ईश्वर को न भूलें

 🌷ईश्वर को न भूलें🌷

 सुभाषिनी आर्य 

ओम् वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तंशरीरम् ।

ओ३म् क्रतो स्मर क्लिवे स्मर कृतं स्मर ।।

―(यजुर्वेद 40-15)

शब्दार्थ―हे (क्रतो) कर्म करने वाले जीव ! तू शरीर छूटते समय (ओ३म्) इस नाम वाच्य ईश्वर को (स्मर) स्मरण कर (क्लिवे) अपने सामर्थ्य के लिए परमात्मा और अपने स्वरुप का (स्मर) स्मरण कर, (कृतम्) अपने किए का (स्मर) स्मरण कर। इस संसार का (वायुः) धनञ्जयादिरुप वायु (अनिलम्) को, कारण रुप वायु (अमृतम्) अविनाशी कारण को धारण करता (अथ) इसके अनन्तर (इदम्) यह (शरीरम्) नष्ट होने वाला सुखादि का आश्रय शरीर (भस्मान्तम) अन्त में भस्म होने वाला होता है। ऐसा जानो।

अर्थात्, इस वेद मन्त्र में कहा गया है कि हे कर्मशील जीव तथा प्रगति करने वाले जीवात्मा! तू अनिलम्–वायु अप्राकृत अर्थात् प्रकृति का बना हुआ नहीं है, अपितु अमृत पुत्र अमर आत्मा है और यह जो शरीर है, मरने के बाद राख हो जाने वाला है, इसलिए तू शरीर के त्यागते समय परमात्मा के अनेक नामों में से श्रेष्ठ और प्यारा जो 'ओ३म्' नाम है, उसका वाणी से जाप कर और मन में उस प्रभु का चिन्तन कर, परन्तु अन्त समय में तो तभी स्मरण आएगा जब अपने जीवन काल में ही परमपिता परमात्मा को अपना साथी बनाएंगे और उसके नाम का स्मरण करेंगे। तभी तो आदेश दिया गया है कि पहले तो जीवन भर ईश्वर का स्मरण कर, सामर्थ्य प्राप्ति के लिए, फिर कहा कि "क्रतोस्मर" अर्थात् आगामी जीवन के लिए जो कर्तव्य कर्म करने हैं, उनको भी याद कर और वर्तमान जीवन को सार्थक बना और मंत्र के अन्तिम भाग में कहा है कि तू वर्तमान जीवन मैं कृत कर्मों को भी देख और अपना निरीक्षण कर कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मुझे क्या करना चाहिए था और क्या नहीं करना चाहिए था और प्रतिदिन मेरी क्या दिनचर्या है। यदि मनुष्य रात को सोते समय अपने दिन भर के किए हुए कर्मों की पड़ताल ही कर ले और विचार कर ले कि यह कर्म मेरा कल्याणकारी नहीं था तो अगले दिन से अपने कार्यों में सुधार करता जाएगा और ऐसा करते-करते उसका सारा जीवन ही सुधर जाएगा, पर इसके लिए कड़े अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है। शास्त्र कहता है कि आत्मा चैतन्य है और यह शरीर जो है, यह योनि कला है, इसके निर्मात्रा हम स्वयं हैं, हमने जो पूर्व जन्मों में अच्छे कर्म किए हैं उनके फलस्वरुप ही हमें यह मनुष्य जन्म और सुन्दर काया मिली है। इसी प्रकार आगामी जीवन के निर्माता हम स्वयं ही हैं। कहा है कि "तपो राज्य और राज्यो नर्क" इसका अभिप्राय यह है कि वर्तमान राजा ने अपने पूर्व जन्मों में अच्छे कर्म किए, तपस्वी जीवन व्यतीत किया तो वर्तमान जीवन में राजा बना, यदि इस जीवन में कर्तव्यपरायण होकर और त्याग भावना से व धर्म का पालन करके राज्य करेगा तो मोक्ष का अधिकारी बनेगा और यदि इसके विपरित विषय-वासनाओं में फंसकर स्वार्थ भावना से राज्य करेगा तो उसके लिए नरक का द्वार खुला है। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है पर उसका फल भुगतने के लिए परतन्त्र अर्थात् परमेश्वर के न्याय से उसको फल मिलता है। इसलिए जैसा कर्म करेगा, उसी को अनुसार उसको फल मिलेगा। परमात्मा साक्षी रुप में उसे देख रहा है और सर्वव्यापक होकर हमारे साथ हर समय जुड़ा हुआ है।

              हम उसको अपने साथ न समझें, यह अलग बात है। बस इस सारे वृत्तांत का यही अभिप्राय है कि हर समय उस प्रभु को अपना सहायक समझें, उसी का स्मरण करें। स्वार्थ भावना को त्याग कर निष्काम भाव से उसी की आज्ञानुसार सब कार्य करें और सदा 'ओ३म्' नाम का जाप करें। यदि हमारा सारा जीवन ऐसा बीतेगा तो अन्त समय प्रभु स्वयं हमारे सामने प्रकाश की किरण बनकर आएंगे और हम प्रभु का स्मरण करते हुए संसार से विदा हो जाएंगे। जैसा सन्तों का कथन है―

ओ३म् नाम की लूट पड़ी है, लूट सके तो लूट।

अन्त समय पछताएगा जब प्राण जाएगा छूट।।

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