उपनिषद् ज्ञान गङ्गा


उपनिषद् ज्ञान गङ्गा
[भाग 2]


• जीवन क्या है?


उक्थम् (बढ़ना)- जीवन बढ़ने का नाम है। जीवन के कारण ही सब कुछ बढ़ता है। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, उसकी सन्तान बढ़ने वाली और बलवान होती है। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, वह उक्थ (बढ़ने) के स्वभाव और उसके स्थान को प्राप्त कर लेता है (उक्थ-रूप बन जाता है)।


यजु: (सङ्गठन)- जीवन सङ्गठन का नाम है। जहां जीवन है, वहां सङ्गठन है। जो ऐसा जानता है, उसकी बड़ाई के लिए सारे प्राणी उससे मिल जाते हैं। जो ऐसा जानता है वह यजु (सङ्गठन) के स्वभाव और उसके स्थान को प्राप्त कर लेता है (सङ्गठन-रूप ही बन जाता है)।


साम (अपने समान बना लेना, अपने आप में लय कर लेना)- जीवन अपने आप में विलीन कर लेने का नाम है। जहां जीवन है, वहां भिन्न-भिन्न पदार्थ एक ही बन जाते हैं। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, उसकी बड़ाई के लिए सारे प्राणी एक रूप ही हो जाते हैं। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, वह साम के स्वभाव और स्थान को प्राप्त कर लेता है (साम-रूप ही हो जाता है)।


क्षत्र (अपनी रक्षा करना)- जीवन अपनी रक्षा करने का नाम है। जहां जीवन है, वहां बाहरी आक्रमणों से अपनी रक्षा की ही जाती है। जो ऐसा जानता है, वह अपनी रक्षा आप करता है। कोई दूसरा उसके लिए नहीं कर सकता। वह क्षत्र के स्वभाव और स्थान को प्राप्त कर लेता है (क्षत्र-रूप ही बन जाता है)। [बृहदारण्यक० ५/१३]


[जीवन के चार चिह्नों का यहां वर्णन किया गया है। हर एक जीवित पदार्थ बढ़ता है। वह सम्पूर्णतः एक पदार्थ की भांति काम करता है। वह जीवित रहने के लिए अपने आस-पास से भोजन लेता और उसे अपना अङ्ग बना लेता है। वह अपनी रक्षा के लिए जितना यत्न कर सकता है, करता है।
इसे समझने के लिए मनुष्य शरीर को देखें। मनुष्य जीवन का आरम्भ एक घटक (सेल 'cell') से होता है। इसका एक भाग पिता के शरीर से आता है, दूसरा माता के शरीर से। यह घटक बहुत छोटा होता है। यह एक से दो होता है, दो से चार और चार से आठ। इसी प्रकार ये घटक बढ़ते जाते हैं। माता के गर्भ से जिस समय बच्चा बाहर आता है, उस समय उसका वजन साढ़े चार सेर के लगभग होता है। इस काल में उस एक घटक ने अपने आपको अनेक घटकों में परिवर्तित कर लिया है। बीस वर्ष का युवक होने तक वह तीन-साढ़े तीन सेर प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ता है। यह सब भी घटकों के विभाजन से होता है। युवक पुरूष के शरीर में ६० लाख करोड़ घटक होते हैं। अगर उन्हें आर्य्यावर्त्त के छोटे-बड़े पुरुषों और स्त्रियों में बांटें, तो प्रत्येक के हिस्से में डेढ़ लाख घटक आयेंगे। प्रारम्भ के एक घटक ने ही बढ़ते-बढ़ते यह रूप धारण कर लिया है।
शरीर के विभिन्न अङ्ग अपना-अपना काम करते हैं। परन्तु इन सब कार्य्यों का एकमात्र लक्ष्य शरीर का जीवन स्थिर रखना और बढ़ाना होता है। और यथार्थ तो यह है कि मेरी आँखें नहीं देखती, मैं आँखों से देखता हूं; मेरा आमाशय भोजन नहीं पचाता, मैं भोजन पचाता हूं। मनुष्य का शरीर सङ्गठन का एक बहुत अच्छा उदाहरण है।
जीवन के सम्बन्ध में यह बात बड़ी आश्चर्यजनक है कि जीवित पदार्थ दूसरी वस्तुओं को अपने में लय कर लेता है और अपना अङ्ग बना लेता है। मैं फल और चावल खाता हूं; कुछ घण्टों के उपरान्त न चावलों का पता मेरे शरीर में लगता है न फल का। वे मेरे मांस, मेरे रुधिर और मेरी हड्डियों के रूप में बदल जाते हैं। बच्चा पीता दूध है परन्तु उससे अपना मांस और रुधिर बनाता है। नीम का वृक्ष खेती की खाद और मिट्टी को नीम बना लेता है और आम का वृक्ष आम बना लेता है।


जहां जीवन है, वहां आत्मरक्षा भी उपस्थित है। बाहर की गर्मी ६० अंश हो या ११५ अंश, परन्तु मेरा शरीर अपना तापमान ९८.४ अंश स्थिर बनाये रखता है। छोटी से छोटी जीवित वस्तु अपने जीवन को स्थिर बनाये रखने के लिए यत्न करती है।
जीवन के ये चिह्न जातियों की अवस्था में भी देखे जाते हैं। इनके आधार पर हम बलवान और निर्बल जातियों में भेद कर सकते हैं।]


[सन्दर्भ ग्रन्थ- जीवन ज्योति; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]


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