पवित्र श्रावण मास चल रहा है जिस मास में वर्षा ऋतु की फुहारों के साथ प्रकृति परिवर्तन करती है।

ओ३म् 


                            


परमपिता परमेश्वर को नमन करते हुए सभी आर्य विद्वानों को नमस्ते जी। पवित्र श्रावण मास चल रहा है जिस मास में वर्षा ऋतु की फुहारों के साथ प्रकृति परिवर्तन करती है। चारों ओर वृक्षों पर हरियाली और प्रकृति में आनंद अनुभव होता है। इस पवित्र मास में यज्ञ हवन व वेद (श्रुति) के मंत्रों का बहुत स्थानों पर गान हुआ करताथा। इसी कारण श्रावण कहलाता है। बोला जाता है यह शिव का मास है किन्तु सत्य यह है कि प्रत्येक मास शिव का है प्रत्येक क्षण उसी सर्वशक्तिमान का है वो सर्वव्यापक है।
वो शिव निराकार है। उसी परमेश्वर को वेदों में शिव की संज्ञा दी गयी।


हिन्दू समाज में मान्यता है कि वेद में उसी शिव का वर्णन है जिसके नाम पर अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन हुआ है। उन्हीं शिव की पूजा-उपासना वैदिक काल से आज तक चली आती है। किन्तु वेद के मर्मज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।उनके अनुसार वेद तथा उपनिषदों का शिव निराकार ब्रह्म है।


हमारे पूज्य कृष्णदत्त जी के प्रवचन से भी स्पष्ट है कि
परमात्मा को अपना बरणीय बनाने के लिए हम सदैव तत्पर हो जाएं, क्योंकि वह हमारा वरणीय देव है, वह शिव कहलाता है, वह न्याय करता है। वह ब्रह्म कहलाता है, उत्पत्ति का मूलक कहलाता है, वह शोधन करने वाला विष्णु कहलाता है, क्योंकि वह पालन करता है। ब्रह्मा उत्पत्ति में तमोगुण, रजोगुण में शिव है और सतोगुण में देखो, विष्णु माना गया है। जब मैं माता के द्वार पर जाता हूँ तो माता में तीनों गुण सामान्यताएं है। सतोगुण में वह बालक का पालन कर रही है। तमोगुण में उत्पत्ति का मूलक बनी हुई हैं रजोगुण में शासन कर रही है। मेरे पुत्रों! पालन भी शासन भी और वह उत्पत्ति का मूलक न्यायप्रवर्तो देवाः तीनों गुण उसमें दृष्टिपात आ रहे हैं हे माता तू पालन करने वाली विष्णु है। परमात्मा का नमा भी विष्सा है क्रूंकि वह पालन करने वाला है। ध्रुवा में रहने वाला है क्योकि वह पालन करने वाला सतमयी कहलाता है। सतोगुण में पालन है, रजोगुण में शासन हे और तमोगुण में मेरे पुत्रों! देखो, उत्पत्ति के मूल बने हुए हैं। विचार-विनिमय क्या? एक-दूसरे में सत्य की प्रतिभा दृष्टिपात आ रही है। यह कैसी विचित्रता है प्रभु की। रजोगुण में भी सत्यता है और तमोगुण में भी सत्यता है क्योंकि सत्यता के आधार पर तीनों गुण अपनी-अपनी आभा में गति कर रहे हैं।


महायोगी शिव ईश्वर नही हैं


पुराणों में वर्णित शिव जी एक महापुरुष हैं जो परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर "ओ३म्" की उपासना करते थे। कैलाशपति शिव वीतरागी महान राजा थे। उनकी राजधानी कैलाश थी और तिब्बत का पठार और हिमालय के वे शासक थे। हरिद्वार से उनकी सीमा आरम्भ होती थी। वे राजा होकर भी अत्यंत वैरागी थे। उनकी पत्नी का नाम पार्वती था जो राजा दक्ष की कन्या थी। उनकी पत्नी ने भी गौरीकुंड, उत्तराखंड में रहकर तपस्या की थी। उनके पुत्रों का नाम गणपति और कार्तिकेय था। उनके राज्य में सब कोई सुखी था। उनका राज्य इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें कालांतर में साक्षात् ईश्वर के नाम शिव से उनकी तुलना की जाने लगी।


