शिक्षा कैसी होनी चाहिये

  शिक्षा कैसी होनी चाहिये। 

     प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना चाहता है। मोटे तौर पर हम देखते हैं जो लोग स्कूल कॉलेज  आदि में पढ़कर विद्वान बुद्धिमान हो जाते हैं, वे, दूसरे अनपढ़ व्यक्तियों की तुलना में कुछ अधिक आसानी से अपने काम पूरे कर लेते हैं, तथा स्वयं को सुखी मानते हैं।

 परंतु वे  उतने सुखी तो नहीं होते, जितने कि वे अपने आप को सुखी प्रदर्शित करते हैं।  बल्कि अनेक बार तो इस वर्तमान स्कूल कॉलेज की शिक्षा को प्राप्त करके, वे सुखी होने के स्थान पर अपना एवं दूसरों का दुख ही बढ़ाते हैं। 

अगर आपने कुछ गहराई से इस विषय में अध्ययन किया हो, तो आप भी इस बात को समझते होंगे, कि आज के तथाकथित प्रगतिशील वातावरण में स्कूल कॉलेज के उच्च शिक्षा प्राप्त लोग, संसार को अधिक दुख देते हैं। जबकि उनकी तुलना में ग्रामीण अंचल के प्रायः अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे लोग, संसार को उतना दुख नहीं देते।

इससे पता चलता है कि वर्तमान शिक्षा उतनी सार्थक नहीं है, अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रही, जैसा कि शिक्षा का उद्देश्य था।

     आजकल की शिक्षा में, विद्यार्थी, कुछ वस्तुओं के नाम, नगरों के नाम रट लेता है। कुछ व्यापार करना आदि क्रियाएं भी सीख लेता है। और इसके साथ-साथ धन कमाने के गलत तरीके (झूठ छल कपट चोरी डकैती लूटमार रिश्वतखोरी आदि) भी सीख लेता है,  जिससे वह स्वयं तो दुखी होता ही है, बल्कि दूसरों को भी बहुत दुख देता है। झूठ छल कपट चोरी बेईमानी रिश्वतखोरी इत्यादि पाप कर्म करता है। उसमें आस्तिकता लगभग नहीं दिखाई देती , नास्तिकता का ही प्रभाव अधिक दिखता है। जिसके परिणाम स्वरुप चारों ओर दुख ही दुख फैल चुका है।


प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति से व्यक्ति में सेवा परोपकार ईमानदारी सच्चाई बड़ों का आदर सम्मान सभ्यता ईश्वरभक्ति प्राणियों पर दया इत्यादि उत्तम गुण देखे जाते हैं। इसलिए प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति ही उत्तम है। वही हमारे जीवन के उद्देश्य को पूर्ण करने वाली है। यहां तक कि वह जन्म मरण से भी छुड़ाकर हमारे अंतिम उद्देश्य = मोक्ष तक पहुंचाने वाली है।

 वैदिक शिक्षा हमें सही सोचना सिखाती है, सही बोलना और सही आचरण करना सिखाती है, जिससे हम सब प्रकार से सुखी हो सकते हैं। यही वास्तविक शिक्षा पद्धति है । इसी को अपनाना चाहिए, इसी से जीवन सार्थक होगा। अपना और सबका कल्याण होगा।

           यदि संसार के लोग, फिर से वेदो की ओर लौटें, वेदों को पढ़ें, उन पर आचरण करें, वैदिक शिक्षा नीति को संसार में लागू करें, तभी संसार में सुख बढ़ेगा, अन्यथा नहीं।

        - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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