मोक्ष प्राप्ति के साधन- शुध्द ज्ञान, शुद्ध कर्म व शुद्ध  उपासना-

ओ३म्🔥


मोक्ष प्राप्ति के साधन- शुध्द ज्ञान, शुद्ध कर्म व शुद्ध  उपासना-


..शुध्द ज्ञान:-


१.ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार,सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त,निर्विकार, अनादि, अनुपम और सर्वाधार है उसी की उपासना करनी चाहिए।


२.आत्माएं अजर,अमर,अल्पज्ञ,अल्पशक्तिमान और शुभ अशुभ मिश्रित व निष्काम कर्मों के आधार पर  जन्म मरण के बन्धन में आने वाली हैं। परान्तकाल तक मोक्ष भी  प्राप्त कर सकती हैं।


३. प्रकृति जड है ,सत्व रज तम तीन प्रकार के गुणों वाली है और सृष्टि उत्पत्ति में उपादान कारण है। प्रकृति भी अात्मा व परमात्मा की तरह अनादि है सूक्ष्म है । ईश्वर साध्य है, आत्माएं साधक हैं, प्रकृति साधन है । तीनों का व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है।
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शुध्द कर्म:-


फल की इच्छा छोड़ कर पूरी निष्ठा से अपने अपने कर्तव्य कर्म को करना। कोई कार्य ईश्वर की, वेद की व अन्तरात्मा की आज्ञा के विरुद्ध न करना |
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शुध्द उपासना:-


अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि यम नियमों का सूक्ष्मता से पालन करते हुए योग के आठ अंगों का निरन्तर, श्रध्दापूर्वक व पूर्ण उत्साह से अभ्यास करना। पाषाण पूजा,पशुबलि व अवतारवाद आदि के चक्करों में न पडना । ईश्वर सर्वशक्तिमान का यह अर्थ नहीं कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है| क्या वह वह झूठ बोल सकता है ? क्या वह अन्याय कर सकता है ? क्या वह स्वयं को मार कर अपने जैसा दूसरा परमात्मा बना सकता है ? सर्वशक्तिमान का वास्तविक अर्थ है कि वह ईश्वर सृष्टि उत्पति प्रलय करने, कर्म फल प्रदान करने व वेदों का ज्ञान देने में पूरी तरह सक्षम है । इसके लिये उसे किसी सहायता व अवतार लेने की आवश्यकता नहीं  |
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विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँ्सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते 
यजुर्वेद 40.14, 


विद्या अर्थात् शुद्ध ज्ञान व शुद्ध कर्म, अविद्या अर्थात् शुद्ध उपासना से ही मृत्यु आदि दु:खों से से छूट कर मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है ।
.................................................The body and mind – the internal organ of thought – are material, hence dead and inert. They can never feel heat or cold, nor therefore the consequent pain or pleasure. It is conscious beings (who possess souls) such as men, who feel heat and cold when a hot or a cold substance comes in contact with their bodies. Even the praanas – the nervauric forces – are devoid of consciousness.


They can feel neither hunger nor thirst. It is the soul possess of nervauric forces that feels the sensations of hunger or thirst. Similarly, the manas – internal organ of thought – is also devoid of consciousness. It can feel neither sorrow nor joy, but it is through the manas that the soul feels pleasure or pain, and joy or sorrow.


Similarly, through the organs of sensations, such as the ears, the soul receives different sensations, such as of hearing, and consequently feels pleasure or pain, just according to the nature of those sensations. It is the soul that thinks, knows, remembers and feels its individuality through the organs of thought, discernment, memory and individuality. It is, therefore, the soul that enjoys or suffers. Just as it is the man that uses his sword to kill another who is punished and not the sword, similarly, it is the soul that, by the use of such instruments as the body, the bodily senses, the organs of thought, the nervauric forces, does acts – good or evil – and consequently it is the soul alone that reaps the fruits thereof – joy or sorrow. 


The soul is not a witness of acts. It is the actual doer that reaps the fruits of deeds done. The One Incomparable Supreme Spirit alone is the Witness. It is the soul that does acts and is, therefore, naturally engrossed by them. The soul is not God and, consequently, it is not the witness of acts (but the actual doer).
- डा मुमुक्षु आर्य


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