कोहरे और जीवन का व्यवहार एक जैसा।

 



 


 


 


कोहरे और जीवन का व्यवहार एक जैसा।
       ठंड के दिनों में अनेक बार धुंध या कोहरा बढ़ जाता है। जब कोहरा बढ़ जाता है तो आगे रास्ता साफ नहीं दिखता। चलने में, यात्रा करने में कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में बुद्धिमान लोग बताते हैं, कि जब दूर तक रास्ता न दिखाई दे, तो धीरे धीरे चलना चाहिए। क्योंकि 50/100 फीट तक ही रास्ता दिखता है। आगे कोहरा होने से नहीं दिखता। यदि कोहरे में तेज गति से चलेंगे, तो कहीं टकरा सकते हैं, चोट खा सकते हैं। छोटी या बड़ी दुर्घटना हो सकती है। उससे हानि होगी। यदि कोहरे में धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाएंगे , तो धीरे-धीरे आगे का रास्ता भी दिखने लगेगा, और दुर्घटना से बचे रहेंगे। इसलिए कोहरे की स्थिति में अपनी गति धीमी कर देनी चाहिए।
           इसी प्रकार से जीवन में भी अनेक बार विषम परिस्थितियां आ जाती हैं। इन विषम परिस्थितियों को आप कोहरे के समान समझ लीजिए। ऐसी परिस्थितियों में भविष्य की योजनाएं कैसे बनाएं? यह सूझता नहीं। तो जीवन में भी विषम परिस्थितियों में अपनी योजनाओं की गति धीमी कर देनी चाहिए। अर्थात् छोटी-छोटी योजना बनाएं। जैसे-जैसे समय बीतेगा, तो आगे परिस्थितियां सुलझती जाएंगी, और आगे की योजनाएं भी बनाने का ठीक अवसर मिल जाएगा।
      यदि परिस्थितियां विषम हों,  और आप दूर तक की (बड़ी) योजना बना लें, तो यह भी वैसी ही बात होगी, जैसी कोहरे में तेज गति से चलना। उसका परिणाम - दुर्घटना हो सकती है। इसलिए अपनी योजनाएं छोटी-छोटी बनाएं। और जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल होंगी, तब आप योजनाओं की गति कुछ बढ़ा सकते हैं। ऐसा करना बुद्धिमत्ता है, और सुखदायक है।
  - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक



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