वेदों में बहु-विवाह आदि विषयक भ्रान्ति का निवारण

 


 


 



 


 


वेदों में बहु-विवाह आदि विषयक भ्रान्ति का निवारण


एक मुस्लिम मित्र ने वेदों में बहुविवाह अर्थात एक से अधिक पत्नी रखने विषय में कुछ नहीं कहा है। ऐसा दावा किया। वैसे इस भ्रान्ति के दो कारण हैं। एक तो यह कि क़ुरान में आस्था रखने वाले इस्लाम की मान्यता अनुसार एक से अधिक पत्नी रखने को उचित समझते हैं। दूसरी पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ऐसा मानना है कि वेदों में बहुविवाह का समर्थन किया गया हैं। उदहारण के लिए Vedic age पृष्ठ 390 पर अंग्रेजों की मान्यता को पुष्ट करते हुए R.C.Majumdar लिखते है -


"वेदों के विषय में एक भ्रम यह भी फैलाया गया हैं की वेदों में बहुविवाह की अनुमति दी गयी है।


वेदों की बहुविवाह सम्बंधित मान्यता पर हम विचार करते है-


ऋग्वेद १०/८५ को विवाह सूक्त के नाम से जाना चाहता है।


इस सूक्त के मंत्र ४२ में कहा गया है कि तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो, तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो, सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो।


ऋग्वेद १०/८५/४७ मंत्र में हम दोनों (वर-वधु) सब विद्वानों के सम्मुख घोषणा करते हैं की हम दोनों के ह्रदय जल के समान शांत और परस्पर मिले हुए रहेंगे।


अथर्ववेद ७/३५/४ में पति पत्नी के मुख से कहलाया गया हैं की तुम मुझे अपने ह्रदय में बैठा लो , हम दोनों का मन एक ही हो जाये।


अथर्ववेद ७/३८/४ पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो. अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।


ऋग्वेद १०/१०१/११ में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं ,इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।


इस प्रकार वेदों में बहुविवाह के विरुद्ध स्पष्ट उपदेश हैं। 
इतिहास मे अनेक व्यक्ति जैसे राजा दशरथ आदि हुए हैं जिसने 1 से अधिक विवाह किए हैं। परंतु वे कभी भी हमारे आदर्श नहीं रहे हैं और ना ही हम उनके इस व्यवहार का समर्थन करते हैं। यदि राजा दशरथ अनेक विवाह नहीं करते तो श्रीराम जी को वनवास नहीं  मिलता। यदि महाभारत मे भीष्म के पिता शांतनु दूसरा विवाह नहीं करते तो महभारत का युद्ध नहीं होता और लाखों लोग युद्ध मे नहीं मारे जाते। 


इसलिए 1 पति और 1 पत्नी ही आदर्श व्यवस्था है। किसी आदमी के उदाहरण से नियम नहीं बदलता। काल्पनिक कहानियों से अनेक विवाह को सही नहीं ठहराया जा सकता है। 














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