संध्या, प्रार्थना, उपासना

 संध्या, प्रार्थना, उपासना

संध्या

मनुष्य प्रातः काल संध्या में बैठकर रात के समय में आए मानसिक दोषों को दूर करें और सायंकाल संध्या में बैठकर दिन में आए मानसिक दोषों को दूर करें। अर्थात् दोनों समय संध्या में बैठकर उससे पहले समय में आए मानसिक विकारों पर चिंतन, मनन और पश्चाताप करके उन्हें आगे ना आने देने का निश्चय करें।

प्रार्थना

कोई वस्तु परमात्मा से मांगने से पहले उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उसके अनुसार प्रयत्न करना आवश्यक है। विद्यार्थी परमात्मा से प्रार्थना करें कि वह उसे परीक्षा में पास कर दे, तो विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह परीक्षा की तैयारी पूरी मेहनत से करें। हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें तीक्ष्ण बुद्धि दे, तो उसके लिए हमें भी ऐसे यत्न करने चाहिए जिससे बुद्धि तीक्ष्ण हो- (शुद्ध खानपान ब्रह्मचर्य का पालन अच्छी-अच्छी पुस्तकों का पढ़ना आदि)। यदि हम स्वयं प्रयत्न ने करें और ईश्वर से मांगते रहे तो हमें कुछ नहीं मिलेगा। जो परमेश्वर के सहारे, आलसी बनकर बैठे रहते हैं, उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता, क्योंकि ईश्वर की पुरषार्थ करने की आज्ञा है। ईश्वर उसी की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करता है जो बैठा हुआ गुड, गुड कहता रहे उसे गुड प्राप्त नहीं होगा। जो उसके लिए प्रयास करता है उसे कभी ना कभी गुड़ अवश्य मिलेगा।

उपासना 

जब ईश्वर की उपासना करना चाहे तब एकांत शुद्ध स्थान पर जाकर आसान लगाकर आंखें बंद करके बैठ जाएं। सभी इंद्रियों को बाहरी संसार से रोककर पहले प्रणायाम करें फिर अपने मन को हृदय, नाभि, कंठ या दोनों आंखों के मध्य भाग पर, किसी एक स्थान पर स्थिर करके अपने आत्मा और परमात्मा का चिंतन कर परमात्मा में मग्न हो जाएं। ऐसा करते रहने से आत्मा और अंतःकरण सभी पवित्र हो जाते हैं, तथा मनुष्य की केवल सत्याचरण में ही रुचि हो जाती है। आत्मा का बल इतना बढ़ जाता है, कि पहाड़ के समान मुसीबत आने पर भी मनुष्य घबराता नहीं और सहन कर लेता है।

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