“ईश्वर सृष्टि उत्पत्ति सहित सभी अपौरुषेय कार्य जीवों के कल्याणार्थ करता है”

 ओ३म्

“ईश्वर सृष्टि उत्पत्ति सहित सभी अपौरुषेय कार्य जीवों के कल्याणार्थ करता है”

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संसार में तीन मूल सत्तायें हैं जिन्हें हम ईश्वर, जीव तथा प्रकृति के नाम से जानते हैं। आकाश का भी अस्तित्व है परन्तु यह एक चेतन व जड़ सत्ता नहीं है। आकाश खाली स्थान को कहते हैं जिसमें अन्य सभी सत्तायें आश्रय पाये हुए हैं। इसी प्रकार से संसार में दस दिशायें भी हैं परन्तु इनका भौतिक रूप में अस्तित्व नहीं है। इसी प्रकार से काल वा समय भी प्रयोग में आते हैं परन्तु इनका अस्तित्व सूर्य, चन्द्र एवं पृथिवी आदि के बनने के बाद से प्रयोग में आता है। मूल सत्तायें केवल तीन ईश्वर, जीव और प्रकृति हैं जिनको हम इनके गुण, कर्म व स्वभाव आदि के अनुसार जानते व प्रस्तुत कर सकते हैं। ईश्वर एक सत्तावान पदार्थ है। वेदों में ईश्वर के सत्यस्वरूप पर विस्तृत एवं यथार्थ प्रकाश पड़ता है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप है। वह निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र एवं सृष्टिकर्ता है।


ईश्वर जीवों को उनके कर्मानुसार जन्म देता व पालन करता है तथा उनके कर्मों के फल प्रदान करता है। मनुष्य को जो सुख व दुःख प्राप्त होता है वह ईश्वर से जीव के कर्मों के अनुसार अपने अपने शरीर के माध्यम से स्वस्थ शरीर तथा रोग आदि सहित सम व विषम परिस्थितियों के द्वारा प्राप्त होता है। ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्दस्वरूप है। आनन्दस्वरूप होने से उसे अपने लिये कुछ पुरुषार्थ व कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। वह तो सृष्टि व प्रलय दोनों अवस्थाओं में अपने आनन्दस्वरूप में सुखी व प्रसन्नतापूर्वक रहता है। चेतन, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान तथा दयालु आदि गुणों से युक्त होने के कारण वह अनादि व नित्य अल्पज्ञ व अल्पशक्ति से युक्त एकदेशी व ससीम जीवों के सुख व कल्याण के लिये इस सृष्टि को रच कर उन्हें जन्म देता है। ईश्वर जीवों को उनके कर्मानुसार सुख, दुःख सहित उनकी ज्ञान, उपासना, सत्कर्म, परोपकार आदि के अनुसार विशेष सुख व मोक्ष आदि भी प्राप्त कराता है। इससे जीव जन्म व मरण से होने वाले दुःखों से दीर्घ अवधि 31 नील10 खरब 40 अरब वर्षों के लिये छूट जाते हैं। जीवों के प्रति इस दया के कारण ईश्वर सभी जीवों, मनुष्यों व प्राणियों का वन्दनीय, पूजनीय, भजनीय तथा उपासनीय होता है। ईश्वर की उपासना से जीव की आत्मा में ज्ञान की प्राप्ति सहित उसे सात्विक सुख तथा सन्तोष की प्राप्ति भी होती है। उपासना से मनुष्य के ज्ञान में निरन्तर वृद्धि होती जाती है जो उसे ईश्वर साक्षात्कार तथा जन्म-मरण रहित मोक्ष को प्राप्त कराती है।


