रावण की नौकरी

  रावण की नौकरी

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आत्मा स्वच्छंद विचरण करने वाली एक दिव्य चेतना है।जब इसे जीवन को प्राप्त करना होता है तब यह पहले एक सूक्ष्म देह को प्राप्त करती है और उसके पश्चात यह जीवात्मा बनती है।यह जीवात्मा ही अंततः किसी शरीर को धारण करती है।

                             ।।अज्ञात।।

आज से लगभग दस साल पहले तक रावण की आत्मा शून्य में स्वच्छंद विचरण करती थी।अचानक इस रावण की स्वच्छंद विचरण करती थी।अचानक आत्मा को देह धारण करने की इच्छा हुई।उसने सबसे पहले सूक्ष्म देह धारण किया, तत्पश्चात जीवात्मा बन एक ब्राह्मण परिवार में देह धारण किया।इस नये देह को अपने पूर्वजन्म में महाबुद्धि, महाबली रावण होने का भान था,भगवान शिव के अनन्य भक्त होने का भान था लेकिन वह सदैव गंभीर, अपनी दैनिक जीवनचर्या में व्यस्त रहता था।उसका अपनी शिक्षा पर सदैव ध्यान रहता था।परीक्षाओं में सदैव अव्वल आता था।उसका बस एक ही लक्ष्य था किसी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो अपने कुल का कल्याण करे किन्तु आज कि इस छद्म लोकतांत्रिक व्यवस्था में सदैव असफल रहता। अभी इस काल में "जन्मना जायते शुद्रः" का सिद्धांत लागू नहीं। यदि होता तो शायद अपने को ब्राह्मण से शुद्र में परिवर्तित कर, सरकारी नौकरी पा जाता।आज की इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ऐसी रूढ़ और जटिल जाति-व्यवस्था परवान चढ़ रही है कि न जाने कितनी ही प्रतिभाओं ने रास्ते में दम तोड़ दिया।या तो आमदनी का दूसरा जरिया चुना या फिर अपराध के रास्ते चल पड़े।

--आज ब्राह्मण देह में उपस्थित महाज्ञानी रावण की आत्मा बेरोजगारी के दंश को भोग रहा है।बेरोजगारी का दंश झेल रहे रावण को चिंता सताये जा रही थी किस प्रकार पिता विश्रवा,माता कैकसी,पत्नी मंदोदरी,पुत्र मेघनाद, प्रिय भाई कुंभकरण और विभीषण की,बहन सुपर्णखा का ध्यान रखे।घर का बड़ा था अतः उसी के कँधे पर घर की जिम्मेदारी थी।पिता विश्रवा यज्ञ-हवन से कुछ कमा लाते थे लेकिन उससे घर चलना संभव नहीं था।आज के मेधावी रावणों नें काफी प्रयास किए,एक अदद नौकरी के लिए लेकिन महाज्ञानी होने के बावजूद उसका ब्राह्मणत्व  उसके और उसकी नौकरी के बीच आ जाता।तमाम तरह की मेधा होने के बावजूद दलित, बैकवर्ड नौकरी ले जाते और रावण मुँह ताकता रह जाता।

एक दिन उसने सोचा क्यों न तप कर अपने आराध्य शिव को प्रसन्न किया जाए,शायद शिव किसी नौकरी की व्यवस्था कर दें।

रावण तपस्या के लिए तैयार हुआ और घोर तप में लीन हुआ।साल दर साल बितते गए।रावण के तप से भक्त-वत्सल शिव का आसन हिल उठा,शिव प्रसन्न हो रावण के समक्ष अवतरित हुए।

ध्यान मग्न रावण को प्रभु आवाज लगाई--आँखें खोलो वत्स!देखो तो तुम्हारे समक्ष कौन खड़ा है।

शिव-नाद पाकर ध्यान मग्न रावण नें अपनी आँखें खोल दी।प्रभु को साक्षात अपने समक्ष पाकर अति-प्रसन्न हुआ- और शिव के पैरों में साष्टांग लेट गया।प्रभु ने रावण को उठाकर हृदय से लगाया और कहा---

