"पश्येम शरद: शतम्" - "जीवेम शरद: शतम्"

 



 


"पश्येम शरद: शतम्" - "जीवेम शरद: शतम्"
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- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय


पहली प्रार्थना यह की गई कि -


'पश्येम शरदः शतम्।' 


अर्थात् सौ वर्ष पर्यन्त देखें। देखने का क्या अर्थ है ? ज्ञान की प्राप्ति। हमारा उपास्य देव चक्षु अर्थात् देखनेवाला है। वह दूरदर्शी और दूरज्ञ है। हम भी ज्ञान की प्राप्ति करें जिससे हम जान सकें कि हमको कितना मार्ग चलना है। सौ वर्ष, आयु की मध्यस्थ अवधि मानी गई है। कुछ न्यूनाधिक भी हो सकती है। परन्तु हर मनुष्य की यह इच्छा और यत्नशीलता होनी चाहिये कि वह सौ वर्ष तक जीवित रहे जिससे अपने कर्तव्य का पूर्णतया पालन कर सके। उसको जीवन से प्रेम होना चाहिये। मनुष्य संसार में मरने के लिए नहीं आया। यह ठीक है कि मृत्यु भी होती है। क्योंकि जिस चीज़ का आदि है उसका अन्त अवश्यम्भावी है। एक किनारे की नदी नहीं होती। 'आदि' के लिए 'अन्त' और 'अन्त' के लिए 'आदि' आवश्यक है। परन्तु सृष्टि में उत्पन्न होने का प्रयोजन 'जीवन' है 'मृत्यु' नहीं। जब आप बाजार में जाते हैं तो जाने का विशेष प्रयोजन होता है। बाजार से लौटना, जाने का प्रयोजन नहीं है। वह केवल प्रयोजन-सिद्धि का सूचक है। इसलिए सबसे पहली चीज जो उपासक को समझनी है यह है कि 'मृत्यु जीवन का उद्देश्य नहीं है।' यदि मृत्यु ही जीवन का उद्देश्य होती तो आत्म-घात करने के उपाय पर्याप्त होते; और आत्म-घात करनेवाले मनुष्य को हम सुपूर्ण मानव कह सकते।


इसलिए दैव ने हर प्राणी के भीतर जीवन-स्नेह का बीज बो रक्खा है। कोई मरना नहीं चाहता। परन्तु केवल 'मरना न चाहना' ही पर्याप्त नहीं है। जीवन से पर्याप्त प्रेम होना चाहिये। जीवन की महत्ता समझकर ही मनुष्य जीवन से प्रेम कर सकता है, और महत्ता का बोध होने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। इसलिए प्रार्थना की गई कि हम सौ वर्ष तक आँखें खोलकर देखते रहें। सब विद्याओं का उपार्जन करते रहें। अन्धे होकर जीना ठीक नहीं।


दूसरी प्रार्थना है -


'जीवेम शरदः शतम्।'


अर्थात् सौ वर्ष तक जीते रहें।


कुछ लोगों को यह बात अनोखी प्रतीत होती है कि 'जीने की प्रार्थना' का नम्बर दूसरा क्यों? यह तो सबसे पहली प्रार्थना होनी चाहिये। यदि जीवन ही न रहा तो विद्या-प्राप्ति का क्या अर्थ? 


परन्तु इस आशंका का समाधान तो बहुत सुगम है। हम पहले कह चुके हैं कि मनुष्य को दैव के हाथ का खिलौना नहीं बनना है। उसे कर्त्तव्य-पालन करना है। जब हम कहते हैं कि सो बर्ष तक जीवित रहें तो इसका अभिप्राय केवल साँस लेते रहने से नहीं है, अपितु ज्ञानपूर्वक जीवन बिताना है। जीवन के उद्देश्य को पूरा करना ही जीवन है। खाना, पीना, सोना आदि तो मू्र्ख-से-मूर्ख मनुष्य भी कर सकता है। इस मन्त्र में 'जीवेम' (जीवें) का अर्थ है - “धर्म का पालन करते हुए जीना।' गधे और सुअर का जीवन जीना नहीं। विद्वान् का बीस वर्ष का जीवन और मूर्ख का बीस वर्ष का जीवन समान नहीं। मूर्ख का जीवन एक खोटा सिक्‍का है जिसका बाज़ार में कोई मूल्य नहीं। जीवन का उद्देश्य बिना ज्ञान के पूरा नहीं होता। ज्ञान भी कैसा ? वह तत्त्वज्ञान जिससे ज्ञात हो सके कि मैं क्या हूं और मेरे जीवन का ध्येय क्‍या है ? केवल ऊपरी अध्ययन से काम नहीं चलता।


स्रोत : "संध्या - क्या? क्यों? कैसे?", पृ.  111-113, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]




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