ईश्वर को अपने सुख आदि प्रयोजन के लिये किसी कार्य को करने की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार से एक साधन सम्पन्न व्यक्ति उपकार के कार्य नहीं करता तो वह लोगों में निन्दनीय होता है। इसी प्रकार सर्व साधन सम्पन्न होने पर ईश्वर यदि जीवों पर दया और उनके कल्याण के कार्य न करता तो वह निन्दनीय होता। सभी मनुष्यों को भी अपनी अपनी सामथ्र्य के अनुसार परोपकार रूपी सत्कार्य करने चाहियें, यह सिद्धान्त निश्चित होता है। ऐसा करने वाले मनुष्य ही यश व कीर्ति रूपी सुख को प्राप्त होते हैं। ईश्वर सर्वज्ञानमय सत्ता होने से उसे अपने कर्तव्यों का पूर्णतया बोध है। वह उन सबका उत्तम रीति से पालन कर रहा है। इसी दृष्टि से उसने अपनी सामर्थ्य से प्रकृति नामी उपादान कारण से, जो सत्व, रज व तम गुणों वाली है, इसमें क्षोभ व विकार करके इस सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, इतर ग्रह एवं उपग्रह से युक्त इस सृष्टि व समस्त ब्रह्माण्ड को बनाया है। ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार ईश्वर की अपौरुषेय रचना है। अपौरुषेय रचनायें वह कार्य होते हैं जिन्हें परमात्मा किया करता है परन्तु मनुष्य जिन्हें अपने अल्प ज्ञान व शक्ति के कारण नहीं कर सकता। हमारा यह संसार व इसके सूर्य, चन्द्र, भूमि सहित अग्नि, वायु, जल, आकाश, पर्वत, नदियां व समुद्र आदि परमात्मा की बनाई हुई अपौरुषेय रचनायें हैं। इन कार्यों से ही ईश्वर का अस्तित्व प्रकट व सिद्ध होता है। यदि ईश्वर न होता और वह सृष्टि की रचना न करता तो यह संसार कदापि अस्तित्व में नहीं आता।


जो बुद्धिजीवी व शिक्षित जन इस सृष्टि को देखकर ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, वह अविद्या व अज्ञान से ग्रस्त होते हैं। एक प्रकार से वह एक मनोविकार से ग्रस्त होते हैं कि किसी भी स्थिति में ईश्वर के सत्य अस्तित्व को नहीं मानना है। जो मनुष्य ईश्वर को मानते हैं वह सब अज्ञानी नहीं होते। हमारे सभी शास्त्रकार व ऋषि महाज्ञानी थे, ज्ञान व तर्क पूर्वक ईश्वर को मानते व सिद्ध करते थे। इस लिये ईश्वर का होना एक सत्य सिद्धान्त है। सभी मनुष्यों को ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर उससे यथायोग्य लाभ लेने के लिये ईश्वर के ज्ञान वेद तथा ऋषियों के वेदों पर व्याख्यान रूप ग्रन्थों मुख्यतः उपनिषद, दर्शन तथा शुद्ध मनुस्मृति आदि सहित ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि का अध्ययन करना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य की ईश्वर विषयक सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं और उसकी आत्मा ईश्वर के प्रति विश्वास को प्राप्त होकर स्वतः उसकी उपासना में प्रवृत्त हो जाती है।


ईश्वर ने 1 अरब96 करोड़ वर्ष पूर्व सृष्टि के आदिकाल में इस सृष्टि को उत्पन्न किया था। सृष्टि को उत्पन्न कर उसने सभी वनस्पतियों, ओषधियों सहित अन्यान्य प्राणियों को भी उत्पन्न किया था। इस प्रक्रिया को सम्पन्न कर परमात्मा ने तिब्बत में मनुष्योत्पत्ति के लिये उपयुक्त स्थान पर अमैथुनी सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न किया। इन मनुष्यों में अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा तथा ब्रह्मा जी आदि ऋषि भी उत्पन्न हुए थे। मनुष्य को ज्ञान की आवश्यकता होती है। बिना ज्ञान के मनुष्य की कोई भी क्रिया भली प्रकार से सम्पन्न नहीं होती। अतः सर्वज्ञ वा सर्वज्ञानमय परमात्मा द्वारा सृष्टि का उपयोग करने के लिये मनुष्य को यथोचित ज्ञान दिया जाना भी कर्तव्य था। ईश्वर अपना कर्तव्य न जाने व उसे पूरा न करें, यह विचार करना भी उचित नहीं है। ईश्वर को अपने सभी कर्तव्यों का पूर्णतः ज्ञान था, अतः उसने सभी के लाभार्थ सभी उत्पन्न मनुष्यों में सबसे अधिक योग्य अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा चार ऋषियों को एक एक वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। यह ज्ञान शब्दमय तथा वैदिक भाषा में था। इन वेदों व वेदमन्त्रों के अर्थ, भाव व तात्पर्य भी यथोचित रूप से ईश्वर ने ही इन ऋषियों की आत्मा में बताये व प्रकट किये थे। ईश्वर ने यह ज्ञान इन ऋषियों को अपने सर्वान्तर्यामी स्वरूप से जीवों की आत्मा में स्थित होकर व उन्हें ध्यानावस्था में प्रेरित कर दिया था। इन चार ऋषियों ने एक एक वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे ब्रह्मा जी नाम के ऋषि को दिया तथा इनसे अन्य लोगों को उपदेश, शिक्षा व पठन-पाठन सहित वेद प्रचार की परम्परा का आरम्भ हुआ था।


