(2016 में भी मोदीजी राष्ट्र के प्रपितामह का नाम लालकिले से भूले थे या अन्य कोई कारण रहा हो

 (2016 में भी मोदीजी राष्ट्र के प्रपितामह का नाम लालकिले से भूले थे या अन्य कोई कारण रहा हो।इस पर कीर्तिशेष आचार्य धर्मवीर जी ने 'परोपकारी' का संपादकीय लिखा था,जो आज पुनः प्रासंगिक हो गया है।....) 


अभी-अभी देश ने स्वतन्त्रता-दिवस उत्साहपूर्वक मनाया। कांग्रेस की सरकार स्वतन्त्रता-दिवस को नेहरू गांधी तक सीमित रखने का प्रयास करती थी। नेहरू परिवार को ही देश मान बैठी थी। मोदी सरकार के आने से इस विचार में परिवर्तन आया है। आज देश के क्रान्तिकारियों का, साधु-सन्तों का, देश के महापुरुषों का उल्लेख सरकारी कार्यक्रमों में होने लगा है। सावरकर, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे लोगों को सरकार ने अछूत समझ रखा था, आज उनका सम्मानपूर्वक उल्लेख होता है। उनके चित्र दिखाये जाते हैं।


इस वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर आजादी नाम से एक चित्र पन्द्रह अगस्त को दूरदर्शन पर दिखाया जा रहा था। उसमें बहुत सारे क्रान्तिकारियों, महापुरुषों, राजनेताओं के चित्र गीत-संगीत की पृष्ठभूमि में चल रहे थे। प्रस्तुति बहुत अच्छी थी, उसमें शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द के चित्र थे अन्य धार्मिक महापुरुषों के भी चित्रों की झलक थी। राजनेताओं की चर्चा देश के साथ स्वाभाविक है। इस सबमें एक खटकने वाली बात लगी कि कहीं भी ऋषि दयानन्द का उल्लेख इसमें दिखाई नहीं दिया।


लाल किले की प्राचीर से भाषण प्रारम्भ करते हुए तथा भाषण के मध्य प्रधानमन्त्री मोदी ने बहुत सारे व्यक्तियों का नामोल्लेख किया। महात्मा गांधी के गुरु की अंहिसा की परिभाषा बताई। आचार्य रामानुज के समाज सेवा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए ऊँच-नीच के भेद, अस्पृश्यता सम्बन्धी उनके विचारों का उल्लेख भी किया। पंजाब के चुनावों को ध्यान में रखते हुए गुरु गोविन्द सिंह की साड़े तीन सौ वीं जयन्ती का एकाधिक बार नाम लिया। भाषण प्रारम्भ करते हुए विवेकानन्द को वेद से भी जोड़ दिया, जबकि बेचारे विवेकानन्द का वेद से कितना सम्बन्ध है, यह वेद जानने वाले भली प्रकार जानते हैं। हमारे हिन्दुत्त्ववादी विवेकानन्द के विचारों को ही वेद समझ लें, तो इनका कोई दोष नहीं है।


आश्चर्य की बात तो ये है कि जब आप आचार्य रामानुज की बात कर रहे हैं, आचार्य शंकर का नाम ले रहे हैं, गुरु गोविन्दसिंह की चर्चा हो रही है, वेद का प्रकरण चल रहा है, तब ऋषि दयानन्द इस चर्चा से कैसे ओझल हो गये? दुनियाँ में दयानन्द को कोई किसी से जोड़े या न जोड़े परन्तु वर्तमान युग में वेद और दयानन्द पर्याय हैं। आप दयानन्द के विरोध में खड़े हैं तो भी दयानन्द साथ होंगे और वेद के समर्थन में खड़े हैं तो भी दयानन्द के साथ होंगे। विदेशी दयानन्द के विरोधी हों, ये स्वाभाविक है, क्योंकि उन्हें दयानन्द का विचार अपने अनुकूल नहीं लगता। ईसाई या मुसलमान दयानन्द का विरोध करें, तो भी तर्क संगत है, क्योंकि दयानन्द ने उनके धर्म और दर्शन की धज्जियाँ उड़ाने में कसर नहीं छोड़ी, परन्तु हिन्दू समाज की मिथ्या बातों का, पाखण्डों का, अन्धविश्वासों का खण्डन करके दयानन्द ने उनका भला ही किया है, उनका सुधार किया, इनके प्रयत्नों से हिन्दू समाज की प्रतिष्ठा बढ़ी है। आज हिन्दुओं की सरकार कही जाती है, परन्तु जो हिन्दू सहनशीलता के नाम पर मुसलमान, पीर, फकीरों की कब्रों को स्वीकार करता है, नास्तिक चार्वाक और आज के चार्वाक ओशो का आदर करता है, वही तथाकथित हिन्दू समाज दयानन्द को सहन करने का साहस नहीं रखता। दयानन्द के काल में दयानन्द की जय ने पाखण्डियों के मन में भय को उत्पन्न किया था, लगता है वह भय अभी भी नहीं गया है, यह भय ही दयानन्द की जय है।


