अपने चिंतन, निर्णय और आचरण को उत्तम बनाएँ। सुखी रहेंगे।

 


 



 


 


  अपने चिंतन, निर्णय और आचरण को उत्तम बनाएँ। सुखी रहेंगे।
        सुख को कौन नहीं चाहता? सब चाहते हैं। परंतु फिर भी लोग सुखी नहीं हैं। दुख को कौन चाहता है? कोई भी नहीं? फिर भी लोग दुखी हैं।
       एक दृष्टि से यदि देखा जाए, तो यह कर्म फल व्यवस्था बड़ी विचित्र है। मोटे तौर पर सभी जानते हैं कि अच्छे कर्म का अच्छा फल अर्थात् सुख मिलता है। और बुरे कर्म का बुरा फल अर्थात् दुख मिलता है. बच्चों को ये बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं।  अच्छे काम करने के लिए बार बार प्रेरित किया जाता है। बार बार बुरे काम से बचाने की कोशिश की जाती है। परंतु फिर भी परिणाम बहुत अधिक अच्छा नहीं दिखाई दे रहा। 
      कारण? लोग मनोविज्ञान को नहीं समझते। आप को जीवन में जो भी सुख-दुख मिलता है, वह सारा तो आपके कर्मों का फल नहीं होता, परंतु उस में से बहुत सा सुख दुख आपके कर्मों के फलस्वरूप ही मिलता है।
       आप जो कर्म करते हैं, वे आपके मानसिक निर्णय पर आधारित होते हैं। आपका मानसिक निर्णय आपके चिंतन पर आधारित होता है। आप के चिंतन का आधार क्या है? जो कुछ आप देखते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं, माता पिता गुरुजनों से सीखते हैं। रेडियो टेलीविजन कंप्यूटर मोबाइल प्रैस मीडिया इंटरनेट आदि से जो कुछ आप सीखते हैं। अड़ोसी पड़ोसी मित्र मंडल गली मोहल्ले सोसाइटी वालों आदि से जो कुछ आप सीखते हैं, उसी के आधार पर आपका चिंतन होता है।
         तो सार यह हुआ कि ऊपर बताए कारणों के आधार पर आप चिंतन करते हैं। उस के आधार पर निर्णय करते हैं, फिर आचरण करते हैं। फिर आपको आपके कर्मों का फल सुख दुख मिलता है। 
      यदि आप सुख प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसके लिए आवश्यक है कि आपका आचरण ठीक होना चाहिये। इसके लिए आपका मानसिक निर्णय ठीक होना चाहिए। मानसिक निर्णय के ठीक होने के लिए आपका चिंतन ठीक होना चाहिए। चिंतन को ठीक करने के लिए ऊपर बताए सारे कारण ठीक होने चाहिएँ। 
       देश काल परिस्थिति के अनुसार इनमें से जितने कारण आपको ठीक-ठीक मिल  जाएंगे, उतना आपका चिंतन निर्णय और आचरण उत्तम होगा। और जहां जहां जितने कारण विरुद्ध या भटकाने वाले मिलेंगे, उनसे आपको संघर्ष करना होगा। अर्थात् उनसे आपको अपना बचाव करना होगा।
आप इतना कर लेंगे, तो निश्चित रूप से आपके चिंतन निर्णय और आचरण आदि कर्म अच्छे होंगे। और उतने ही आप अधिक सुखी होंगे।
 - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक


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