वेद में पुनर्जन्म की चर्चा

वेद में पुनर्जन्म की चर्चा
                                 डा. अशोक आर्य  
    आज विश्व में पुनर्जन्म की चर्चा सब स्थानों पर हो रही है| आर्य हिन्दू लोग तो पुनर्जन्म मानते हैं, पारसी लोग भी इसे आर्यों के ही समान स्वीकार करते हैं किन्तु ईसाई तथा मुसलमान आदि इसे नहीं मानाते, जबकि उनके पास भी आज इस प्रकार के प्रमाण आने लगे हैं, जिनके कारण उन्हें भी विवश होकर पुनर्जन्म की बातों को अपनी जुबान से स्वीकार करना पड रहा है| जहाँ तक आर्यों का प्रश्न है, आर्य संस्कृति का आधार ग्रन्थ चार वेद तथा वेद पर आधारित उपनिषद्, ब्राह्मण और दर्शन ग्रन्थ हैं| जब भी कभी किसी तथ्य को परखना होता है तो इन ग्रन्थों का ही सहारा लिया जाता है| अत: पुनर्जन्म के लिए जब हम वेद का स्वाध्याय करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि चारों वेद में अनेक मन्त्र इस प्रकार के आते हैं, जो पुनर्जन्म पर प्रकाश डालते हैं| जो लोग पुनर्जन्म को नहीं मानते, उनके अनुसार आर्य लोग निराशावादी हैं क्योंकि यह विगत जन्मों के कर्मों को भोगते हुए दु:खी होते हैं जबकि आर्यों का मानना है की किये हुए कर्मों का यथायोग्य फल भोगना ही आनंद लाने वाला होता है| ऋग्वेद के मन्त्र संख्या १०.५९.६ का अवलोकन करने से पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कुछ ज्ञान मिलता है| मन्त्र इस प्रकार है:-
                आसुनीते पुनरस्मांसू चक्षु: पुन: प्राणमिह नो धेहि भोगम्|
               ज्योक् पश्येम सूर्यंमुच्चरन्तमनुमते मृड्या न: स्वस्ति||ऋग्वेद १०.५९.६||
      इस मन्त्र की व्याख्या कारते हुए पंडित लेखराम जी ने कुल्याते आर्य मुसाफिर द्वीतीय भाग के पृष्ट संख्या ४० में इस प्रकार प्रकाश डाला है:_
      हे सुखदायक परमेश्वर! आप कृपा करके पुनर्जन्म में हमारे लिए उत्तम नेत्रादि इन्द्रियाँ स्थापन्न कीजिये और इसी प्रकार अच्छे प्राण युक्त शरीर दान दीजिये इस जन्म में और पुनर्जन्म में हम लोग उत्तमोत्तम भोग्य पदार्थों को प्राप्त हों तथा सूर्य लोक, प्राण और आपकी महिमा को विज्ञान अर्थात् शास्त्र द्वारा और प्रेमभाव से सदैव देखते रहें| हे सब को मान देने हारे अर्थात् परिणाम वेत्ता! इस जन्म और जन्मान्तरों में हमें सुखी रखिये जिससे हम लोग कल्याण को प्राप्त हों| 
      पंडित लेखराम जी द्वारा किये गए मन्त्र की इस व्याख्या के आधार पर हम सात बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कह सकते हैं कि:- 
१. परमेश्वर सुखों का देने वाला है:-
      परमपिता परमात्मा सब प्रकार के सुखों का दाता है| उसकी दया ही है जो हम ने उत्तम कर्म करने के अनंतर मानव जन्म को प्राप्त किया है| परमपिता परमात्मा का सब प्राणियों के लिए सदा ही यह आदेश होता है कि वह उत्तम कर्म करें और सुखों के साधनों को प्राप्त हों| परमेश्वर हमें किये गए कर्मों के अनुसार फल देता है| उत्तम कर्मों के लिए हमें पुरस्कृत करता है तो निकृष्ट कर्मों के लिए हमें दण्डित भी करता है| यह उस प्रभु का वैदिक विधान है अर्थात् अपने इस विधि सम्मत नियम को उस प्रभु ने वेद में स्पष्ट बता दिया है| 
