चौ0 राजमल जैलदार का बलिदान दिवस: 16 सितम्बर

चौ0 राजमल जैलदार का बलिदान दिवस: 16 सितम्बर
आर्यसमाज खाण्डाखेड़ी: एक सिंहावलोकन
लेखक :- श्री सहदेव समर्पित जी 
हरियाणा में आर्यसमाजः
    आर्यसमाज की स्थापना स्वामी दयानन्द ने 1875 ई0 में बम्बई में की थी। आर्यसमाज ने तात्कालीन परिस्थितियों में देश और समाज में एक नवजीवन का संचार किया। स्वामी दयानन्द के वेदाधारित सिद्धान्तों, उनके तप, त्याग, अप्रतिम प्रतिभा और विलक्षण योग्यता के कारण आर्य समाज का आन्दोलन तीव्र गति से फैलता चला गया और देश के वातावरण को इसने किसी न किसी रूप में प्रभावित अवश्य किया। स्वामी दयानन्द के समकालीन अनुयायियों में एक अद्भुत ऊर्जा थी जिसका प्रभाव परवर्ती अनुयायियों में भी बना रहा। टंकारा में जन्म लेकर हिमालय की घाटियों में ज्ञानपिपासा लिए घूमने वाले दयानन्द ने मथुरा में विद्याध्ययन किया और हरिद्वार, काशी जैसी सांस्कृतिक राजद्दानियों से लेकर लाहौर, मुम्बई, कलकत्ता, पूना, राजपूताना तक वैदिक सिद्धान्तों का सघन प्रसार किया। एक अलौकिक ज्योतिपुंज की तरह स्वामी दयानन्द के आगमन से पूर्व ही जिज्ञासुओं के हृदय में उल्लास छा जाता था तो विरोधियों में खलबली मच जाती थी। इसी दौरान अनेक प्रतिभाशाली नवयुवक स्वामी दयानन्द के सम्पर्क में आए। दीपक से दीपक प्रज्वलित हुए और यह क्रांति का प्रकाश फैलता ही चला गया।
    हरियाणा का अस्तित्त्व यद्यपि उस समय इस प्रकार का नहीं था, परन्तु यह क्षेत्र आर्यसमाज का स्वाभाविक अनुयायी था। मेहनत और ईमानदारी तो इस क्षेत्र के लोगों के स्वभाव का अंग ही थी- स्वामी दयानन्द के स्पष्ट सरल और आडम्बररहित सिद्धान्त यहाँ के लोगों के हृदय में अनायास की घर करते चले गए। महर्षि दयानन्द का यद्यपि इस क्षेत्र में अधिक आवागमन नहीं रहा। जुलाई 1878 में महर्षि अम्बाला आए थे और संवत् 1935 में रेवाड़ी। एक बार पानीपत में रुकने का भी उल्लेख मिलता है। स्वामी दयानन्द के आगमन की अनुगूंज रेवाड़ी में सर्वाधिक समय तक व्याप्त रही।
    यद्यपि आर्यसमाज के सिद्धान्तों की विवेचना करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है तथापि हरियाणा क्षेत्र में आर्य समाज के तीव्र प्रभाव का मुुख्य कारण यही था कि आर्य समाज के सिद्धान्त यहाँ के लोगों को अपने से लगे। प्रत्यक्ष रूप से आर्यसमाज के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने का श्रेय उनके व्यक्तिगत सम्पर्क में आए उनके अनुयायियों को दिया जा सकता है। गुरुदत्त विद्यार्थी, लाला साईंदास, महात्मा मुंशीराम, पं0 लेखराम आदि उच्चकोटि के प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे, जिनका अलौकिक समर्पण आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में सहयोगी बना। हरियाणा में आर्यसमाज के प्रसार प्रचार के लिए प्रथम पीढ़ी के आर्यों में आर्यसमाज के इतिहास में पण्डित बस्तीराम, पं0 शम्भूदत्त, चौ0 भीमसिंह, लाला लाजपतराय, स्वामी ब्रह्मानन्द, राव युधिष्ठिर, चौ0 पीरूसिंह, महात्मा भगत फूलसिंह, स्वामी स्वतंत्रतानन्द आदि कुछ महनीय व्यक्तियों के नाम आदर पूर्वक लिए जाते हैं। यह एक सुखद संयोग था कि हिसार क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में आर्यसमाज के तपे हुए कार्यकर्त्ता एकत्र हुए जो अपने व्यावसायिक सामाजिक जीवन की सफलता के साथ साथ आर्यसमाज के प्रचार के लिए सदैव तत्पर रहे। हिसार में सक्रिय इन प्रथम पीढ़ी के नेताओं में लाला लाजपतराय, लाला चन्दूलाल तायल, बाबू चूड़ामणि, पं0 लखपतराय, डॉ0 रामजीलाल हुड्डा, चौ0 राजमल जैलदार खाण्डा, चौ0 लाजपतराय सिसाय आदि की गणना प्रमुखता से की जा सकती है।
    हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्र की आर्यसमाजों में हिसार जिले के आर्यसमाज खाण्डाखेड़ी का नाम अग्रणी है। खाण्डा ग्राम जिसे अब खाण्डा खुर्द सहित संयुक्त रूप से खाण्डाखेड़ी कहा जाता है, नारनौंद के पूर्व में जींद भिवानी मार्ग पर जींद से लगभग उन्नीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गांव का अपना एक इतिहास है। इस भूमि ने देश को अनेक राजनीतिज्ञ, प्रशासनिक अधिकारी व समाज सेवी प्रदान किये हैं। आज से एक शताब्दी पूर्व के कालखण्ड में यह ग्राम तात्कालीन हरियाणा देहात कहे जाने वाले रोहतक हिसार जिले का प्रमुख गांव था जो राष्ट्रीय व सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े हुए नेताओं का यहाँ आम आवागमन था। आर्यसमाज के प्रमुख नेता जो राष्ट्रीय आन्दोलन के भी कर्णधार थे इस गांव में प्रायः आते थे।
    आर्यसमाज खाण्डाखेड़ी की स्थापना 1900 ई0 से पूर्व हो चुकी थी। हमारा अनुमान है कि यह वर्ष 1890 ई0 के आसपास रहा होगा। डॉ0 सत्यकेतु विद्यालंकार ने आर्यसमाज का इतिहास द्वितीय भाग में उल्लेख किया है कि इस क्षेत्र में जाटों में सर्वप्रथम यज्ञोपवीत लेने वाले व्यक्ति चौ0 राजमल जैलदार खाण्डा और चौ0 उदमीराम थे।
    इतिहासकारों ने चौ0 राजमल जैलदार के डॉ0 रामजीलाल हुड्डा के प्रभाव से यज्ञोपवीत लेकर आर्यसमाज में आने का उल्लेख किया है। इस बात से इन्कार करने का तो कोई कारण नहीं है, लेकिन चौ0 राजमल और डॉ0 हुड्डा का संबंध डॉ0 हुड्डा के हिसार आने से पूर्व का था। डॉ0 रामजीलाल हुड्डा 1892 ई0 में सहायक सिविल सर्जन के रूप में हिसार आए थे। डॉ0 हुड्डा और राजमल समवयस्क थे। डॉ0 हुड्डा का जन्म 1864 में और राजमल का जन्म 1862 में हुआ था। डॉ0 हुड्डा 1886 में अध्ययनार्थ लाहौर गए थे। संभवतः वहीं वे आर्यसमाज के प्रभाव में आए। क्योंकि उस समय का शिक्षित वर्ग किसी न किसी रूप में आर्यसमाज से अवश्य प्रभावित होता था। यद्यपि रामजीलाल का परिचय 1881 में रोहतक में लाला लाजपतराय से हो चुका था, पर उस समय तक लाला लाजपतराय स्वयं पूर्ण रूप से आर्यसमाज में नहीं आए थे। डॉ0 हुड्डा और राजमल के स्वाभाविक अन्तरंग संबंध थे। राजमल डॉ0 हुड्डा के ग्रांव सांघी में विवाहित थे। अतः इतना तो निश्चित है कि राजमल डॉ0 हुड्डा के हिसार आगमन (1892) से काफी पूर्व आर्यसमाज से जुड़ चुके थे और आर्यसमाज लाहौर की गतिविधियों में भाग लेते थे।
    चौ0 राजमल व चौ0 उदमीराम के पश्चात् (डॉ0 सत्यकेतु ने ऊदराम लिखा है।) खाण्डाखेड़ी तहसील के ग्रामीण क्षेत्र में आर्यसमाज का विजय रथ तीव्र गति से दौड़ने लगा। इनकी प्रेरणा से गांव के इनके परिजनों के अतिरिक्त नारनौंद से चौ0 फतहसिंह, सिसाय के चौ0 लाजपतराय, मिलकपुर के चौ0 गंगाराम आदि प्रमुख व्यक्ति आर्यसमाज से जुड़ गए। इन क्षेत्रों के आर्यसमाज भी 1900 से पूर्व स्थापित हो चुके थे।
