महर्षि दयानन्द ने अपनी मृत्यु से प्रमाणित कर दिया

महर्षि दयानन्द सरस्वती 


 महर्षि दयानन्द ने अपनी मृत्यु से प्रमाणित कर दिया –
अद्यैव वा मरण मस्तु युगांतरे वा 
न्यायात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः !! 


महर्षि दयानन्द का देहान्त हो गया ! इससे पहले भी १३ बार महर्षि की हत्या के प्रयास किए जा चुके थे ! महर्षि दयानन्द को स्वयं भी अच्छी तरह ज्ञात था कि वैदिक धर्म की व्याख्या के कारण ही, सत्य धर्म के प्रवचन के कारण ही , उनकी हत्या के प्रयास किए जाते हैं ! फिर भी उन्होंने धर्म पथ को, न्याय को कभी नहीं छोड़ा ! और इसी कारण उनको उनसठ साल की अल्पायु में ही शरीर छोड़ना पड़ा अन्यथा अखण्ड बाल ब्रह्मचारी, स्वस्थ शरीर धनी महर्षि दयानन्द का जीवन कहीं सवा सौ साल से अधिक ही होता ! 


निन्दन्तु नीति निपुणाः यदि वास्तुवन्तु, 
लक्ष्मिः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् !
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा , 
न्यायात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः !!


महर्षि दयानन्द के जीवन का क्षण-क्षण इस नीति वाक्य को चरितार्थ करता है ! ऐसा लगता है जैसे नीति वाक्य की रचना महर्षि दयानन्द के जीवन की व्याख्या करने के लिए ही की गई हो !


महर्षि दयानन्द की विद्वत्ता , महर्षि दयानन्द के ब्रह्मचर्यादि गुणों से प्रभावित होकर बम्बई के कुछ सज्जनों ने आग्रह पूर्वक उन्हें आमन्त्रित किया ! उन सज्जनों का विचार था कि धर्म के नाम पर जो चरित्र हीनता और व्यभिचार फैला है महर्षि दयानन्द जैसा धर्म का तेजस्वी वक्ता ही उसको ठीक कर सकता है ! महर्षि बम्बई पधारे ! धार्मिक प्रवचनों का दौर चलने लगा ! आर्य समाज की स्थापना की बात होने लगी ! 


राजकृष्ण महाराज ने महर्षि से कहा – आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है !  जीव और ब्रह्म एक ही हैं , ऐसा हम आर्य समाज के नियम के रूप में रखेंगे !


 महर्षि ने कहा जीव और ब्रह्म, आत्मा और परमात्मा में भेद है इनमें भिन्नता है, यह बात वेद में स्पष्ट लिखी हुई है ! अतः जीव और ब्रह्म की एकता आर्य समाज के नियमों में कदापि स्वीकार नहीं की जा सकती है ! 


 तब राजकृष्ण महाराज ने नीतिनिपुण व्यक्ति की तरह , चालबाज व्यक्ति की तरह महर्षि से कहा – हम जीव और ब्रह्म की एकता की बात अभी तो आर्य समाज के नियमों में रख लेंगे ! इससे बहुत से लोग आसानी से आर्य समाज में आ जाएंगे – आर्य समाज के सदस्य बन जाएंगे ! आर्य समाज की शक्ति बढ़ जाएंगी ! बाद में जब बहुत से लोग हमारे साथ हो जाएंगे तब हम इस नियम को छोड़ देंगे ! 


 महर्षि दयानन्द ने गम्भीर और स्पष्ट शब्दों में राजकृष्ण से कहा – मैं आर्य समाज की नीव को असत्य पर स्थापित करना कदापि पसन्द नहीं करूँगा ! यदि हम आज बहुत से लोगों लो अपनी ओर खींचने के लिए ब्रह्म और जीव की एकता स्वीकार कर लें, और आगे चल कर इसे गलत कह कर छोड़ दें तो क्या यह धोखेबाजी नहीं होगी?


 महर्षि दयानन्द के इस स्पष्ट उत्तर से राजकृष्ण महाराज रुष्ट हो गए ! वे महर्षि का साथ छोड़ गए ! कालान्तर में महर्षि के घोर विरोधी बन गए ! परन्तु यह ध्यान देने की बात है कि अधिक से अधिक लोगों को अपनी और आकर्षित करने के लिए भी महर्षि दयानन्द छोटे से छोटा झूठ बोलना भी स्वीकार नहीं करते थे ! बड़े – से बड़ा लाभ हो परन्तु वह लाभ - "न्याय पथ को छोड़ कर , धर्म को छोड़ कर, सत्य को छोड़ कर"
मिले तो महर्षि दयानन्द को यह कभी भी स्वीकार नहीं होता था !


 महर्षि दयानन्द को कोई भी शक्ति धर्म के रास्ते से नहीं हटा सकती थी ! वे धर्म पथ पर अडिग रहते थे ! महर्षि दयानन्द निन्दा स्तुति से ऊपर उठ चुके थे , धन का थोड़ा भी लोभ उन्हें नहीं था ! वे संन्यासी थे ! उनके पास धन था ही नहीं ! धन हानि का डर भी नहीं था ! उनकी हत्या के लिए कई बार यत्न किए गए ! परन्तु किसी भी कारण वश उन्होंने -
धर्म को, सत्य को, न्याय को नहीं छोड़ा !


  उन्हें उनके अनुयायी बढ़ाने का, शिष्य बढ़ाने का लोभ दिया गया ! इस पर भी उन्होंने झूठे व्यवहार का सहारा नहीं लिया ! न्याय पर, सत्य पर, धर्म पथ पर अडिग रूप से चलते रहे ! और वैदिक धर्म के हित उन्होंने अपना प्राण न्योंछावर कर दिया, बलिदान हो गए !


   महर्षि दयानन्द के जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए ! हम वैदिक धर्म पर अडिग रहें ! वेदों में बतलाए गए रास्ते पर चलें ! अपनी निन्दा सुन कर हम घबड़ा न जाएं, उत्तेजित न हों ! स्तुति सुन कर संयम न खो बैठें, इतराने न लगें ! धन के पीछे , धन के कारण, धन के लोभ में पड़ कर, धन की हानि के डर से, हम धर्म को न छोड़ें, वैदिक धर्म को न छोड़ें, सत्य को न छोड़ें, न्याय को न छोड़ें ! और इस प्रकार वैदिक मार्ग पर चलते हुए हम धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि प्राप्त करें ! अपने जीवन को सफल बनाएं !


निन्दन्तु नीति निपुणाः यदि वास्तुवन्तु, 
लक्ष्मिः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् !
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा , 
न्यायात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः !!


ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः


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