स्वाबनें।र्थ सिद्धि तो करें। परंतु अतिस्वार्थी न 

स्वाबनें।र्थ सिद्धि तो करें। परंतु अतिस्वार्थी न 
       स्वार्थ तो जीवात्मा का स्वभाव ही है। स्वभाव कभी छूटता नहीं। सभी आत्माएँ एक जैसी हैं। इसलिए कुछ-कुछ स्वार्थी तो सभी हैं।
          स्वार्थ का मतलब है, स्व + अर्थ = अपने लाभ के लिए कार्य करना। अपनी कमी को पूरा करने के लिए कार्य करना। आत्मा में स्वभाव से बहुत सी कमियां हैं। जैसे कि आत्मा को धन संपत्ति भोजन वस्त्र मकान मोटर गाड़ी सम्मान सुख आदि चाहिए। इन सब चीजों की उसके पास कमी है। इसलिए वह अपनी कमियों को पूरा करने के लिए सदा प्रयत्न करता रहता है। इसे कहते हैं स्वार्थ पूर्ति करना। थोड़ी थोड़ी मात्रा में यदि सभी लोग अपना अपना स्वार्थ पूरा करें, तो इसमें कोई हानि नहीं है। ऐसा करना स्वाभाविक है। परंतु अति स्वार्थी बनना उचित नहीं है।
         स्वार्थी बनने का तात्पर्य यह है, कि उस सीमा तक अपना स्वार्थ पूरा करें, जिससे  दूसरों को हानि या कष्ट न हो. ऐसा करना उचित है।
       अति स्वार्थी बनाने का तात्पर्य यह है कि दूसरों को हानि पहुंचाकर अथवा दुख देकर अपने स्वार्थ की पूर्ति करना। यह अनुचित है।
       परंतु संसार में कुछ लोग अपनी मूर्खता के कारण जब अति स्वार्थी बन जाते हैं, तब वे अपना सामान्य स्वार्थ भी खो बैठते हैं, जो कि पहले ठीक प्रकार से पूरा हो रहा था। इतिहास की ऐसी अनेक घटनाएं आपने फिल्मों नाटकों आदि में देखी सुनी होंगी, जिनमें इस बात का चित्रण हुआ है।
       जैसे कि, कोई उपसेनापति था। उसको एक विदेशी राजा ने लोभ दिखाया कि यदि तुम अपने देशी राजा के प्रति विद्रोह करके इसको मरवा दो, तो मैं तुम्हें मेरे शासन में प्रधान सेनापति बना दूंगा।
     उपसेनापति उस विदेशी राजा की चाल में फँस गया, और उसने विदेशी राजा की सहायता की। अपने देशी राजा को मरवा दिया। जब विदेशी राजा जीत गया, तो उसने सबसे पहले उस उपसेनापति को ही मार डाला। विदेशी राजा ने सोचा कि जो व्यक्ति अपने देशी राजा के प्रति समर्पित नहीं हो पाया, वह मेरे प्रति कैसे समर्पित रह पाएगा? मैं तो विदेशी हूं।  इसलिए उसने उस उपसेनापति को मार दिया। तो अति स्वार्थ के कारण उपसेनापति को अपना जीवन भी खोना पड़ा। इसका नाम है, अतिस्वार्थी होना। ऐसी लोभ लालच भरी मूर्खता बहुत स्थानों पर देखी जाती है। तो ऐसी मूर्खता नहीं करनी चाहिए। 
      ऐसी घटनाओं से हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें भी अतिस्वार्थी नहीं बनना चाहिए। घर परिवार समाज संस्था और देश के प्रति ऐसी मूर्खता नहीं करनी चाहिए। बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए। लोभ क्रोध आदि दोषों से बचकर, न्याय पूर्वक अपना व्यवहार करना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में स्वार्थपूर्ति यदि सभी लोग सीमा में रहकर करते रहेंगे, तो सभी का काम अच्छा चलेगा, और सबको सुख मिलेगा। यही बुद्धिमत्ता और मनुष्यता है।
- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक


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