भक्त रावण! तेरी भक्ति और कठोर तप से शिव अति प्रसन्न है।वर माँग।क्या माँगता है?जो चाहे माँग ले,शिव इंकार नहीं करेगा।

शिव की बात सुन रावण का मनोबल बढ़ा।उसने प्रभु के हाथ जोड़े और कहा--प्रभु! मुझे बस एक सरकारी नौकरी दिलवा दो।

अवधूत शिव को लगा जैसे चक्कर आ गया हो,उन्होंने क्षण भर को साँस लिया और कहा--नौकरी?वह भी सरकारी?आज के इस प्रजातांत्रिक दौर में, नौकरी?मैं शिव हूँ सरकार नहीं।

रावण गिड़गिड़ा उठा--प्रभु! दया करो।आप शिव हो और जो सरकार का मुखिया है,वह है आपका अनन्य भक्त।आप चाहेंगे तो--

शिव बोल पड़े--वह मेरा भक्त नहीं।वह मेरे कलेंडर का भक्त है।हर रोज मेरे मंदिर में हृदय में प्रपंच धरे दाखिल होता है,शिवलिंग केवल बेलपत्र और जल चढ़ाने वाला मेरा भक्त नहीं हो सकता।

रावण--लेकिन वह तो कहता है,वह आपका सबसे बड़ा भक्त है,कंदराओं में जाकर महिनों धूनी रमाता है।

शिव--झूठ कहता है।मेरा भक्त होने का नाटक करता है।जनमानस को मूर्ख बनाता है।धूनी रमाने से कोई मेरा भक्त नहीं हो जाता।

रावण बोल पड़ा--किन्तु प्रभु, मैं तो आपका भक्त था,हूँ और रहूँगा।मेरे बारे में तो सोचो।आपने वरदान देने का वादा भी किया था।बस वरदान स्वरूप अपने इस भक्त को एक सरकारी नौकरी दे दें या दिलवा दें।आपका यह भक्त आपका सदैव आभारी रहेगा।

अवधूत,रावण की माँग पर निःसहाय हो चले थे।वरदान का वादा तो कर दिया था किन्तु असहाय थे,वे शिव हैं सरकार नहीं।

शिव ने कहा--वत्स रावण!तू इस सरकारी नौकरी को छोड़,कुछ और माँग ले।धन माँग ले,वैभव माँग ले,कुछ भी माँग ले,लेकिन सरकारी नौकरी! ये शिव के बस का नहीं।

दुखी मन रावण बोल पड़ा--क्यों प्रभु?क्या कमी है मेरी प्रतिभा में,मेरी मेधा में?क्यों मैं सरकारी नौकरी का हकदार नहीं?

शिव ने निराश मन कहा--भक्त रावण!न तो तेरी प्रतिभा में कमी है और न ही विद्वता में,कमी है तो तेरी जाति में है।तु ब्राह्मण है दलित नहीं।इस प्रजातांत्रिक देश में दलित होना ही सरकारी नौकरी की गारंटी है,यहाँ मेधा,प्रतिभा सबकुछ गौण हो जाती है।वत्स!सरकारी नौकरी की बात छोड़ और जैसा भी वैभव चाहिए,मुझसे माँग ले।

रावण भी जिद्दी प्रकृति का प्राणी था।वह सरकारी नौकरी से कम पर मानने वाला नहीं था।

व्यथित मन रावण ने कहा--हे भक्त-वत्सल!इस प्रजातांत्रिक देश में यदि दलित होना ही सरकारी नौकरी की गारंटी है तो फिर मुझे दलित बना दो।

शिव ने कहा--यह भी शिव नहीं कर सकता।भक्त रावण!इसके लिए तू आधार-कार्ड बनाने वाले से मिल।वह तेरा जाति,लिंग सभी कुछ बदल देगा और एकबार जब कार्ड बन गया तो सरकार भी उस कार्ड पर आब्जेक्शन नहीं कर सकती क्योंकि यह सरकार के मातहत,सरकारी महकमे द्वारा बनाया जाता है।यह व्यक्ति का आइडेंटिटी पूफ्र होता है।

रावण--मेरे अराध्य होकर भी आप मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते?

