सैनिक शिक्षा के पुरोधा धर्मवीर डा. मुंजेे

 शत्-शत् नमन12 दिसम्बर/जन्म-दिवस, सैनिक शिक्षा के पुरोधा धर्मवीर डा. मुंजेे


स्वतत्रता सेनानी डा. बालकृष्ण शिवराम मुंजे भारत के प्रत्येक युवक को सैनिक शिक्षा देने के प्रबल समर्थक थे। उनका जन्म 12 दिसम्बर, 1872 को बिलासपुर (म.प्र.) में हुआ था। कुश्ती, व्यायाम एवं घुड़सवारी के शौकीन होने के कारण इनका शरीर बचपन से ही बहुत पुष्ट था। इनके पिता इन्हें वकील बनाना चाहतेे थे, पर इन्होंने मुम्बई के मैडिकल कॉलिज में प्रवेश लिया और चिकित्सक बन गये। इन्हें वहीं सरकारी नौकरी भी मिल गयी।


मुम्बई में इनका सम्पर्क लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से हुआ। इससे इनके जीवन को नयी दिशा मिली। एक बार ये चिकित्सक दल के साथ अफ्रीका गये। वहाँ इनकी भेंट गांधी जी से हुई। वहाँ से लौटकर ये बिलासपुर में निजी नेत्र चिकित्सक के रूप में काम करने लगे।


पर देश और हिन्दू समाज की दुर्दशा देखकर ये राजनीति में आ गये। ये कांग्रेस में तिलक जी के समर्थक थे। इन्हें गांधी जी की अहिंसा और मुस्लिम चाटुकारिता पसन्द नहीं थी। जब गांधी जी ने तुर्की के खलीफा की गद्दी की पुनर्स्थापना के लिए हुए ‘खिलाफत आन्दोलन’ का पक्ष लिया, तो इन्होंने उसका विरोध किया। वे इसे ‘खिला-खिलाकर आफत खड़ी करना’ बताते थे।


फिर भी कांग्रेस के एक अनुशासित सिपाही की भाँति इन्होंने जंगल सत्याग्रह एवं नमक सत्याग्रह में भाग लिया। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के नाते ये दो बार लन्दन के गोलमेज सम्मेलन में गये। वे मुस्लिम लीग की देशद्रोही चालों को खूब समझते थे। वहाँ उन्होंने बंगाल, पंजाब और सिन्ध को मुस्लिम बहुल घोषित करने का विरोध किया, पर उनकी बात नहीं मानी गयी।


डा. मुंजे छात्रों को सैनिक शिक्षा देने के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने नागपुर में एक राइफल क्लब की स्थापना भी की। इटली प्रवास में उन्होंने संग्रहालय के बदले वहाँ का सैनिक विद्यालय देखना पसन्द किया। मालवीय जी से भेंट में उन्होंने इस बात पर आपत्ति की, कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सैन्य विभाग नहीं खोला गया है। अब वे स्वयं इस दिशा में प्रयास करने लगे।


सैनिक विद्यालय की भूमि हेतु वे मुम्बई के गवर्नर से मिले; पर उसने कोई सहयोग नहीं दिया। वह समझ गया कि इसमें अंग्रेजों के विरोधी सैनिक ही निर्माण होंगे। कुछ समय बाद नासिक में स्थान तथा कई लोगों से आर्थिक सहयोग मिल गया। इस प्रकार ‘भोंसला सैनिक विद्यालय’ की स्थापना हुई।


डा. मुंजे भगवान राम को अपना एवं भारत का आदर्श मानते थे। अतः विद्यालय की भूमि को ‘रामभूमि’ और छात्रों को ‘रामदंडी’ कहा जाता था। इसमें सामान्य शिक्षा के साथ घुड़सवारी और तैराकी से लेकर सैनिकों के लिए अनिवार्य सभी विषयों का प्रशिक्षण दिया जाता है।


डा. मुंजे आजीवन हिन्दू हितों के लिए समर्पित रहे। इसीलिए इन्हें ‘धर्मवीर’ की उपाधि दी गयी। केरल में मोपलाओं द्वारा हिन्दुओं के धर्मान्तरण के बाद उन्होंने परावर्तन के काम में अनेक लोगों को सक्रिय किया। इससे हजारों लोग फिर से हिन्दू धर्म में लौट आये। शुद्धि एवं परावर्तन हेतु बलिदान हुए स्वामी श्रद्धानन्द की स्मृति में उन्होंने नागपुर में अनाथालय की स्थापना की।


धर्मवीर डा. बालकृष्ण शिवराम मुंजे का देहान्त 4 मार्च, 1948 को हुआ। 1972 में उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर नागपुर में उनकी पूर्णाकार प्रतिमा का अनावरण फील्ड मार्शल जनरल करियप्पा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी ने किया।

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