आपकी आशाएं = दूसरों से एक्सपेक्टेशन्स ही आपके दुख का सबसे बड़ा कारण हैं।

 



 


 


आपकी आशाएं = दूसरों से एक्सपेक्टेशन्स ही आपके दुख का सबसे बड़ा कारण हैं।
मनुष्य अकेला नहीं जी सकता। वह सामाजिक प्राणी है। माता-पिता भाई-बहन पत्नी बच्चे दादा-दादी पड़ोसी मित्र संबंधी रिश्तेदार आदि अनेक व्यक्तियों का सहयोग उसे लेना पड़ता है। तब जाकर उसका जीवन कुछ ठीक-ठाक चलता है।
इसके अतिरिक्त देशभर के लोगों का भी सहयोग उसे चाहिए। देश के लोग उसके लिए कपड़ा मकान स्कूटर कार टेलिविजन बिजली सड़कें कंप्यूटर रेल आदि बनाते हैं, इनके बिना भी व्यक्ति का कार्य नहीं चलता। और विदेशी लोग भी बहुत सी वस्तुएं आपके लिए बनाते हैं, जिनका आप अपने जीवन में उपयोग करते हैं। इन सब के सहयोग के बिना आप इतना सुविधा पूर्ण जीवन नहीं जी सकते, जितना कि आजकल जी रहे हैं।
जिसकी जैसी योग्यता होती है, वह वैसा कार्य दूसरों के लिए करता है। तो आप भी अपनी योग्यता के अनुसार, दूसरों के लिए कुछ न कुछ काम करते ही हैं। चाहे व्यवसाय के रूप में, या सेवा के रूप में, कुछ न कुछ तो करते ही हैं। इन सब लोगों के लिए जब आप कुछ काम करते हैं, तो इन सब से कुछ आशाएँ भी हो ही जाती हैं, कि "यदि मैं इनके लिए कार्य कर रहा हूँ, तो ये लोग भी मेरे लिए कुछ करें।"
जितना जिस व्यक्ति से आपका निकट संबंध होता है, उतना ही आप उससे अधिक आशाएं रखते हैं। मुख्य रूप से अपने परिवार के सदस्यों मित्रों और संबंधियों से आप अधिक आशाएं रखते हैं, क्योंकि उनके लिए आप बहुत कुछ सेवा सहयोग भी करते हैं। इसलिए उनसे आशाएं हो जाना स्वभाविक है।
परंतु जैसी जितनी आशाएं आप इन सब लोगों से रखते हैं, क्या वे सब पूरी हो जाती हैं? नहीं होती।
जब दूसरे लोग आपकी आशाएं पूरी नहीं करते, तब आपको दुख होता है। इस दुख से बचने के लिए उपाय इस प्रकार से हैं।
पहला उपाय - दूसरों से आशाएं कम ही रखें। अपना अधिकतम कार्य स्वयं करने का प्रयत्न करें। जो व्यक्ति अपना कार्य जितना अधिक से अधिक स्वयं कर लेता है, वह उतना ही अधिक सुखी होता है। क्योंकि स्वयं किया गया कार्य 100% अपना मनपसंद होता है, जिससे अधिक सुख मिलता है।
दूसरा उपाय - अपने मन में दोनों विचार रखें। दूसरा व्यक्ति आपकी आशा पूरी कर भी सकता है, और नहीं भी कर सकता है। यदि दूसरे व्यक्ति ने आपकी आशा पूरी कर दी, तो ठीक है। और यदि नहीं की, तो अपने मन को शांत रखने के लिए अपने मन में तीन शब्द बोलें, कोई बात नहीं. अपने मन में ऐसा बोलने से आपका दुख कम हो जाएगा। मन शांत रहेगा। आपकी मानसिक स्थिति नहीं बिगड़ेगी, आप स्वात्मनिर्भर होकर जीने का प्रयत्न करेंगे, और आनंद से जिएंगे।
- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक
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