    आर्यसमाज हिसार का इतिहास तो 1886 में लाला लाजपतराय के हिसार आगमन से प्रारम्भ होता है। लाला लाजपतराय का जन्म 28 जनवरी 1865 में हुआ था। पिता पर इस्लाम का प्रभाव था। स्वयं भी ब्रह्मसमाज के प्रभाव में थे। 1881 में लाहौर के गवर्नमेंट कालेज में प्रवेश लिया। वहाँ आर्यसमाज के वैज्ञानिक अनुयायी पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी और त्यागमूर्त्ति महात्मा हंसराज की संगति में (सहपाठी) आर्यसमाज के रंग में रंग गए। 1882 में पहली बार आर्यसमाज में गए और लाला साईदास का स्नेहिल वरदहस्त पाकर आर्यसमाज के हो गए। 1886 में आप हिसार के लाला रामजीदास के (लाला चन्दूलाल के दादा) एक मुकदमे के सिलसिले में हिसार आए थे। इस क्षेत्र को उपयुक्त समझकर यहीं प्रैक्टिस करने लगे। उसी वर्ष हिसार में आर्यसमाज की स्थापना हुई। 1891-92 में आर्यसमाज का भवन बना, जिसमें लाला चन्दूलाल तायल, लाला हरिलाल और बालमुकुन्द ने तन मन धन से योगदान किया। आज यह आर्यसमाज (लाजपतराय चौक) विश्व की दर्शनीय आर्यसमाजों में से एक है।
    हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रचार के लिए गंभीर चुनौतियाँ भी थीं। लाला लाजपतराय ग्रामीण क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रसार के प्रबल पक्षधर थे। 1892 में डॉ0 रामजीलाल हुड्डा के आगमन के पश्चात् इस क्षेत्र में सफल प्रयास हुए। सतरौल खाप के प्रमुख व्यक्तित्त्व चौ0 राजमल सहित इस टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया। डॉ0 रामजीलाल एक सफल सर्जन के साथ साथ एक स्वच्छ सरल व्यक्ति थे। अंग्रेजी शिक्षा, उच्च सामाजिक स्तर, उच्च अधिकारियों से अंतरंग संबंधों का उनके अंदर लेशमात्र भी अभिमान नहीं था। वे असहाय निर्धन व्यक्तियों को न केवल निःशुल्क दवाईयाँ देते अपितु अपने घर से भोजन भी कराते। डॉ0 रामजीलाल अपने साथियों पं0 लखपतराय, बाबू चूड़ामणि, राजमल जैलदार, लाला लाजपतराय आदि के साथ ऊंटों पर पैदल, बैलगाडि़यों पर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचारार्थ जाते थे।
सबसे बड़ी चुनौतीः
    ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती तात्कालीन सामाजिक व्यवस्था थी। जाट इस क्षेत्र का प्रमुख किसान वर्ग था, परन्तु उनकी सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं थी, जैसी कि वर्तमान में है। जाटों के आर्यसमाज से जुड़ने में एक बड़ी बाधा आ रही थी कि उन्हें द्विज नहीं समझा जाता था। फलतः वे जनेऊ धारण नहीं कर सकते थे। आर्यसमाज उन्हें जनेऊ धारण कराता था। यह एक क्रान्ति थी जिससे जाति व्यवस्था के सड़े गले नियम चटख रहे थे। पौराणिक वर्ग की और से स्थान स्थान पर पंचायतें हो रहीं थी और जनेऊ लेने वालों का सामाजिक बहिष्कार तक किया जा रहा था। सोनीपत जिले के खांडा ग्राम में बीसवीं सदी के प्रारम्भ में पौराणिक वर्ग की ओर से एक पंचायत हुई जिसमें यह प्रस्ताव लाया गया कि जो लोग आर्यसमाज के बहकावे में आकर जनेऊ लेकर आर्य बनते हैं, उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया जाए। यह कार्यक्रम ब्रह्मचारी जयरामदास के शिष्य कूड़ेराम का था। वहाँ पर दूसरे पक्ष के लोग भी उपस्थित थे। किसी ने सुझाव दिया कि जाट द्विज हैं या नहीं इस विषय पर शास्त्रार्थ करा लिया जाए। पौराणिक पक्ष की ओर से काशी के पण्डित शिवकुमार व आर्यसमाज की और से पण्डित गणपति शर्मा के मध्य शास्त्रार्थ हुआ जिसमें आर्यसमाज ने जाटों को क्षत्रिय और यज्ञोपवीत का अद्दिकारी सिद्ध किया। 1902 में इसी प्रकार की पंचायत खिड़वाली में भी हुड्डा खाप की हुई थी, जिसमें चौधरी मातूराम जी (चौ0 भूपेन्द्रसिंह हुड्डा के पिता) द्वारा सिर उतारकर जनेऊ उतारने की बात कही गई थी।
