आज का वेद मंत्र

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷


दिनांक  - -    २५ अगस्त २०२२ ईस्वी 

 

दिन  - - गुरूवार


  🌘 तिथि - - -  त्रयोदशी ( १०:३७ तक तत्पश्चात चतुर्दशी  )



🪐 नक्षत्र -  -  पुष्य ( १६:१६ तक तत्पश्चात आश्लेषा )


पक्ष  - - कृष्ण


 मास  - -   भाद्रपद 


ऋतु  - -  वर्षा 

,  

सूर्य  - -  दक्षिणायन


🌞 सूर्योदय  - - दिल्ली में प्रातः ५:५५ पर


🌞 सूर्यास्त  - -  १८:५१ पर 


🌘 चन्द्रोदय  - -  २८:४२+  पर 


🌘चन्द्रास्त  - -  १८:०० पर


सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२३


कलयुगाब्द  - - ५१२३


विक्रम संवत्  - - २०७९


शक संवत्  - - १९४४


दयानंदाब्द  - - १९८


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🚩‼️ओ३म्‼️🚩


🔥शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन दुर्लभ है। यह बार बार प्राप्त नहीं होता है। यह मानव तन हमें लोक कल्याण एवं निज का उद्धार करने के लिए ही मिला है। यदि हम इस मानव योनि में चूक गये, तो उद्धार होना असंभव है।


    सांसारिक माया मोह के बंधन में बंधकर मनुष्य अपने मुख्य लक्ष्य को भूल जाता है। यह मानव जीवन परमात्मा प्रदत्त सबसे कीमती एवं अनमोल उपहार है। अतः मानव योनि का लाभ उठाना बुद्धिमता है। अन्यथा समय गुजरने पर पश्चाताप करने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होता। निराशा ही मिलती है।


   धन चाहे जितना भी कमा लें यदि वह जरूरतमन्दों के कल्याण के लिए सहायता के लिए उपयोग नही होता तो वह हमारे लिए एक बंधन के समान है जो एक न एक दिन नष्ट ही हो जाना है। जिस तरह पक्षी पिंजड़े में कैद रहता है, तो उसकी स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है। उसी तरह वासना, कामना, लोभ, मोह का बंधन इंद्रियों की गुलामी है। जो जीवन के लिए दुखदायी है और ईश्वर का प्रेम जीवन के लिए सुख, शांति का प्रमुख आधार है।


  सांसारिक सुख एक ऐसा बन्धन हैं जिसके नाग पाश में बंधकर मनुष्य ईश्वरभक्ति, ईश प्रेम, आत्मिक उत्थान, आध्यात्मिक उन्नति आदि भूल जाता है। जब कि आत्मिक उत्थान, आध्यात्मिक उन्नति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए लोभ, मोह, वासना, कामना के बंधन को काटना अत्यंत आवश्यक है। इसमें जो फंस जाता है, वह कष्ट, दुख संताप को झेलता रहता है। उसे जीवन में मुक्ति नहीं मिल पाती। 


  गौर से देखा जाय तो सभी सांसारिक सुख नश्वर हैं, क्षणिक हैं। इनकी अवधि लंबी नही होती। आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं कि, जिस वस्तु की आप कामना करते थे जब वह मिल जाती है तो आपका सुख कुछ समय के लिये तो स्थिर रहता है किन्तु कुछ दिनों के बाद उससे भी बेहतर वस्तु की तलाश में मन भटकने लगता है।  चाहे कितना भी बड़ा सांसारिक सुख हो वह सदा के लिये स्थिर नहीं रह सकता। इतिहास गवाह है कि यदि ऐसा ही होता तो अनेकों महापुरुषों को अपना अच्छा भला साम्राज्य त्याग कर वास्तविक सुख की खोज में दर दर न भटकना पड़ता। 


  इसलिए चाहे राजा हो या भिखारी किसी के पास ऐसा सांसारिक सुख नहीं जो उसे सदा सुखी रखे।इसलिए इसका एक ही उपाय है उस ईश्वर का ध्यान उपासना! जिसे वेदों ने नेति नेति कह कर पुकारा है। 


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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️


🌷ओ३म् इषे त्वोर्ज्जे त्वा वायव स्थ देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमध्न्या इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा व स्तेन ईशत माघ शंसो ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्ययजमानस्य पशून् पाहि  ( यजुर्वेद १\१)


🌷अर्थ: हे सर्वरक्षक-सर्वव्यापक  जगदीश ! हम अन्नादि इष्ट पदार्थों के लिए तथा बलादि प्राप्ति के लिये आपका आश्रय लेते है। हे परमदेव! हम वायु के सदृश पराक्रम वाले बने। हे सब जगत के उत्पादक देव! यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों के लिए हम सबको अच्छी प्रकार संयुक्त करो , हम यज्ञ-कर्म द्वारा अपने ऐश्वर्य को आगे बढाएं । यज्ञ सम्पादन के लिये न मारने योग्य बछड़ो सहित गौवें प्राप्त करे, जो यक्ष्मादि रोगों से शून्य हो। पापी, चोर, डाकू लुटेरे आदि हम पर राज्य न कर सके, हमारी गौओं और भूमि के स्वामी न बने।हम सदा प्रयत्नशील रहें कि जिससे सुख देने वाली पृथ्वी और गौ आदि सज्जन पुरुषौं के पास बढ़ती रहे। हे परमात्मा! यज्ञकर्त्ता- धर्मात्मा पुरुष के दोपाये और चौपाये जीवों की आप सदा रक्षा करे।


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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- त्रिविंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२३ ) सृष्ट्यब्दे】【 नवसप्तत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०७९ ) वैक्रमाब्दे 】 【 अष्टनवत्यधिकशततमे ( १९८ ) दयानन्दाब्दे, नल-संवत्सरे,  रवि- दक्षिणयाने वर्षा -ऋतौ, भाद्रपद -मासे , कृष्ण   - पक्षे, -  त्रयोदश्यां - तिथौ,  - पुष्य  नक्षत्रे,गुरूवासरे, तदनुसार  २५ अगस्त, २०२२ ईस्वी , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे 

आर्यावर्तान्तर्गते.....प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ, रोग, शोक, निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे


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