सत्यार्थप्रकाश की दार्शनिक विशेषतायें

सत्यार्थप्रकाश की दार्शनिक विशेषतायें


 


सत्यार्थप्रकाश के लेखक जगद्विख्यात महान् आचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती हैं। ऋषि साक्षात्कृत्धर्मा होते हैं। उनकी प्रत्येक बात महत्त्वपूर्ण होती है। अतः सत्यार्थप्रकाश में प्रत्येक बात तथ्य पूर्ण है और अपना विशेष महत्व रखती है। दार्शनिक दृष्टिकोण की कुछ बातें यहां पर लिखी जाती हैं।


सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में परमेश्वर के अनेक नामों का वर्णन है। उनमें विशेष और श्रेष्ठ नाम 'ओ३म्' है। 'ओ३म्' नाम से जगत् की तीनों स्थितियों का वर्णन मिल जाता है। 'ओ३म्' यह एक अक्षर है और समस्त जगत् उसका व्याख्यान है। परन्तु अन्य नामों के देने का प्रयोजन क्या था? उत्तर होगा कि एक परमेश्वर की उपासना को दृढ़ करने के लिए ही इस समुल्लास का यह विस्तार किया गया है।


दूसरी बात सत्यार्थप्रकाश में यह मिलती है कि परमेश्वर को प्रत्यक्ष माना गया है। जिस प्रकार जगत् के पदार्थों में गुणों का प्रत्यक्ष इन्द्रियों को होता है द्रव्य का नहीं फिर भी द्रव्य का प्रत्यक्ष स्वीकार किया जाता है उसी प्रकार परमात्मा के ज्ञान-गुण और ज्ञानपूर्विका क्रिया का प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है। यहां समझने की बात यह है कि इन्द्रियों में गुणों का ही प्रत्यक्ष होता है, द्रव्य का नहीं। द्रव्य का प्रत्यक्ष आत्मा और मन से होता है। इसी प्रकार परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष आत्मा से होता है। प्रत्यक्ष लक्षण तो ऋषि ने न्याय का दिया परन्तु उसमें रहस्य क्या है- इसको भी खोल दिया और इस विशेष बात की ओर ध्यान को आकृष्ट किया।


तीसर बात कारण चर्चा की सत्यार्थप्रकाश में मिलती है। महर्षि ने निमित्त, उपादान और साधारण- ये तीन कारण स्वीकार किये हैं। वे निमित्त समवायि और असमवायि भी नवीन नैयायिकों की तरह कह सकते थे। परन्तु फिर भी साधारण को अलग कार्य मानना ही पड़ता। माता-पिता पुत्र के कौन से कारण हैं? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यदि उन्हें निमित्त कारण माना जावे तो ठीक नहीं क्योंकि जो जिस कार्य का निमित्त कारण होता है उसका पूरा ज्ञान रखता है परन्तु माता-पिता को पुत्र का पूरा ज्ञान नहीं है। निमित्त कारण के रूप आदि कार्य में नहीं आते। परन्तु पुत्र में कई वस्तुयें माता-पिता से आती हैं। अतः ये निमित्त कारण नहीं- निमित्त कारण परमात्मा है। ये उपादान कारण हो नहीं सकते हैं क्योंकि उपादान कारण में ही अन्त में कार्य का लय है। मिट्टी का घड़ा टूट टूटकर बाद में मिट्टी रह जाता है। पुत्र के विना के बाद वह माता-पिता में लीन नहीं होता है। अतः माता-पिता उपादान कारण भी नहीं हैं। यदि इन्हें असमवायि कारण माना जावे तो भी ठीक नहीं क्योंकि तन्तु में समवेत रूप पट में आता है उसी प्रकार पुत्र माता-पिता में समवेत गुण नहीं हैं। ऐसी स्थिति में यही उत्तर बन सकेगा कि माता-पिता साधारण कारण हैं।


चौथी बात ध्यान देने की यह है कि सत्यार्थप्रकाश में जीव को कहीं पर अणु नहीं लिखा गया है। जीव को परिच्छन्न लिखा गया है। जिसका अर्थ यह है कि 'न अणु, न मध्यम और न विभु।' मध्यम परिमाण जीव हो नहीं सकता है क्योंकि फिर तो अनित्य ठहरेगा। विभु परिमाण भी नहीं है क्योंकि विभु तो परमेश्वर है और वह सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी भी है- जीव वैसा नहीं है। अणु परिमाण भी जीव नहीं है- क्योंकि अणु से भी वह सूक्ष्म है। एक अणु में दूसरा अणु नहीं समा सकता है परन्तु जीव अणु में भी रह सकता है। और एक अणु में कई जीव रह सकते हैं। इसका विशेष विवेचन आर्य सिद्धान्त सागर में हमने किया है।


पांचवीं बात यह मिलती है कि परमात्मा को प्रकृति और जीव से सूक्ष्म माना गया है। प्रकृति से जीव सूक्ष्म है और जीव से भी परमेश्वर सूक्ष्म है। परमेश्वर प्रकृति और जीव दोनों में व्यापक है। उद्योतकर आदि दार्शनिक जीव में परमात्मा को व्यापक नहीं मानते हैं। वे इस प्रश्न को कि आत्मा परमात्मा का व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है वा सयोग सम्बन्ध है। अव्याकरणीय कहकर छोड़ देते हैं। परन्तु महर्षि ने व्याप्य व्यापक सम्बन्ध माना है।
-'आर्योदय' (विक्रमी संवत् २०२०) के अंक से साभार


लेखक- आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ


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