ईश्वर पापों को क्षमा नहीं करता


 


ईश्वर पापों को क्षमा नहीं करता
वेद में कहा है कि--(ऋक.2/12/10)
       भावार्थ-- यदि परमेश्वर दुष्ट आचरण वालों को ताड़ना न दे, धार्मिकों का सत्कार न करें और डाकुओं को नष्ट न करें तो न्याय व्यवस्था नष्ट हो जाय।
 यदि परमेश्वर पापों को क्षमा करने लगे तो वह लौकिक शासक या न्यायाधीश के समान हो जायेगा। जो उसकी स्तुति आदि करेंगे, उनके प्रति उसका व्यवहार दया और सहानुभूतिपूर्ण होगा। इसके विपरीत जो उसकी स्तुति आदि नहीं करेंगे, उनके प्रति उसका व्यवहार उपेक्षापूर्ण होगा। यह परोक्षरूप से अपनों का उपकार करना ही है, इसी में स्वार्थ निहित है। तब परमेश्वर सब प्राणियों के लिए एक जैसा नहीं रहेगा। परमेश्वर के इस व्यवहार से वह खुशामदियों से घिरे शासक के समान होगा, जिसमें राग, द्वेष, घृणा, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि सब दोष होंगे। इस प्रकार के जगनियन्ता से न्याय की आशा कैसे की जा सकती है?
       वेद वर्णित परमेश्वर कृतज्ञता पाने के लिए अपराधी को क्षमा नहीं करता, न बदले की भावना से किसी को दण्डित करता है। उसकी न्याय व्यवस्था इतनी पूर्ण है कि उसमें यथायोग्य व्यवहार होने से न निर्दोष दण्डित हो सकता है और न अपराधी छूट सकता है। 'ना भुक्तं क्षीयते कर्म'-- कृतकर्म का फल भोगे बिना उससे छुटकारा नहीं मिल सकता।


 'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्'
        किए हुए कर्म का फल कर्ता को अवश्य ही भोगना पड़ता है।
वस्तुतः परमेश्वर के व्यवहार में दया और न्याय का विलक्षण समन्वय है परमेश्वर द्वारा दिया गया दण्ड दुष्कर्मी पर भी दया है, क्योंकि दण्ड का फल पाकर वह दुष्कर्मो के फल से मुक्त हो जाता है। वहीं वह यह भी जान लेता है कि अगर वेद विरुद्ध आचरण करेगा अर्थात दुष्कर्म या अशुभ कर्म करेगा तो उसका फल उसे अवश्य ही मिलेगा। परिणामस्वरूप भविष्य में वह दुष्कर्मों से विरत हो जाता है और इनसे मिलने वाले दुःख, कष्ट और पीड़ा से बच जाता है।                       दुष्कर्मों को त्याग कर सतत शुभ कर्मों का सम्पादन करते रहने से उसे जन्म- जन्मान्तरों में सुख आनन्द की प्राप्ति होती रहती है।
प्रायश्चित्त  या पश्चाताप भविष्य में पापकर्मों से निवृत्त करने में सहायक हो तो सकते हैं लेकिन कृतकर्मों का फल अवश्य मिलता है। वस्तुतः परमेश्वर तटस्थ भाव से सब जीवो के कर्मों का साक्षी रहते हुए ही न्यायपरायण हो सकता है और है। वेद का आदेश है--  (ऋक.1/23/22)
       भावार्थ-- मनुष्य के द्वारा जैसा पाप और पुण्य किया जाता है, वैसा ही ईश्वर की न्याय व्यवस्था से उन्हें (फल) प्राप्त होता है, यह निश्चय है।
 प्रभात मुनि, आर्य वानप्रस्थ आश्रम, 
ज्वालापुर, हरिद्वार।
"तमसो मा ज्योतिर्गमय" पुस्तक के सौजन्य से।
(forwarded as received)


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