सुनिए वैदिक विद्वान ''स्वामी शांतानंद सरश्वती दर्शनाचार्य ''का वैदिक लेख ''केनोपनिषद का अतिसूक्ष्म परिचय

 सुनिए वैदिक विद्वान ''स्वामी शांतानंद सरश्वती दर्शनाचार्य ''का वैदिक लेख ''केनोपनिषद का अतिसूक्ष्म परिचय 

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धन्यवाद

उपनिषदों की संख्या 11 होती हे 

जिनके नाम इस प्रकार हे 

(१) ईशावास्योपनिषद्,

(२) केनोपनिषद्

(३) कठोपनिषद्

(४) प्रश्नोपनिषद्

(५) मुण्डकोपनिषद्

(६) माण्डूक्योपनिषद्

(७) तैत्तरीयोपनिषद्

(८) ऐतरेयोपनिषद्

(९) छान्दोग्योपनिषद्

(१०) बृहदारण्यकोपनिषद्

(११) श्वेताश्वतरोपनिषद्

                                                        केनोपनिषद् - परिचय 

 केन शब्द से शुभारंभ होने से इस उपनिषद् का नाम केनोपनिषद् पड़ा । केन का अर्थ होता है किसके द्वारा । अर्थात् शरीर में स्थित प्राण मन इन्द्रिय आदि किसकी प्रेरणा से प्रेरित होकर कार्य करते हैं  कौन इनको अपने अपने विषय में संयुक्त करता है तथा कौन इन सबका आधार है यह बतलाने वाला उपनिषद् केनोपनिषद् है । यह उपनिषद् ४ खण्डों में विभाजित है। इसमें कुल 17 पृष्ठ हैं ।

प्रथम खंड में  कहा गया है कि किसकी प्रेरणा से मन विषयों पर आकृष्ट होता, किसके द्वारा नियुक्त प्राण जन्मते ही गति करने लगता है , किसकी प्रेरणा से वाणी बोलती है, चक्षु और श्रोत्र को कौन देव अपने अपने विषयों पर नियुक्त करता है ।  जो श्रोत्र का श्रोत्र है , मन का भी मन है ,वाणी की भी वाणी है , प्राण का भी प्राण है , चक्षु का भी चक्षु है वही ब्रह्म है ।  इस प्रकार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वह सभी इन्द्रियों में शक्ति व गति भरने वाला है किन्तु ब्रह्म तक किसी भी इन्द्रिय की पहुंच नहीं है।

 द्वितीय खंड में ब्रह्म की महानता बतलाया गया है साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि इसी जन्म में ब्रह्म को जान लिया तो ठीक है अन्यथा विनाश है , महती हानि है ।  

 तृतीय खंड में  अग्नि वायु  आदि देवताओं का अभिमान से युक्त होना एवं ब्रह्म के द्वारा यक्ष के माध्यम से देवताओं के समक्ष एक तिनका रखकर उसे जलाने या हिलाने का भी प्रस्ताव रखा गया परन्तु कोई उसे हिला भी नहीं सके । इस प्रकार देवताओं के अभिमान को नष्ट करने का सुंदर आलंकारिक आख्यान यहां  मिलता है। 

चतुर्थ खंड में स्पष्ट किया गया है कि वह यक्ष ब्रह्म ही था जिसे जानने के लिए इन्द्रियां समर्थ नहीं हैं उसे तो आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है । इस खंड में ब्रह्म को वन कहा है अर्थात् भक्ति के योग्य कहा है । ब्रह्म की , वन नाम से  उपासना करनी चाहिए या  एकान्त जंगल में ब्रह्म  की उपासना करनी चाहिए ।जो इस उपनिषद् में वर्णित ब्रह्म विद्या को जानता है वह पाप वृत्ति को नष्ट करके अनन्त  उत्तम स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । 

सामवेद एवं अथर्ववेद से इस उपनिषद् का सम्बन्ध मिलता है ।

🖋️ स्वामी शान्तानन्द सरस्वती

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