वेदों में शिव का वर्णन


हम प्रतिदिन अपनी सन्ध्या उपासना के अन्तर्गत यह मंत्र बोलते हैं


मंत्र


ओम् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च
नमः शंकराय च मयस्कराय च
नमः शिवाय च शिवतराय च ।।
                                     ( यजुर्वेद अ० १६।म० ४१।।)


अर्थ


जो सुखस्वरूप संसार के उत्तम सुखों का देने वाला कल्याण का कर्ता , मोक्षस्वरूप , धर्मयुक्त कामों का ही करनेवाला अपने भक्तों को सुख देनेवाला और धर्मयुक्त कामों में युक्त करनेवाला , अत्यंत मंगलस्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष का सुख देनेवाला है उस सच्चिदानंद स्वरुप निराकार सर्व शक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मे अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्वेश्वर सर्व व्यापक सर्वान्तर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता परमपिता परमात्मा को हमारा बारम्बार नमस्कार हो।


इस मन्त्र में शंभव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, शिवतर शब्द आये हैं जो एक ही परमात्मा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं



वेदों में ईश्वर को उनके गुणों और कर्मों के अनुसार बताया है--


मंत्र


त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।
                                                           -यजु० ३/६०


अर्थ


विविध ज्ञान भण्डार, विद्यात्रयी के आगार, सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यजन करें। जिस प्रकार पक जाने पर खरबूजा अपने डण्ठल से स्वतः ही अलग हो जाता है वैसे ही हम इस मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जायें, मोक्ष से न छूटें।


मंत्र


या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।।
                                                           -यजु० १६/२


अर्थ


हे मेघ वा सत्य उपदेश से सुख पहुंचाने वाले दुष्टों को भय और श्रेष्ठों के लिए सुखकारी शिक्षक विद्वन्! जो आप की घोर उपद्रव से रहित सत्य धर्मों को प्रकाशित करने हारी कल्याणकारिणी देह वा विस्तृत उपदेश रूप नीति है उस अत्यन्त सुख प्राप्त करने वाली देह वा विस्तृत उपदेश की नीति से हम लोगों को आप सब ओर से शीघ्र शिक्षा कीजिये।


मंत्र


अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्।
अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्योऽधराची: परा सुव।।
                                                       -यजु० १६/५


अर्थ


हे रुद्र रोगनाशक वैद्य! जो मुख्य विद्वानों में प्रसिद्ध सबसे उत्तम कक्षा के वैद्यकशास्त्र को पढ़ाने तथा निदान आदि को जान के रोगों को निवृत्त करनेवाले आप सब सर्प के तुल्य प्राणान्त करनेहारे रोगों को निश्चय से ओषधियों से हटाते हुए अधिक उपदेश करें सो आप जो सब नीच गति को पहुंचाने वाली रोगकारिणी ओषधि वा व्यभिचारिणी स्त्रियां हैं, उनको दूर कीजिये।


मंत्र


या ते रुद्र शिवा तनू: शिवा विश्वाहा भेषजी।
शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे।।
                                                     -यजु० १६/४९


अर्थ


हे राजा के वैद्य तू जो तेरी कल्याण करने वाली देह वा विस्तारयुक्त नीति देखने में प्रिय ओषधियों के तुल्य रोगनाशक और रोगी को सुखदायी पीड़ा हरने वाली है उससे जीने के लिए सब दिन हम को सुख कर।


उपनिषदों में ईश्वर शिव


उपनिषदों में भी शिव की महिमा निम्न प्रकार से है-


श्लोक


स ब्रह्मा स विष्णु: स रुद्रस्स: शिवस्सोऽक्षरस्स: परम: स्वराट्।
स इन्द्रस्स: कालाग्निस्स चन्द्रमा:।।
                                                         -कैवल्यो० १/८