      परमपिता का दंड विधान हमें सुख देता है क्योंकि जब हम अपने पापाचारों का दंड प्राप्त कर लेते हैं तो शेष रहे पुण्य कर्मों से हमें आनंद होता है जब कि पापकर्मों का दंड लेते समय भी हमें प्रसन्नता होती है क्योंकि इस के पश्चात् हमारे लिए आनंद दायक घडी आने वाली होती है| अत: दंडित होने में भी हमें कष्ट नहीं अपितु आने वाले सुखों की अनुभूति से आनंद ही मिलता है| इस प्रकार परमपिता हमें सुख देने वाला है, वह सब सुखों का आदि स्रोत है|  
२. पुनर्जन्म:-
      जीव परमपिता से प्रार्थना करते हुये मांग रहा है कि हे प्रभु! आप हमारे पुन: होने वाले जन्म में हमारे लिए उत्तम आँख, कान, नाक आदि इन्द्रियाँ स्थापित कीजिये ताकि हम इनका आनंद ले सकें| इस से स्पष्ट होता है कि जीव का मात्र एक ही जन्म नहीं होता अपितु जन्म और मृत्यु का चक्कर चलता ही रहता है| जिस प्रकार हम प्रतिदिन अपने प्रयोग से मैले हुए वस्त्रों को स्नान से पूर्व त्याग देते हैं और स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ वस्त्रों को धारण करते हैं| इस प्रकार ही हमने जो शरीर धारण किया है, यह हमारी आत्मा के वस्त्र ही है| जब तक आत्मा का यह वस्त्र स्वच्छ रहता है, गतिशील रहता है, आत्मा इसे धारण किये रखती है किन्तु ज्यों ही यह शरीर दुर्बल हो जाता है, रोगों का केंद्र बन जाता है तो यह आत्मा इस से अलग हो कर चली जाती है तथा नया जन्म लेकर नया शरीर धारण करती है| इसे ही पुनर्जन्म कहा गया है| इस प्रकार आत्मा शरीर छोड़ती और नया शरीर लेती रहती है अर्थात् शरीर की मृत्यु और जन्म की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, कभी समाप्त नहीं होती| इस जन्म मरण की प्रक्रिया को ही पुनर्जन्म का नाम दिया गया है| 
३. उत्तम शरीर दें:-
       मन्त्र में जीव मृत्यु होने अथवा शरीर को छोड़ने के पश्चात् परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मुझे अगले जन्म में उत्तम शरीर प्रदान करना| यह वाक्य भी पुनर्जन्म के ही गुणगान कर रहा है| आत्मा परमपिता से दान रूप में अच्छे प्राणों से युक्त शरीर को मांगता है, जिस शरीर में प्राण निरंतर गति करते हुए शरीर के सब अंगों में शक्ति बनाए रखें तथा सदा उत्तम कर्म करने की ही प्रेरणा दें, जिस से आने वाले अन्य जन्म भी सुखदायक हों| इस जन्म में ही नहीं आगे आने वाले जन्मों में भी हम उत्तम पदार्थों का उपभोग करें| इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा बार बार शरीर में जन्म लेता है और बार बार उसका शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है| इस बात को दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते हैं कि आत्मा अपने शरीर को धारण करता है, जब यह शरीर उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना बंद कर देता है तो यह आत्मा इस शरीर को त्याग कर किसी अन्य शरीर में जन्म ले लेता है|  आत्मा की इस प्रक्रिया को ही मृत्यु तथा जन्म कहते हैं| 
४. उत्तम भोग्य पदार्थ दें:-
        हमारी आत्मा परमपिता परमात्मा से सदा ही यह याचना करती है कि उसे इस जन्म में भी और आने वाले जन्मों में भी उत्त्मोत्तम पदार्थों की प्राप्ति हो, जिससे हमारा यह शरीर शक्ति पाकर उत्तम कर्म करता रहे| इस शरीर को सूर्य का स्वच्छ प्रकाश मिले , स्वच्छ व शीतल वायु प्राप्त हो, स्वास्थ्य वर्धक पदाथों का उपभोग कर शरीर को बलिष्ठ बनावे| आत्मा यह सब इस जन्म के लिए ही नहीं आने वाले जन्मों के लिए भी इस प्रकार के अदार्थों की प्राप्ति की इच्छा करती है| आने वाले जन्मों से ही पुनर्जन्म के सिद्धांत की पुष्टि होती है| 
