सुखी लोगों से मित्रता रखें, और दुष्टों की उपेक्षा करें।

 



 


 


 


 


    सुखी लोगों से मित्रता रखें, और दुष्टों की उपेक्षा करें।
        संसार में चार प्रकार के लोग देखे जाते हैं। पहले प्रकार के लोग पढ़े-लिखे विद्वान बुद्धिमान धार्मिक सदाचारी चरित्रवान धनवान आदि आदि  सुख साधन संपन्न होते हैं। महर्षि पतंजलि जी योग दर्शन में कहते हैं, कि ऐसे लोगों के साथ मित्रता बनाए रखें। समय आने पर उनका सहयोग करें। यदि आप पर आपत्तिकाल आ जाए, तो उनसे सहयोग लेवें। 
     दूसरे प्रकार के लोग ऐसे होते हैं, जो दीन दुखी रोगी परेशान चिंतित विकलांग आदि होते हैं, वे दया के पात्र होते हैं। उन पर दया/ करुणा करनी चाहिए। अथवा जो गाय घोड़े कुत्ते कौए चिड़ियाँ आदि पशु पक्षी भी होते हैं, वे भी कुछ विशेष समर्थ नहीं होते, वे भी दूसरों की दया और सहायता पर ही जीते हैं। ऐसे कमजोर मनुष्यों और प्राणियों पर दया की भावना, तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। उनकी सहायता करनी चाहिए। उन पर अत्याचार या उनका शोषण नहीं करना चाहिए।
       तीसरे प्रकार के लोग पुण्यात्मा होते हैं। समाज सेवक परोपकारी गौशाला अनाथालय अस्पताल धर्मशाला गुरुकुल संस्था विद्यालय चिकित्सालय आदि चलाकर समाज सेवा करते हैं। ऐसे पुण्यात्माओं को देखकर भी प्रसन्न होना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि "हमारा कितना सौभाग्य है कि हमारे देश में ऐसे ऐसे परोपकारी लोग हैं, जिनका दर्शन करने और आशीर्वाद लेने से हमारा भी उत्थान और कल्याण होता है।" 
       तथा चौथे प्रकार के लोग संसार में ऐसे हैं, जो दुष्ट हैं, चोर डाकू लुटेरे हत्यारे अपराधी आतंकवादी धमकाने वाले किसी को व्यर्थ में दबाने वाले शोषण करने वाले इत्यादि प्रकार के लोग हैं। उनके लिए महर्षि पतंजलि कहते हैं, कि ऐसे लोगों से दूर रहें। न तो इन से मित्रता करनी अच्छी; और न ही शत्रुता। इनकी उपेक्षा करना ही ठीक है।
     उपेक्षा का अर्थ है दूर रहना, अर्थात् उनके साथ व्यवहार न करना। "उनके साथ द्वेष करना, यह उपेक्षा करने का अर्थ नहीं है।" इस बात की पूरी सावधानी रखें।
       द्वेष की स्थिति में मन में अशांति जलन गुस्सा तनाव चिंता इत्यादि लक्षण होते हैं।
तथा उपेक्षा की स्थिति में मन शांत रहता है। ऐसे दुष्ट लोगों की बात मन में सोचना भी नहीं। उनके विषय में कुछ भी विचार ही नहीं करना। अपने अन्य अच्छे कामों में व्यस्त रहना, उपेक्षा की स्थिति है।
 तो ऐसा करने से व्यक्ति का मन प्रसन्न रहता है। और फिर प्रसन्न मन को वह जहां चाहे वहीं एकाग्र कर सकता है, व्यवहार में भी तथा ईश्वरोपासना में भी।
  - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक 


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