सुखी होने का उपाय, धर्माचरण करना है। अधर्म करने से तो दुख ही मिलता है।

 



 


 


    सुखी होने का उपाय, धर्माचरण करना है। अधर्म करने से तो दुख ही मिलता है।
         प्रायः लोग समझते हैं, मैं तो अच्छे काम ही करता हूं, मैं कोई बुरा काम थोड़ा ही करता हूं? अर्थात् दोष करते हुए भी, अपने दोषों को व्यक्ति स्वीकार नहीं करता। जबकि वह अनेक दोष करता रहता है। कोई कम दोष करता है, कोई अधिक करता है। झूठ छल कपट धोखा बेईमानी चोरी रिश्वत जुआ शराब चरित्रहीनता आदि, जब भी जहां अवसर मिलता है व्यक्ति इनमें से अनेक दोष करता रहता है। प्रमाण चाहिए, तो सड़क पर 100 रुपए का नोट रखकर देख लीजिए। जिसकी भी नजर पहले पड़ जाएगी, वह व्यक्ति नोट उठा कर ले जाएगा। इतना सब होने के बाद भी व्यक्ति यह स्वीकार नहीं करता कि "मैं अवसर आने पर गड़बड़ करता हूं।" जब व्यक्ति अपना दोष स्वीकार ही नहीं करता, तो दूर कैसे करेगा? इसलिए वह अपने दोषों को छोड़ता नहीं, जिसका परिणाम यह होता है कि वह सदा चिंतित परेशान या दुखी रहता है ।
       दूसरी ओर बचपन से वह देख रहा है कि मैं जब-जब भी इस प्रकार से दोष करता रहा, मुझे अनेक चिंताओं भय एवं आशंकाओंं ने तत्काल घेर लिया। मेरी शांति आनंद निर्भयता आदि सब खो गया। मेरा जीवन बिगड़ गया।
       और जब जब मैंने अच्छे काम किए; दूसरों की सेवा की, बड़ों का सम्मान किया, न्याय से व्यवहार किया, दान दिया, यज्ञ किया, ईश्वर उपासना की, तब तब मुझे खूब शांति मिली आनंद मिला उत्साह मिला सम्मान मिला निर्भयता प्राप्त हुई। मेरा जीवन बहुत अच्छा रहा। यह जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव भी उसे है।
        फिर कम से कम अब तो अपने अनुभव के आधार पर अपने विचारों को बदल लेवें। कि सत्य धर्म न्याय का आचरण करने से सुख  शांति आनंद मिलता है। और झूठ छल कपट अन्याय आचरण आदि अधर्म करने से दुख मिलता है। 
       अब बहुत सा जीवन बीत गया। अब तो सुधार कर लिया जाए। यदि अब भी नहीं सुधरेंगे, तो वृद्धावस्था में तो केवल पश्चाताप ही करना पड़ेगा, कि सारा जीवन यूं ही खो दिया, कोई पुण्य नहीं कमाया।
       ऐसा पश्चाताप न करना पड़े। इसलिए आज ही से सत्य को धर्म को स्वीकार करें। उत्तम गुणों को धारण करें, तथा अपने वर्तमान जीवन को भी आनंदित बनाएं; तथा भविष्य को भी सुरक्षित कर लेवें।
- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक 














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