    इसी प्रकार का एक शास्त्रार्थ खाण्डाखेड़ी गांव में भी हुआ था उसमें आर्यसमाज का पक्ष आर्यमुनि जी ने रखा था। राजमल जैलदार के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी थी। जाटों को शूद्र कहने वालों का पक्ष यहाँ संख्या बल की दृष्टि से मजबूत था। उस पक्ष को यह भी ज्ञात था कि शास्त्रार्थ में तो आर्यसमाज का पक्ष विजयी होगा ही। इसलिए इस शास्त्रार्थ में नारनौंद, बास, पेटवाड़ के जिज्ञासुओं के साथ साथ गड़बड़ करने वाले तत्त्व भी लाठियों और गंडासियों से लैस होकर आ गए। राजमल जैलदार और उनके साथियों ने इस योजना को समझा और इस प्रकार की व्यवस्था की कि गड़बड़ करने वाले शास्त्रार्थ स्थल चौपाल में नहीं पहुंच सकें। इस शास्त्रार्थ में आर्यसमाज की विजय हुई। बहुत से लोगों ने आर्यसमाज में सम्मिलित होने की घोषणा की। इस शास्त्रार्थ के पश्चात् सत्य को स्वीकार न करके गंाव के ब्राह्मणों ने आर्यसमाजी जाटों का बहिष्कार कर दिया और उनके किसी भी प्रकार के संस्कार न कराने का संकल्प किया। आर्यसमाजियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने पाई ग्राम से एक ब्राह्मण हरिशरण को लाकर गांव में बसा लिया और बहिष्कार धरा का धरा रह गया।
    इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में आर्यसमाज की तूती बोलने लगी। हजारों आर्यसमाज के अनुयायी बने। क्षेत्र का शायद ही कोई गांव ऐसा होगा जिसमें आर्यसमाज की सक्रियता न हो। सिसाय, मिलकपुर, कोथकलां, मिर्चपुर इक्कस, नारनौंद आदि बड़े गांवों में आर्यसमाज के प्रभावी जलसे होने लगे।
    आर्यसमाज के अनेक कार्यकर्त्ताओं के साथ साथ अनेक प्रचारक भी इस क्षेत्र से निकले। खाण्डाखेड़ी से चौ0 राजमल के चचेरे भाई चौ0 भागमल के पौत्र चौ0 शीशराम (चौ0 मित्रसेन के पूज्य पिता) का जन्म 1878 में हुआ। चौ0 शीशराम आर्यसमाज के एक बड़े प्रचारकथे। आप आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा के अवैतनिक प्रचारक रहे। हालांकि सभा इन्हें 40 रुपये मासिक वेतन देना चाहती थी पर इनके पिता चौ0 शादीराम के आग्रह पर इन्होंने निःशुल्क ही वैदिक धर्म का प्रचार किया। आप डॉ0 रामजीलाल, लाला लाजपतराय, पं0 लखपतराय, महात्मा हंसराज आदि के साथ गांव गांव प्रचारार्थ जाते थे। आपके मधुर कण्ठ से निःसृत सिद्धान्तवादी गीतों और व्याख्यानों से लोग अत्यंत प्रभावित होते थे। आप एक साधारण किसान होते हुए भी निःशुल्क निःस्वार्थ आर्यसमाज का प्रचार करते रहे। 1940 में काला मोतिया के कारण आपकी नेत्रज्योति चली गई। परन्तु यह आपदा भी आपको आपके कर्त्तव्य पथ से डिगा न सकी। 7 फरवरी 1978 को शतायु प्राप्त करके शरीर छोड़ा। चौ0 शीशराम के अतिरिक्त इस क्षेत्र के उपदेशकों में चौ0 भूराराम चिड़ी निवासी, चौ0 कालूराम कोथकलां, चौ0 हरदेवसिंह कोथकलां, (यद्यपि आप अध्यापक थे तथापि आशुकवि थे।) चौ0 लालचन्द मिलकपुर, पं0 प्रभुदयाल प्रभाकर पौली आदि महान् उपदेशक निकले। नारनौंद, मिलकपुर, सिसाय, इक्कस, मिर्चपुर आदि से आर्यसमाज के तपे हुए कार्यकर्त्ता निकले। मिलकपुर के चौ0 मातूराम का हैदराबाद के आन्दोलन में 50 वर्ष की अवस्था में बलिदान हुआ।
क्रान्तिकारियों से संबंधः
    चौ0 राजमल जैलदार का सामाजिक दायरा अति विस्तृत था। सरकारी अधिकारी हों या आर्यसमाज के नेता अथवा राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी, उनके आवास और भोजन की व्यवस्था राजमल की ओर से ही होती थी। गांव के बुजुर्गों के अनुसार भरतपुर के महाराजा भी राजमल की ख्याति सुनकर उनसे मिलने के लिए गांव में आए थे। देवतास्वरूप भाई परमानन्द इस क्षेत्र. में राजमल के आतिथ्य में छः मास तक भूमिगत रहे थे। नवंबर 1931 को डॉ0 रामजीलाल को भिवानी में रेलगाड़ी में द्वितीय श्रेणी की सीट पर सोते हुए मिले थे। भाई परमानन्द को इस क्षेत्र के अलग अलग गांवों में सरकार की नजर से बचाकर रखा गया था। नारनौंद में आर्यसमाज मन्दिर के अन्दर का भवन भाई परमानन्द के सम्मान में 1930 में बनाया गया। इस आशय का पत्थर लगा हुआ है।