मोदी के भाषण में जहाँ भाषा और अभिव्यक्ति तो अच्छी है, परन्तु एकरूपता के विशृंखलन का अनुभव हुआ। इसका कारण ये कि जिन लोगों ने इस भाषण को तैयार किया है, उन्होंने अपने-अपने विषय तो लिखे, परन्तु


सब को एक क्रम में संजोना उन्हें नहीं आया। जिन महापुरुषों ने देश सेवा के कार्य किये हैं, वे " प्रशंसनीय हैं। उनके कार्यों पर विचार करते हुए ऋषि दयानन्द के कामों पर दृष्टि डाली जाये तो कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें ऋषि की भूमिका महत्त्वपूर्ण न हो, इस देश के दीन-अनाथों की पीड़ा को ऋषि ने कैसा अनुभव किया था, इसे जानना हो तो उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा के स्वीकार-पत्र को देखना चाहिए, जहाँ ऋषि ने सभा के नियम व उद्देश्यों की चर्चा करते हुए तीसरे उद्देश्य में सभा द्वारा आर्यावर्तीय दीन-अनाथों की रक्षा और पालना करने की बात की है। आज नेता लोग जिस दलित को हथियार बनाकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं, उस दलित की पीड़ा को ये नेता तो अनुभव नहीं कर सकते, परन्तु ऋषि ने उस पीड़ा को अनुभव करते हुए आदेश दिया था कि हमारे देश की शिक्षा-व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें एक गरीब और राजा के बच्चे के लिये समान आसन, भोजन, शिक्षा का निर्देश दिया हो।


ऋषि दयानन्द ने हिन्दू समाज को बल प्रदान किया। यह समाज अपने अन्दर व्याप्त पाखण्ड, कुरीतियों और अन्धविश्वास से जकड़ा हुआ था। समाज स्वार्थवश परस्पर के वैर-विरोध से विभाजित और दुर्बल भी था। ऐसे समय में ईसाई और इस्लाम के हिन्दू समाज पर आक्रमण निरन्तर हो रहे थे। इस परिस्थिति को देखकर ऋषि दयानन्द ने इस समाज को बचाने के लिये दो प्रकार से कार्य किया, प्रथम इस देश में संस्कृति, साहित्य, इतिहास के माध्यम से इस समाज की अस्मिता को जगाया और समाज में व्याप्त कुरीतियों का जोरदार खण्डन किया। कुरीति और अन्धविश्वास की चपेट में इस्लाम और ईसाइयत भी थे, ऋषि ने उन पर भी आक्रामक रूप से प्रहार किये, उनके साथ शास्त्रार्थ किये। साहित्य के माध्यम से बाइबिल और कुरान की अज्ञानता, पाखण्ड, झूठ का भण्डाफोड़ किया, जिससे एक ओर हिन्दू समाज में सुधार प्रारम्भ हुआ, साथ ही आत्मबल के आने से समाज बचाव के स्थान पर आक्रमण की मुद्रा में आ गया। इस भावना ने पराधीनता से संघर्ष करने और स्वतन्त्रता की इच्छा को प्रबल रूप से जगा दिया। दयानन्द ने समाज में फैले जातिवाद पर प्रहार किया।


मनुष्य में मनुष्यता के रूप में कोई भेद, ऊँच-नीच मानने से इन्कार कर दिया। समाज में ऊँचनीच की भावना को जन्म देता है- अवतारवाद । जातिवादी श्रेष्ठता को बल देता है, अतः ऋषि ने अवतारवाद का खण्डन किया। जड़ पूजा से मनुष्य अकर्मण्य, भाग्यवादी और दीन-हीन याचक बन जाता है। ऋषि ने हिन्दू समाज के पतन के कारण- इस जड़-पूजा पर कठोर प्रहार किया। जिन लोगों के स्वार्थ और आजीविका इस जड़ पूजा से जुड़े हैं, उनका ऋषि विरोधी होना स्वाभाविक है। आज जड़ताओं को जो लोग हिन्दू धर्म का अंग बनाकर रखना चाहते हैं, उनको ऋषि दयानन्द के नाम से भय लगता है। उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और आजीविका जाने का भय सताता रहता है।


ऋषि दयानन्द समाज के पिछड़े, दलित और उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिये सतत् प्रयत्नशील रहे। ऋषि दयानन्द के मानवीय पक्ष को वे लोग अनुभव कर सकते हैं, जिन्होंने ऋषि के उस ज्ञापन को देखा हो, जिसमें सरकार से माँग की गई कि जो सन्तानें अवैध कही जाकर उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार हैं, वे निर्दोष हैं। वे प्रकृति के नियम से उत्पन्न हैं, यदि मनुष्य के बनाये नियमों को मनुष्य ने तोड़ा है तो उसके लिये निर्दोष सन्तान को क्यों उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए? ऋषि ने पिछड़े पुरुष, महिला, अनाथ, दलित के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदला। दयानन्द की उपेक्षा कृतघ्नता होगी। ये कृतघ्नता हमारे व समाज के लिये ही हानिकारक सिद्ध होगी, ऋषि दयानन्द ने तो स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश में निर्भीक होकर कहा है-


 निन्दन्तु नीति-निपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्। अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा, न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।।

                           -धर्मवीर

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