५. आपकी महिमा का प्रकाश करे:-
       हे प्रभु! आपने हमारे सुखों के लिए सूर्य और चाँद आदि नक्षत्रों का निर्माण किया है| इनकी उज्जवल, तीव्र तथा शीतल ज्योति से हम आपकी महिमा को सदा मंडित करते रहें| हम इन नक्षत्रों को नहीं बना सकते किन्तु इन नक्षत्रों को देख कर इन्हें बनाने वाले अर्थात् आपकी शक्तियों का अनुमान तो हम लगा ही सकते हैं| इस महिमा को, आपकी इन शक्तियों के कारण हम सदा आपके गुणों का गान करते रहें, केवल इस जन्म में ही नहीं आने वाले जन्मों में भी करते रहें|
६. प्रेमभाव दें:-
        आपकी यह सब प्रकार की जो दया है अथवा जो महिमा है, इसका अवलोकन करते हुए हम कभी इर्ष्या न करें अपितु इस को हम सदा ही प्रेम के भाव से देखें और इसे देखते हुए हर्षित, आनंदित तथा सुखी रहें|
७. जन्म जन्मान्तरों में सुखी हों:-
        मन्त्र के इस अंतिम भाग का विशेष महत्त्व है| इस भाग में पुनर्जन्म को और भी स्पष्ट कर दिया गया है| इस भाग में परमपिता को संबोधित करते हुए कहा गया है कि आप सब को मान देने वाले हो| विज्ञान अर्थात् शास्त्रोक्त दृष्टि से आपको निहारते हुए हम न केवल प्रेमभाव से ही रहें अपितु आप परिणाम वेत्ता होने के कारण हमें हमारे कर्मों के अनुसार पुरस्कार देने वाले भी हो| जैसा हमने कर्म किया है, उसके अनुरूप ही आपका परिणाम अर्थात् फल हमें मिलेगा| जब आप हमरे पापाचरणों से हमें दण्डित कर हमें मुक्त कर डोज तो हमारे उत्तम कर्म ही शेष रह जावेंगे| इन का उत्तम पुरस्कार देकर हमारा जीवन सुखमय बनाओ | अत: केवल इस जीवन के लिए ही नहीं अपितु आगामी जन्मों के लिए भी हमारे लिए सुख का मार्ग खोल दो और हम आने वाले सब जन्मों में सुखी हों| आपकि कृपा से हमारा कल्याण हो|
          इस प्रकार सात बिंदु इस मन्त्र में ऐसे दिए हैं कि जिनसे हम जान सकें कि हमारा यह जन्म न तो आकस्मिक है, न ही प्राकृतिक रूप से हुआ है और न ही माता पिता के मेल से हुआ है वरन यह तो परमपिता परमात्मा की हमरे लिए एक अद्भुत देन है, जिसका आधार हमारे कर्म हैं| इस में एक कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया है| हमारा एक जन्म समाप्त होता है तो इसके अंत होते ही दूसरा जन्म आरम्भ हो जाता है| दूसरा जन्म समाप्त होते ही तीसरा जन्म आ जता है| इस प्रकार अबाध रुप से यह प्रक्रिया चलती चली जाती है किन्तु यहाँ एक बात समझने योग्य यह है कि यह आवश्यक नहीं कि हम प्रत्येक बार मनुष्य ही बने| कभी हम अपने इस जन्म में किये गए कर्मों के आधार पर कीट, पतंग, पशु, जलचर, नभचर आदि कुछ भी बन सकते है| जब हमारे बुरे कर्मों के फल समाप्त हो जावेंगे तो हम एक बार फिर से मनुष्य जन्म में आ जावेंगे| इसलिए ही कहा गया है कि हे प्राणी! तु उत्तम कर्म करते हुए, दान पुण्य करते हुए, नए जन्म को प्राप्त कर| यदि तेरे कर्म उत्तम होंगे तो अगले जन्म में भी उत्तम शरीर मिलेगा अन्यथा पता नहीं तेरा किस रूप में जन्म होगा किन्तु जन्म अवश्य होगा क्योंकि पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है|
डा. अशोक आर्य
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