    सरदार भगतसिंह का राजमल परिवार के साथ अत्यंत अंतरंग संबंध था। भगतसिंह का परिवार पुराना आर्यसमाजी परिवार था। भगतसिंह के दादा सरदार अर्जुनसिंह जी ने स्वामी दयानन्द से दीक्षा ली थी। वे आर्यसमाज के प्रचारक उपदेशक, नेता, कार्यकर्त्ता और शास्त्रार्थ महारथी थे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी- ‘हमारे गुरु साहेबान वैदों के पैरोकार थे।’ भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह भी आर्यसमाज के नेता और प्रवक्ता थे। सरदार अजीतसिंह एक प्रखर आर्यसमाजी थे। यह परिवार लायलपुर में आर्यों के नाम से प्रसिद्ध था। जिस क्षेत्र में उनके बाग थे उस क्षेत्र को अब भी आर्यों के बाग के नाम से जाना जाता है। आर्य समाजी परिवार व सिन्धु गोत्र होने से राजमल परिवार के साथ उनके अन्तरंग संबंध थे। नारनौंद के स्वतंत्रता सेनानी श्री चन्दनसिंह होत्री भी भगतसिंह के अनन्य मित्र थे। साण्डर्स के वध के पश्चात् भगतसिंह के वध की कलकत्ता फरारी की योजना भी खाण्डा में ही बनी थी। लाला लाजपतराय की मृत्यु को सारे देश का अपमान माना गया था। राजमल के तो वे अत्यंत घनिष्ठ मित्र थे। जब भगतसिंह ने उनकी हत्या के अपराधी को दण्ड देने का संकल्प किया तो राजमल सहित सभी क्षेत्रवासी सहयोग को तत्पर हो गए। कलकत्ता में स्थापित सेठ छाजूराम राजमल के अंतरंग मित्र थे। राजमल व छाजूराम की अंतरंगता का उल्लेख डॉ0 रामजीलाल हुड्डा ने अपनी डायरियों में दर्जनों स्थानों पर किया है। भगतसिंह की फरारी की योजना के अनुसार सुशीला दीदी उन दिनों सेठ छाजूराम की धर्मपत्नी लक्ष्मी देवी व सुपुत्री सावित्री देवी की ट्यूटर के रूप में कलकत्ता में ही थीं। भगतसिंह और दुर्गा भाभी (दुर्गा देवी वोहरा) एक दिन होटल में रहे। दूसरे दिन सेठ सर छाजूराम की कोठी में चले गए। वहाँ एक सप्ताह से अधिक तक निवास किया। बाद में इन्हें आर्यसमाज, 19, विधान सरणि में स्थानान्तरित कर दिया गया। भगतसिंह मन्दिर के ऊपर गुम्बज वाली कोठरी में बदले हुए हरि नाम से रहते थे। अंग्रजी वेश और हैट वाला भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र आर्यसमाज कलकत्ता के प्रवास काल का ही है।
    लाला लाजपतराय से राजमल की अंतरंगता का उल्लेख भी डॉ0 रामजीलाल ने किया है। डॉ0 रामजीलाल तो लाला लाजपतराय के प्रति अत्यंत भावुक और सहृदय थे। लाला लाजपतराय एकाधिक बार खाण्डाखेड़ी भी आए थे। 23 दिसम्बर 1909 की घटना का उल्लेख करते हुए डॉ0 रामजीलाल लिखते हैं कि सुबह लगभग 5 मील तक सैर की। 24 दिसम्बर को भी डॉ0 रामजीलाल, चौ0 राजमल, पण्डित लखपतराय और लाला लाजपतराय इन चारों मित्रों ने मंगाली तक लगभग पांच मील पैदल यात्रा की और चैस शतरंज खेला।
    आर्यसमाज के नेता और डी0 ए0 वी0 आन्दोलन के कर्णधार महात्मा हंसराज जी व उनके सुपुत्र बलराज भी अनेकशः खाण्डाखेड़ी आए थे। एक बार 1900 व द्वितीय  बार 24 दिसम्बर 1931 को महात्मा हंसराज के खाण्डाखेड़ी पधारने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उस जलसे में मेहता रामचन्द्र भी उनके साथ थे। महात्मा हंसराज की अपील पर 1200 रूपये का दान एकत्र हुआ। दीनबंधु सर छोटूराम राजमल का बहुत सम्मान करते थे। उनके चुनाव में मदद करने के लिए चौ0 राजमल रोहतक गए थे। उस समय एक लोकगीत उस क्षेत्र में प्रचलित हुआ था जिसके भाव थे कि चौ0 राजमल खुद चुनाव नहीं लड़ रहा छोटूराम को लड़वा रहा है।
