वैदिक विचार

  किसी योग्य व्यक्ति को समर्पण करने से कल्याण होता है। परंतु जिसे समर्पण किया जा रहा है, वह भी वास्तव में योग्य होना चाहिये।
         संसार में कुछ लोग कम योग्यता वाले होते हैं, और कुछ लोग अधिक योग्यता वाले होते हैं। जैसे बच्चे और विद्यार्थी कम योग्यता वाले होते हैं। माता पिता और गुरुजन अधिक योग्यता वाले होते हैं।
           जब छोटे बच्चे अपने माता पिता को समर्पित होते हैं, तो माता-पिता उनके सब प्रकार से रक्षक कल्याणकारी एवं हितकारी होते हैं। इसी प्रकार से विद्यार्थी भी यदि अपने आचार्यगण को समर्पित होते हैं, तो उनके आचार्यगण भी उनके रक्षक कल्याणकारी एवं हितकारी होते हैं।
         यह समर्पण क्या है? समर्पण का अर्थ होता है, अच्छी प्रकार से अपने आप को किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को सौंप देना। अर्थात अपनी मनमानी नहीं करना, और दूसरे योग्य व्यक्ति के निर्देश का श्रद्धा पूर्वक पालन करना।
        जब व्यक्ति अपनी मनमानी नहीं करता और किसी योग्य के निर्देशन में आचरण करता है, तो उसके कल्याण की जिम्मेदारी उस बड़े व्यक्ति की हो जाती है, जो उसको मार्गदर्शन करता है। तो यदि बच्चे और विद्यार्थी, माता पिता तथा गुरुओं को समर्पित हो जाएँ, श्रद्धापूर्वक उनके आदेश निर्देश का पालन करें, तो निश्चित ही उनका कल्याण होगा। उनका बल बुद्धि विद्या आदि का विकास होगा।
       परंतु कभी-कभी ऐसा देखा जाता है, कि कुछ लोग जब अपने बड़े योग्य व्यक्तियों को समर्पण करते हैं, और बड़े लोग उनके समर्पण पर ध्यान नहीं देते, उनको उचित सम्मान नहीं देते, उनकी उपेक्षा करते हैं, तब छोटों को बड़ों के लिए समर्पण करना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में दोनों (छोटे और बड़े) में से किसी का भी कल्याण नहीं होता।
         तो जैसे छोटे व्यक्ति = बच्चे या विद्यार्थी, बड़ों = माता पिता एवं आचार्य को समर्पण करें, तो बड़ों का भी कर्तव्य है कि वे भी छोटों  की पूरी रक्षा करें। उनके समर्पण पर पूरा ध्यान देवें। उनकी सब प्रकार से सुरक्षा उन्नति बल विद्या बुद्धि का विकास करें। उनके सुख को बढ़ावें। यदि बड़े लोग इस प्रकार से सावधानी रखें, तो सबका जीवन सफल होगा। और यदि बड़े लोग इस कार्य में लापरवाही करेंगे, तो सबकी हानि होगी।
       समर्पण करने वाले छोटे व्यक्ति कौन-कौन हो सकते हैं? जैसे कि बच्चे, विद्यार्थी, नौकर, पत्नी एवं प्रजा इत्यादि। जो बड़े व्यक्ति हैं, जिनको समर्पण किया जा रहा है, वे कौन-कौन हो सकते हैं? क्रमशः माता पिता, आचार्य, सेठ, पति एवं राजा इत्यादि।
- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक





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