शिव--वत्स रावण!वैभव माँग ले,शिव दे देगा किन्तु जो तो माँग रहा है,वह शिव नहीं दे सकता क्योंकि सबल प्रजातांत्रिक शक्तियों के समक्ष शिव निर्बल है,असहाय है।

रावण--तो हे भक्त-वत्सल देवाधिदेव महादेव!क्या आप इस प्रजातांत्रिक प्रणाली में इतने निर्बल हो गए कि भक्तों के कल्याण और मानव कल्याण से बिल्कुल ही विमुख हो गए! प्रभु!वह आप ही न थे,जिसने मानव कल्याण के लिए समुद्र मंथन के दौरान निकले विष "कालकूट" को अपने कंठ में थाम,नीलकंठ कहलाए।प्रभु तब जो किया, अब क्यों नहीं।

शिव को अब रावण के तर्कों उब होने लगी थी।अब शिव अधिक मगजमारी के फेर में नहीं थे।

शिव ने रावण से कहा--तब की बात और थी।सभी अपने धर्म और कर्तव्य का पालन हृदय से करते थे लेकिन अब समय बदल गया है,प्रजातंत्र आ गया है।--और इस प्रजातांत्रिक पद्धति में शिव,शिव नहीं रहा, रही है तो केवल प्रजातांत्रिक सरकार जिसमें शिव का होना या न होना बराबर है।शिव शून्य है।शिव अस्तित्वहीन है।इतना कह शिव अंतर्ध्यान होने ही वाले थे कि रावण ने कसकर शिव का मृगछाल पकड़ लिया और कहा--भोलेनाथ!ऐसे तो न जाने दूँगा,बिना उपाय बताए।

शिव घबरा गए।अपना मृगछाल कसकर पकड़ लिया और कहा--बस यही बाकी रह गया था।परे हट,शिव को 

वस्त्रहीन करेगा क्या?

रावण--जब तक उपाय नहीं बताओगे, रावण छोड़ने वाला नहीं।

शिव के गले में पड़ा बासुकीनाथ नाग मुस्कुरा पड़ा और कहा--बता दो भगवन!बड़ा ही जिद्दी है।

शिव--अरे मृगछाल तो छोड़।

रावण ने शिव के मृगछाल छोड़ दिए। 

शिव--तू पुत्र किसका?विश्रवा का न। (रावण ने हाँ की मुद्रा में अपना मस्तक हिलाया) विश्रवा के पिता कौन?ऋषि पुलत्स्य न।(रावण ने फिर हाँ में सर हिलाया)।ऋषि पुलत्स्य कौन?ब्रह्मा के मानसपुत्र न।मैं तो केवल अराध्य हूँ और ब्रह्मदेव तेरे पूर्वज।बुरे समय में अराध्य से अधिक परिवार काम आता है।ब्रह्मदेव,सृष्टिरचयिता हैं और तु ब्रह्मदेव के खानदान का।यदि सरकार तुझे नौकरी नहीं देगी तो ब्रह्मदेव कुपित हो उठेंगे,सारी सृष्टि में उथल-पुथल मचा देंगे।ऐसा कर तु ब्रह्म का तप कर उन्हें प्रसन्न कर,तेरा सब कुशल होगा।शिव सिरदर्द के साथ शिवलोक को प्रस्थान कर गए और रावण ब्रह्मदेव के तप में लग गया।मैं नहीं जानता, ब्रह्मदेव रावण की तपस्या से प्रसन्न होंगे कि नहीं लेकिन मेधावी रावणों की दशा से मुझे ऐतराज है।

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