अर्थ


वह जगत् का निर्माता, पालनकर्ता, दण्ड देने वाला, कल्याण करने वाला, विनाश को न प्राप्त होने वाला, सर्वोपरि, शासक, ऐश्वर्यवान्, काल का भी काल, शान्ति और प्रकाश देने वाला है।


श्लोक


प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।।७।।
                                                       -माण्डूक्य०


अर्थ


प्रपंच जाग्रतादि अवस्थायें जहां शान्त हो जाती हैं, शान्त आनन्दमय अतुलनीय चौथा तुरीयपाद मानते हैं वह आत्मा है और जानने के योग्य है।
यहां शिव का अर्थ शान्त और आनन्दमय के रूप में देखा जा सकता है।


श्लोक


सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।
सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगत: शिव:।।
                                                     -श्वेता० ४/१४


अर्थ


जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कर्ता एक ही है, जो सब प्राणियों के हृदयाकाश में विराजमान है, जो सर्वव्यापक है, वही सुखस्वरूप भगवान् शिव सर्वगत अर्थात् सर्वत्र प्राप्त है।


इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-


श्लोक


सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सृष्टारमनेकरुपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।
                                                    -श्वेता० ४/१४


अर्थ


परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, हृदय के मध्य में विराजमान है, अखिल विश्व की रचना अनेक रूपों में करता है। वह अकेला अनन्त विश्व में सब ओर व्याप्त है। उसी कल्याणकारी परमेश्वर को जानने पर स्थाई रूप से मानव परम शान्ति को प्राप्त होता है।


श्लोक


नचेशिता नैव च तस्य लिंङ्गम्।।
                                                    -श्वेता० ६/१


अर्थ


उस शिव का कोई नियन्ता नहीं और न उसका कोई लिंग वा निशान है।


योगदर्शन में परमात्मा की प्रतीति इस प्रकार की गई है-


सूत्र


क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।।      
                                                      १/१/२४


अर्थ


जो अविद्यादि क्लेश, कुशल, अकुशल, इष्ट, अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है।


सूत्र


स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।।
                                                    १/१/२६


अर्थ


वह ईश्वर प्राचीन गुरुओं का भी गुरु है। उसमें भूत भविष्यत् और वर्तमान काल का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है,क्योंकि वह अजर, अमर नित्य है।


महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी अपने पुस्तक सत्यार्थप्रकाश में निराकार शिवादि नामों की व्याख्या इस प्रकार की है--


(रुदिर् अश्रुविमोचने) इस धातु से 'णिच्' प्रत्यय होने से 'रुद्र' शब्द सिद्ध होता है।'यो रोदयत्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्र:' जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है, इससे परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।


यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।।


यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।


जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी जे बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इस से क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। जब दुष्ट कर्म करनेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते, तब रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उन को रुलाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।


(डुकृञ् करणे) 'शम्' पूर्वक इस धातु से 'शङ्कर' शब्द सिद्ध हुआ है। 'य: शङ्कल्याणं सुखं करोति स शङ्कर:' जो कल्याण अर्थात् सुख का करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम 'शङ्कर' है।


'महत्' शब्द पूर्वक 'देव' शब्द से 'महादेव' शब्द सिद्ध होता है। 'यो महतां देव: स महादेव:' जो महान् देवों का देव अर्थात् विद्वानों का भी विद्वान्, सूर्यादि पदार्थों का प्रकाशक है, इस लिए उस परमात्मा का नाम 'महादेव' है।


(शिवु कल्याणे) इस धातु से 'शिव' शब्द सिद्ध होता है। 'बहुलमेतन्निदर्शनम्।' इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम 'शिव' है।


उपरोक्त लेख द्वारा योगी शिव और निराकार शिव में अन्तर बतलाया है। ईश्वर के अनगिनत गुण होने के कारण अनगिनत नाम है। शिव भी इसी प्रकार से ईश्वर का एक नाम है। आईये निराकार शिव की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करे।
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