शिक्षा का प्रचार-
    डॉ0 रामजीलाल ने आर्यसमाज के प्रचार, कुरीतियों के निवारण के लिए व्यापक कार्य किया वहीं अपनी जाति के उत्थान के लिए शिक्षा के प्रचार के महनीय प्रयत्न किये। लाहौर में पढ़ते हुए चार मित्रों के संकल्प का चौ0 ईश्वरसिंह गहलोत ने बलदेव भेंट में वर्णन किया है। उनमें चौ0 बलदेव सिंह, भानीराम गंगाना के अतिरिक्त रामजीलाल हुड्डा के सुपुत्र रणजीत सिंह और चौ0 राजमल  के परिवार के पौत्र चौ0 मामनसिंह (चौ0 मित्रसैन आर्य के चाचा) भी थे। मामन सिंह ने जाट स्कूल में छः मास तक अवैतनिक कार्य किया। 1913 में जाट एंग्लो संस्कृत हाई स्कूल की स्थापना में डॉ0 रामजीलाल, चौ0 मातूराम व उस क्षेत्र के नेताओं के साथ चौ0 राजमल का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। हिसार में लाला चन्दूलाल तायल के निधन के पश्चात् उनकी स्मृति में सी0 ए0 वी0 हाई स्कूल की स्थापना की गई, उस हिसार की टीम में चौ0 राजमल भी थे। चौ0 छाजूराम ने इसके लिए विपुल राशि दान की। 1926 में हिसार में जाट स्कूल की स्थापना हुई। नवम्बर 1924 में इसके संस्थापक सदस्यों की चौ0 लाजपतराय सिसाय के निवास पर मीटिंग हुई। इन 13 सदस्यों में सेठ छाजूराम सहित खाण्डाखेड़ी से चौ0 राजमल व चौ0 सूरजमल भी उपस्थित थे। 16 जुलाई 1926 को सेठ छाजूराम व पंजाब के गवर्नर ने हाथ में तसला और करनी लेकर इस विद्यालय के भवन की नींव का पत्थर रखा। सर छोटूराम ने इसके लिए भवन उपलब्ध कराने व पंजाब युनिवर्सिटी से मान्यता दिलाने में महनीय योगदान किया। संगरिया स्कूल की योजना में भी राजमल, डॉ0 रामजीलाल के निकट सहयोगी थे।
    शिक्षा संस्थाओं के लिए अर्थ संग्रह करने में राजमल सदैव अग्रणी रहे। जनवरी 1913 में सिसाय आर्यसमाज के जलसे में महात्मा हंसराज की अपील पर सर छाजूराम ने 700 रुपये, चौ0 राजमल ने 550 रूपये, चौ0 शिवनाथ ने 500 रुपये, चौ0 बख्तावर व इन्द्रराज ने दो दो सौ रुपये का अंशदान किया। दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेज फण्ड के आर्थिक योगदान करने वाले क्षेत्रों का उल्लेख कैनैथ ड्ब्ल्यू जान्स ने ‘आर्य धर्म’ में किया है। मार्च 1890 ई0 में रोहतक क्षेत्र का उल्लेख सर्वाधिक योगदान करने वाले क्षेत्रों के अन्तर्गत (3000 रुपये या उससे अद्दिक) तथा हिसार क्षेत्र का उल्लेख एक हजार रुपये से तीन हजार रुपये का योगदान करने वाले क्षेत्रों में किया है।
    आर्यसमाज के लोग शिक्षा संस्थाओं के लिए धन संग्रह करने में सर्वथा समर्पित थे। ये लोग झोलियाँ करके चन्दा मांगते थे। पं0 लखपतराय, डॉ0 रामजीलाल, चौ0 राजमल ने दिसम्बर 1913 में ग्राम खाण्डा खुर्द (खेड़ी) में चौपाल के चबूतरे पर बैठकर धन संग्रह किया। चौ0 उदमीराम, चौ0 बनवारी, चौ0 शिवनाथ और हनुमान ने सौ सौ रुपये और राजमल ने 125 रुपये का अंशदान किया। एक सप्ताह में खाण्डाखेड़ी से 1162 रूपये, नारनौंद से 705 रुपये, थुराना से 687 रुपये संग्रह किये गए।
    चौ0 राजमल अपने ग्राम में भी शिक्षा के प्रचार के लिए कटिबद्ध थे। विशेषकर लड़कियों की शिक्षा के संबंध में। राजमल के आग्रह पर डॉ0 रामजीलाल ने 7 अप्रैल 1909 को अपनी सुपुत्री चन्द्रमुखी को लिखा कि वह खाण्डा जाए, एक लड़कियों का स्कूल चलाए और स्त्रियों में आर्यसमाज का काम करे। राजमल स्वयं 27 जनवरी 1911 को महिला अध्यापिका की खोज में शेरगढ़ जाते हैं। इनके प्रयासों से खाण्डाखेड़ी में आर्य कन्या पाठशाला की स्थापना हुई। सेठ छाजूराम ने इसका भवन बनवाया और संवत् 1973 में इसका लोकार्पण किया। यह भवन आज भी विद्यमान है और इसके द्वार पर इस आशय का पत्थर लगा हुआ है। हालांकि अब इसका उपयोग आर्यसमाज के कामों के लिए नहीं हो रहा है। कन्याओं की शिक्षा के लिए चौ0 मित्रसेन की अध्यक्षता वाले परम मित्र मानव निर्माण संस्थान द्वारा परममित्र कन्या विद्या निकेतन, वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, लड़कियों का कालेज, बी0 एड0 कालेज, जे0 बी0 टी0 केन्द्र आदि अनेक संस्थाएँ चलाई जा रही हैं।
