भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है

   (13 अक्तूबर/ पुण्य-तिथि)
                 भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है, उनमें भगिनी निवेदिता का नाम सबसे पहले आता है.
                 भगिनी नेवेदिता का बचपन का नाम मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल था। मार्गरेट का जन्म 28 अक्टूम्बर, 1867 को काउंटी टाईरोन, आयरलैंड में हुआ था। मार्गरेट के पिता का नाम श्री सैमुएल रिचमंड नोबेल और माता का नाम मैरी इसाबेल था। 
                मार्गरेट ने अपनी शिक्षा हेलिफेक्स कॉलेज से पूर्ण की जिसमे उन्होंने कई विषयों के साथ-साथ संगीत और प्राकृतिक विज्ञान में दक्षता प्राप्त की। मार्गरेट ने 17 वर्ष की आयु में शिक्षा पूर्ण करने के बाद अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उनके मन में धर्म के बारे में जानने की बहुत जिज्ञासा थी।
                मार्गरेट को एक बार पता चला की अमेरिका में ओजस्वी भाषण देने के बाद इंग्लैड पधारे है तो मार्गरेट ने उनसे मिलने का निश्चय किया और वो लेडी मार्गसन के आवास पर स्वामी से मिलने गई। स्वामी जी के तेजस्वी व्यक्तित्व से वो बहुत प्रभावित हुई।  मार्गरेट नोबेल स्वामी जी के वेदांत दर्शन से इतनी अधिक प्रभावित हुई की उनका हृदय आध्यात्मिक दर्शन की ओर प्रवृष्ट हो गया।
                भगिनी निवेदिता का वास्तविक नाम मार्गरेट नोबेल था। वे आयरिश मूल की रहने वाली थी।
उनके के पिता एक चर्च में उपदेशक थे।
                वो सर्वप्रथम 1896 में भारत आई। 25 March 1898 को उन्होंने ब्रह्मचार्य के व्रत को अंगीकार किया। उन्होंने ग्रामीण बल विधवाओं को कलकत्ता में लाकर शिक्षित किया।
                उन्होंने बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक school भी खोला।
                उनकी मृत्यु 13 अक्टूम्बर, 1911 को दार्जलिंग में हुई और उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज से किया गया।
                स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा “मुझे सभी से आशा नहीं है, मुझे कुछ चुने हुए 20 लोग चाहिए जो अपना सम्पूर्ण जीवन संसार सेवा में न्योछावर कर सकें”
                अगले ही दिन सुबह ही एक चेहरा उनके सामने था स्वामी जी ने कहा बताये आपकी क्या सेवा करूँ.
                उसने कहा - ” स्वामी जी आपने कल 20 लोगो के बारे में बात की थी 19 लोगो का तो पता नहीं, पर 1 मै हूँ ”
"और वह थी भगनी निवेदिता”
                स्वामी विवेकानन्द का मानना था की भारत की मुक्ति महिलाओं के हाथ में है इसलिए उन्हें शिक्षा द्वारा जागृत करना बहुत जरुरी है। स्वामी जी एक ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो भारतीय महिलाओं को जागृत करके उनमे राष्ट्रीय चेतना की भावना विकसित कर सके।
                स्वामी जी को मार्गरेट में इन गुणों का समावेश दिखाई दिया जिनकी उनको तलाश थी और इसलिए उन्होंने मार्गरेट से आग्रह किया कि –
                वो भारत आकर उनकी मदद करे और जो उनकी महिलाओं के लिए योजनाएँ है या जैसा वो सोचते हैं उसे यथार्थ में करने में मदद करें।
                मार्गरेट नोबेल ऐसा अवसर को कैसे चूक सकती थीं उन्होंने तुरंत ही हाँ बोल दिया। वे 1896 में भारत आईं और यहाँ की गतिविधियों में भागीदारी करने लगी। 25 मार्च 1898 को स्वामी जी ने मार्गेट नोबेल को ब्रह्मचर्य की शपथ दिलाते हुए दीक्षा प्रदान की और उनका नाम निवेदिता रख दिया। इस अवसर पर स्वामी जी ने कहा-
                जाओ और उसका अनुसरण करो, वो जिसने बुद्ध की दृष्टि प्राप्त करने से पहले 500 बार जन्म लिया और अपना जीवन न्योछावर कर दिया
                आगे चल कर मार्गरेट नोबेल भगिनी निवेदिता ( Sister Nivedita) नाम से विख्यात हुईं।
                भगिनी निवेदिता ने महिला शिक्षा के माध्यम से भारत की महानता को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया और उन्हें इसमें सफलता भी मिली। मार्गरेट ‘बसु पद्धति’ से काफी प्रभावित थीं। उस समय ग्रामीण बंगाल में विधवाओं पर कठोर अनुशासन थोपे जाते थे जो की एक उदार व्यक्ति के हृदय को व्यथित करने के लिए काफी था।  इसलिए मार्गरेट विधवा महिलाओं को कलकत्ता लाकर उन्हें बसु पद्धति से शिक्षा देतीं और उन्हें प्रशिक्षित करके गाँवो में वापस भेज देतीं ताकि वे और लोगो को शिक्षित कर सकें।
                भगिनी निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद के साथ कई स्थानों पर भ्रमण किया और स्वामी जी के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक स्कूल खोला। बालिका शिक्षा में जब भी सिस्टर निवेदिता को धन की जरूरत हुई तो उसके लिए श्रीमती बुल ने उनकी आर्थिक मदद की।
                जब भारत में प्लेग और कालरा रोग फैल गया था तब अंग्रेजों ने कोई कार्य नहीं किया लेकिन भगिनी निवेदिता ने विषम हालात में भी रोग पीड़ितों की हर सम्भव मदद की थी। स्वामी विवेकानन्द के देह त्यागने के बाद उनके मिशन को संचालित करने का दायित्व भगिनी निवेदिता ने सम्भाला और उसे अच्छी तरह निभाया।
                वो एक अच्छी लेखिका भी थी और उन्होंने- “द मास्टर एज आई सॉ हिम”, “ट्रेवल टेल्स”, “क्रेडल टेल्स ऑफ़ हिंदूइजम” आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ है।
                भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 को अपना देह त्याग दिया। उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया गया। ऐसी अद्भुत नारी, जिसने विदेशी होते हुए भी अपना पूर्ण जीवन भारत की सेवा में बिताया, हम सभी को हेमशा-हेमशा के लिए याद रहेगी। हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं।
चण्डीगढ़


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