ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है।

 ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है। 


(दार्शनिक विचार)


#डॉविवेकआर्य


ईश्वर को दयालु और न्यायप्रिय कहा गया है। ईश्वर निष्काम भाव से जीवात्माओं के कर्म और भोग के निमित सृष्टि का निर्माण करते है।  ताकि मनुष्य रूपी आत्मा उत्तम कर्म कर मुक्ति को प्राप्त कर सके। ईश्वर जीवात्माओं के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार बिना पक्षपात के सुख-दुःख रूपी फल देते है।  यही उनकी न्याय प्रियता है।  


कुछ लोग यह शंका करते है कि यदि ईश्वर पुण्य के समान पापों का भी फल उसी अनुपात में देता हैं।  तो फिर वह दयालु कैसे? क्योंकि अपराधी को क्षमा करना दया है। जब ईश्वर पापों को क्षमा ही नहीं करता तो फिर दयालु कैसे सिद्ध हुआ? अगर ईश्वर न्यायकारी है? उसी अनुपात में दंड देता है। तो फिर वह दयालु हो ही नहीं सकता। दयालु और न्याय प्रियता दोनों विपरीत गुण हैं। दोनों ही गुण ईश्वर के कैसे हो सकते है?


इस शंका का मूल कारण दयालु का यथार्थ अर्थ को नहीं समझना है। एक अपराधी को क्षमा करके छोड़ देना , दया नहीं। उसके और सब जगत के साथ अन्याय करना है। पापी को पाप का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। दण्ड का उद्देश्य अपराधी सुधार, दूसरों को उससे और उस जैसे लोगों से बचाना और धर्म नीति तथा राज नियम के महत्व को समाज में स्थापित रखना है।  दण्ड मिलने में ही पापी का भला है। उसे दण्ड न देना उसके दोषों को बढ़ाना है। और वह उस पर अत्याचार करना है। 


सत्य तो यह है कि परिणाम की दृष्टि से न्याय और दया का नाम मात्र भेद है। क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है, वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दुखों को प्राप्त न हो। वही दया कहलाती है, जो पराये दुःखों का छुड़ाना है।  इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सब की सुख देने और दुःख छुड़ाने की इच्छा एवं कृपा करना है। वह दया और उपकार की दृष्टि से न्याय कहलाता है। दोनों का प्रयोजन जीवात्माओं को  पाप और दुःखों से दूर करना हैं। 


इसलिए तीर्थ यात्रा या गंगा स्नान से मुक्ति, पीर या कब्र पूजा से बरकत, गिरिजा घर में जाकर प्रार्थना से पाप क्षमा होना,  केवल इस्लाम और रसूल पर विश्वास से जन्नत का नसीब होना सब भ्रम हैं। मनुष्य जैसे कर्म करेगा उसे वैसा ही फल निश्चित रूप से मिलेगा।    


दण्ड को न्याय और उसके प्रयोजन को दया कहते है। 

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