    आर्यसमाज के प्रचार, शिक्षा के प्रचार के अलावा राजमल जैलदार ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव से गांव के विकास में भी बड़ा योगदान किया। गांव में आर्यसमाज, डिस्पैंसरी और 40 गांवों के डाकघर की लगभग एक साथ ही स्थापना हुई। राजमल का अन्य सामाजिक कार्यों के साथ दलितोद्धार और शुद्धि के कार्यक्रमों में भी बड़ा योगदान था। नारनौंद में एक व्यक्ति की शुद्धि का स्पष्ट उल्लेख है। सिकन्दर हयात खां ने कर्ज मामले में किसानों को राहत देने से साफ इन्कार कर दिया था। सर छोटूराम के साथ राजमल लाहौर में सिकन्दर हयात खां से मिले, जिसमें उन्होंने कर्ज के कारण किसान की जमीन, बैल, मकान और दुधारू भैंस की कुड़की न होने का कानून बनाने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। जाटों को क्षत्रिय घोषित किये जाने के बाद बनी संस्था धर्म रक्षिणी जाट क्षत्रिय सभा के राजमल प्रमुख सदस्य थे और डॉ0 रामजीलाल के साथ दिल्ली में आयोजित इसके कार्यक्रमों में प्रायः भाग लेते थे। वार लीग की बैठकों में भी उनके भाग लेने के उल्लेख मिलते हैं।
सरकारी प्रकोपः
    प्रारम्भिक अवलोकन में यह एक विपरीत बात लग सकती है कि सरकार द्वारा प्रदत्त जैलदार (ऑनरेरी मजिस्ट्रेट) की उपाधि धारण करने वाले राजमल राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति संवेदनशील और सक्रिय कैसे थे। वास्तव में उनकी उपाधि का कारण उनकी अंग्रेज के प्रति चाटुकारिता नहीं अपितु उनके सामाजिक प्रभाव और जनसेवा के कार्य हैं। सरकार के कोप के कम से कम तीन तो स्पष्ट प्रमाण हैं। नवम्बर 1918 में डी0 सी0 मि0 लतीफ द्वारा यह मिथ्या प्रचार करके उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया कि उन्होंने फौज में भर्तियों के मामले में धन ग्रहण किया है। दूसरे उनकी जैलदारी छीनने का प्रयास किया गया जो उनके साथियों की सक्रियता से सफल नहीं हो सका। इस तथ्य का उल्लेख महात्मा हंसराज जी ने आर्य जगत् लाहौर के ऋषि बोधांक 24 माघ 1 फागुन 1982 विक्रमी के अंक में किया है। डॉ0 रामजीलाल का भी राजनपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में तबादला कर दिया गया। हिसार के डी0 सी0 काजी मोहम्मद असमत खां ने सेठ चिरंजीलाल और उनके भाईयों को अपमानित करना चाहा। अनाथालय भिवानी को खोलने को लेकर भी सरकार प्रसन्न नहीं थीे। इसमें सहयोग के अपराध के लिए बाबू चूड़ामणि एडवोकेट पर एक भयंकर अभियोग चलाया गया। पं0 लखपतराय बैरिस्टर एॅट लॉ के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयासों से ये षड्यंत्र सफल न हो सके। सरकार के रुष्ट होने का तीसरा प्रमाण यह है कि राजमल की हत्या के पश्चात् पुलिस की कार्यवाही अत्यंत धीमी चल रही थी। इसका उल्लेख डॉ0 रामजीलाल हुड्डा ने किया है।
