मन पतित होने के कारण

मन पतित होने के कारण
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  किन वस्तुओं से मन पतित होता है? अथर्ववेद में एक मन्त्र आता है―


  यथा मांसं यथा सुरा यथाक्षा अधिदेवने । यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः ।।
―(अथर्व० ६/७/७०/१)


   भावार्थ―ये चार वस्तुएँ हैं जिनसे मन पतित होता है―मांस, शराब, जुआ और पराई स्त्री या पराए पुरुष के साथ सम्बन्ध।


  ये चारों बातें मनुष्य को मार डालती हैं। इतना मैला कर देती हैं कि फिर इसे शुद्ध करने में वर्षों लग जाते हैं। 


   स्वाध्याय का अर्थ यह है कि प्रतिदिन अपने सूक्ष्म शरीर की किताब को देखो, देखो कि इन चारों में से कोई बात तो इसमें नहीं लिखी गई? यदि लिखी गई है तो सँभलो ! जो प्रतिदिन पढ़ता है, प्रतिदिन देखता है वह सँभलता है।


   और फिर यदि अब न पढ़ोगे, तो एक-न-एक दिन वह पुस्तक पढ़नी अवश्य पड़ेगी, खुलकर वह सामने आ जाएगी और एक-एक करके उसके पन्ने उठेंगे, एक-एक करके सब-कुछ सामने आयेगा, जब साँस समाप्त होने लगेंगे। जब हिचकी बँध जाती है, जब मृत्यु सामने आकर खड़ी हो जाती है, उस समय यह पुस्तक स्वयं ही खुल जाती है। मनुष्य इसे देखता है, देखता है कि इसमें बहुत-सी बुरी बातें लिखी गई हैं, देखता है कि इन्हें अब बदला नहीं जा सकता, (जब बदलने का समय था,तब तो तू बदला नहीं) इनके कारण आगे कितने ही कष्ट आने वाले हैं। तब वह रोता है, आँखों से पानी की धारा बहने लगती है, आस-पास बैठे लोग कहते हैं, "अब नीर जारी हो गया, यह अब बचेगा नहीं।"


   वास्तव में नहीं बचेगा। यह 'नीर' क्या है? पश्चात्ताप के आँसू जो सूक्ष्म शरीर की पुस्तक को देखकर बहते हैं। एक-एक पन्ना मरने वाले के सामने आता है। प्रत्येक पन्ने पर लिखा है―तुमने यह बुरा कर किया ।


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