वेद मंत्र

दष्कर्मी सन्मार्ग को नहीं तर सकले


प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्छ्लोकयन्त्रासो रभसस मासस्य मन्तेवः।


अानक्षासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति:  दुष्कृतः॥ -ऋ० ९७७ .


.। छन्द३० ९१७२५९R ऋषिः-पवित्र आङ्गिरसः॥ देवता-पवमानः सोमः॥ छन्ट.-जगती॥ 


, स्वर्गिक गान के स्वर सुनाई दे रहे हैं, दिव्य प्रकाश की हो रही हैं। ये और कुछ नहीं हैं, सत्यनियम (ऋत) ही मिलकर ठीक ध के साथ बज रहे हैं। सत्यनियम ही हमारे अनुकूल रूप धारण करके दीख रहे शब्द व प्रकाश की किरणें ऊपर से आ रही हैं, द्युलोक से आ रही हैं। व पुराना सनातन उत्पत्तिस्थान है, निर्माणस्थान है। वहीं से इस अनादि ब्रह्माण्डस्वर निकल रहे हैं, सदा से निकलते रहे हैं और सदा निकलते रहेंगे। ये जिस निकल रहे हैं वह प्रभुवाणी की वीणा है, उसकी श्लोक, ईक्षणशक्तिरूपी वीणा है उसकी ये रश्मियाँ इस सब वेगवान् महान् संसार को जानती हुई चल रही हैं सर्वगत चैतन्य के स्पर्श से कभी वियुक्त नहीं होतीं। इन किरणों और इन स्वरों के अ लोग अपने-आपको चलाते हैं, इनकी ताल-पर-ताल देते हुए इनके अनुसार अपने शो मन-बुद्धि को हिलाते-नचाते और ठीक करते जाते हैं, वे तो बड़ी आसानी से ऊपर-ऊन चढ़ते जाते हैं, पर दुःख है कि यह अन्धा और बहरा संसार न उन्हें देख रहा है और सुन रहा है। हम लोग बड़ी बेपरवाही के साथ सब-कुछ अनसुना करते हुए अंधाधुन्ध अपन हाँकते जा रहे हैं, तभी दुःख पा रहे हैं और जहाँ-के-तहाँ पड़े हुए हैं; उन्नति-पथ पर आ नहीं बढ़ सकते । सचमुच अपने इन दुःखदायी प्रतिकूल कर्मों को, दुष्कर्मों को हम इसीलित प्रतिकूल कर्मों को, दुष्कर्मों को हम इसीलित करते हैं-करने में प्रवृत्त होते हैं-चूँकि हम इन स्वर्गिक लहरों को सुन व देख नहीं रह हैं, अतः आओ, भाइयो! हम अब अपने उन कानों और आँखों को खोल लेवें जिनस प्रभुधाम से अनवरत आनेवाले ये दिव्य स्वर सुनाई और दिखाई देते हैंऐसे कान आँख तो हम सबके पास हैं।


शब्दार्थ-श्लोकयन्त्रासः श्लोक-यन्त्रवाली, ईश्वरीय वाणी से निकलनवाल मन्तव:=और इस वेगवान् महान् संसार को जाननेवाली ये जो [दिव्य प्रकार शब्द की किरणें] प्रत्नात् मानात् अधि पुराने निर्माणस्थान, उत्पत्तिस्थान से 3 अस्वरन मिलकर बज रही हैं या प्रकाशित हो रही हैं उन्हें अनक्षासः बधिराः बहिरे, न सुन सकनेवाले [संसारी पापी] लोग अप अहासत-छ देखते-सुनते नहीं, इनका लाभ नहीं उठाते, इसीलिए दुष्कृतः दुष्कम पन्थाम्=सत्य के मार्ग को न तरन्ति-तर नहीं सकते। 


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