    राजमल का जन्म 1862 ई0 में हुआ था। पांच वर्ष की अवस्था में ही आपके पूज्य पिता का देहान्त हो गया था। आपके पिता जी का नाम चौ0 गिरधाल सिंह और दादा का नाम श्याबदास था। आपके पूर्वज कल्ली सतरौल खाप के मुखिया थे, जिनकी अपनी खाप सेना थी। जींद और नाभा की सेना को राव तुलाराम पर आक्रमण करने में बाद्दा डालने में संभवतः इस खाप का भी योगदान था। ये इतिहास की गहराईयों में विलुप्त अध्याय हैं, जिनके संबंध में गहन शोध की आवश्यकता है।
    16 सितम्बर 1932 को चौ0 राजमल, उनके परम मित्र चौ0 मातूराम (खाण्डाखेड़ी) और चौ0 उदमीराम (चौ0 सूरजमल के पिता) धर्मखेड़ी के मार्ग पर घूमने के लिए निकले थे। चौ0 राजमल व चौ0 मातूराम को सांघी खिड़वाली के मुगला शेख द्वारा गोली मार दी गई। चौ0 उदमीराम को धमकी देकर छोड़ दिया गया। उस कालखण्ड में आर्यसमाज के अनेक बड़े नेताओं की इसी प्रकार हत्या की गई थी यह इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं।
    राजमल की हत्या के बाद भी आर्यसमाज खाण्डाखेड़ी का उनका लगाया पौधा फलता फूलता रहा। हैदराबाद आन्दोलन में इन्हीं के परिवार के तूहीराम के नेतृत्व में 16 वर्ष की आयु से लेकर 68 वर्ष की आयु तक के आर्यवीरों के जत्थे ने श्री ज्ञानेन्द्र के जत्थे में शामिल होकर गुलबर्गा जेल में 2-2 साल की सजा पाई। हिन्दी आन्दोलन में चौ0 मित्रसेन सिन्धु (चौ0 राजमल के भाई के पड़पौत्र) रोहतक से शामिल होकर हिसार जेल में रहे। आज भी चौ0 मित्रसेन के व्यक्तिगत रूचि लेने के कारण यह आर्यसमाज ग्रामीण क्षेत्र की सर्वाधिक सक्रिय आर्यसमाज है। इसके प्रधान दिलबाग सिंह पटवारी और मंत्री सुखदेवसिंह आर्य हैं। इसके वार्षिकोत्सव पर गांव व आसपास से हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं।
    यह एक विडम्बना ही है कि आर्यसमाज के प्रारम्भिक नेताओं में अति महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले चौ0 राजमल का इतिहास में उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया। इसका एक तो कारण यह है कि आर्यसमाज इस दौरान अनेक संघर्षों से गुजरा। जिस आर्य प्रतिनिधि सभा से ये लोग जुड़े हुए थे उसका सारा पुराना रिकार्ड विभाजन की भेंट चढ़ गया। दूसरा इन लोगों ने कभी अपने नाम की परवाह नहीं की। हरियाणा की नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के इतिहास को जानकर उनके तप त्याग, आत्म बलिदान और समर्पण से कुछ प्रेरणा ले सके इसी उद्देश्य को लेकर यह प्रयास किया गया है। इसमें कुछ त्रुटियाँ भी हो सकती हैं, लेकिन समाज और राष्ट्र रूपी भवन की नींव के पत्थर बने बलिदानियों को यह एक छोटी सी श्रद्धांजली है।
आधार ग्रंथ
1 डॉ0 सत्यकेतु विद्यालंकार, आर्यसमाज का इतिहास प्रथम व द्वितीय भाग
2 हरियाणा के आर्यसमाज का इतिहास, डॉ0 रणजीतसिंह
3 सा0 आर्य प्रति0 सभा के मासिक पत्र सार्वदेशिक के अगस्त सितम्बर 1939 के अंक
4 आर्यसमाज नागौरी गेट हिसार की स्मारिका
5 आत्मकथा लाला लाजपतराय
6 डॉ0 रामजीलाल की दैनिक डायरियाँ
7 बलदेव भेंट चौ0 ईश्वरसिंह गहलोत
8 पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी डॉ0 रामप्रकाश
9 आर्यधर्म कैनैथ ड्ब्ल्यू जॉन्स
10 आर्यसमाज कलकत्ता का शतवर्षीय इतिहास
11 ैमजी ब्ीींरन त्ंउ रू  । स्पमि ॅपजी । च्नतचवेम
12 भ्पेंत ब्पजल रू चसंबमे - च्मतेवदंसपजपमे डण्डण् श्रनदमरं
13 आर्यजगत् लाहौर ऋषि बोधांक 24 मा0 1 फा0 1982 वि0
14 खाण्डाखेड़ी के एक मात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी किशन खाती  व अन्य बुजुर्गों से भेंटवार्ता
15 वैदिक पथ के पथिक चौ0 मित्रसेन आर्य
(शांतिधर्मी के सितम्बर 2008 के अंक में प्रकाशित लेख)

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