वेदों का ज्ञान पूर्ण ज्ञान है। वेदों को पढ़कर मनुष्य को संसार विषयक समुचित ज्ञान हो जाता है। वह इस ज्ञान से युक्त होकर अपनी इच्छा के अनुसार अनुसंधान व अन्वेषण कर किसी भी ज्ञान को खोज कर अपनी आवश्यकता के अनुरूप पदार्थों को बना सकता है। प्राचीन काल में ही इन ऋषियों ने वेदों से लेकर गणित विद्या का विकास किया था। खगोल ज्योतिष के ग्रन्थ भी अस्तित्व में आये थे। हमारे देश में विमान भी होते थे। लोग धन, ऐश्वर्य सम्पन्न होते हैं। ईश्वर का ध्यान व उपासना कर लोग ईश्वर का साक्षात्कार करते थे। अन्य लोगों को सदुपदेश भी करते थे और मोक्ष आदि को प्राप्त कर आत्मा की उच्चतम उन्नति किया करते थे। वेदों का ज्ञान प्रदान करना व प्राप्त करना तथा इसकी प्रक्रिया भी अपौरुषेय होती है। परमात्मा के अनेक उपकारों में वेदों का ज्ञान देना भी उत्तम अपौरूषेय कार्य है। यदि परमात्मा वेदों का ज्ञान न देता तो अद्यावधि पर्यन्त सभी लोग अज्ञानी रहते। मनुष्य में यह सामथ्र्य नहीं है कि वह स्वयं किसी भाषा की उन्नति व विकास कर सकें यदि वह किसी भी भाषा को बोलना व व्यवहार करना न जानते हों। संसार में जितनी भी प्रचलित भाषायें हैं वह सब वेदों की भाषा संस्कृत में ही विकार व अपभ्रंस प्रक्रिया से उत्पन्न हुई हंै। सभी भाषाओं का आधार व जननी वेदों की संस्कृत भाषा ही है। अतः समस्त ज्ञान व भाषायें परमात्मा द्वारा प्रदत्त अपौरूषेय ज्ञान वेदों से ही हमें प्राप्त हुई हैं। इस कारण से भी हम सब मनुष्य परमात्मा के कृतज्ञ हैं।


परमात्मा ने ही मनुष्यों सहित सभी प्राणियों के शरीरों को बनाया है। हमें जो सुख व दुःख प्राप्त होता है वह हमारे ही कर्मों का परिणाम होता है। परमात्मा एक स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायाधीश की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने समस्त ब्रह्माण्ड व सभी जीवों को धारण किया हुआ है। वह हर क्षण क्रियाशील रहते हैं और इस ब्रह्माण्ड की रक्षा व संचालन करते हुए सभी जीवों को सुख प्रदान करते रहते हैं। उनका जीवों पर जो उपकार है उसे शब्दों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। अतः सभी जीव ईश्वर के कृतज्ञ हैं। इसके लिये सभी मनुष्यों व जीवों को ईश्वर की उपासना करनी चाहिये। उपासना कर उसका धन्यवाद एवं उसकी स्तुति करनी चाहिये। हम ईश्वर से प्रार्थना भी कर सकते हैं। ईश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं को सुनता व जानता है। वह हमारी पात्रता के अनुसार उन्हें पूरा भी करता है। अतः हमें अपनी पात्रता पर भी ध्यान देना चाहिये। ईश्वर की उपासना से आत्मा के ज्ञान में वृद्धि होने सहित आत्मा का बल बढ़ता है। आत्मबल यहां तक बढ़ता है कि पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी मनुष्य घबराता नहीं है। यह कोई छोटी बात नहीं है? अतः सभी मनुष्यों को वेदों सहित ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय व अध्ययन करना चाहिये और इनसे प्राप्त ज्ञान के अनुसार ईश्वर की उपासना कर ईश्वर का प्रिय बनने का प्रयत्न करना चाहिये। हमारे सभी कर्तव्य सत्य व न्याय पर आधारित होने सहित पक्षपात से सर्वथा रहित होने चाहियें। ऐसा करने से ही हम ईश्वर के प्रिय बन कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वर ने हमारे व हमारे समान जीवों के लिये ही इस सृष्टि की उत्पत्ति की व इसका पालन कर रहा है। हमें भी उसके जैसा बनकर श्रेष्ठ कार्यों को करना चाहिये। ओ३म् शम्।


-मनमोहन कुमार आर्य 

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