का कार्य है।मुर्छित अवस्था, निद्रा और नशे की हालत में बुद्धि निष्क्रिय रहती है।जीवात्मा के लिए बुद्धि वैसे ही कार्य करती है जैसे राजा के लिए मंत्री करता है । बुद्धि भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य ग़लत राह पर चलता है  और अशुभ काम करता है जिससे वह मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने के अलावा कई प्रकार के दुख और संकटों में फस जाता है।जब आदमी की बुद्धि काम नही करती तब वह विनाशकारी कार्य करने लगता है ।


   अहंकार  :- अहंकार का मोटा सा अर्थ है मैं की भावना का होना । अहंकार से ही अभिमान, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा आदि मानसिक दोष उत्पन्न होते है।अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ समझना और 'मै' को अधिक महत्व देना अहंकार होता है ।यह बुद्धि और विवेक को  नष्ट करता है और अपने मुकाबले दूसरों को तुच्छ समझने की भावना पैदा करता है ।


  चित्त  :- यह ज्ञान प्राप्ति का साधन और सदैव सक्रिय रहने वाला होता है याने सिर्फ जागते हुए ही नही बल्कि सोते हुए स्वप्न की अवस्था या गहरी नींद में भी सक्रिय रहता है ।हमारी स्मृति का भण्डार और संस्कारों के प्रभाव को ग्रहण कर सुरक्षित रखने वाला यह चित्त ही है। यह हमारे स्वभाव और व्यवहार को प्रभावित करता रहता है ।


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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩


🌷ओ३म् ईशा वास्यमिदं सर्व यत्किञ्च जगत्वां जगत् ।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम् ।( यजुर्वेद ४०|१)


💐अर्थ  :- जो मनुष्य ईश्वर से डरते हैं कि वह हमको सब काल में सब ओर से देखता है, यह जगत् ईश्वर से व्याप्त अर्थात सब स्थानों में ईश्वर विद्यमान हैं । इस प्रकार उस व्यापक अन्तर्यामी को जानकर कभी भी अन्याय- आचरण से किसी का कुछ भी द्रव्य ग्रहण करना नहीं चाहते, वे इस त्याग से धार्मिक होकर इस लोक में अभ्युदय और परलोक में नि: श्रेयसरूप फलों को भोग कर सदा आनन्द में रहते हैं ।


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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- त्रिविंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२३ ) सृष्ट्यब्दे】【 नवसप्तत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०७९ ) वैक्रमाब्दे 】 【 अष्टनवत्यधिकशततमे ( १९८ ) दयानन्दाब्दे, नल-संवत्सरे,  रवि- दक्षिणयाने शरद -ऋतौ, आश्विन -मासे ,कृष्ण  - पक्षे, -  नवम्यां  तिथौ,  - आर्द्रा नक्षत्रे, सोमवासरे, तदनुसार  १९ सितम्बर , २०२२ ईस्वी , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे 

आर्यावर्तान्तर्गते.....प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,  रोग, शोक, निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे


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