ज्ञानमयी अमृतवाणी

 



 


 


 


   ज्ञानमयी अमृतवाणी 


       🌷 सदगुण न हों तो रूप का होना व्यर्थ है, विनम्रता न हो तो विद्या का होना व्यर्थ है, उपयोग या काम में प्रयुक्त न किया जाए तो उस धन का होना व्यर्थ है, साहस न हो तो हथियार का होना व्यर्थ है, भूख न हो तो भोजन के होने का क्या मतलब, प्रेम न हो तो भाई का होना व्यर्थ है, होश न हो तो जोश का होना व्यर्थ है, जोश न हो तो जवानी किस काम की और यदि जीवन में परोपकार न हो तो  - यह पूरा जीवन ही व्यर्थ है ।


      अनुचित आहार से पेट खराब होता है, आलस्य से दिन खराब होता है, कर्कशा स्त्री से रात खराब होती है, मुर्ख पुत्र से कुल खराब होता है, झूठ बोलने से बात खराब होती है, कटु भाषण से सम्बन्ध खराब होते है, लोलुपता से नीयत खराब होती है, अनियमितता से स्वास्थ्य खराब होता है , जरूरत से ज्यादा धन हो तो बुद्धि खराब होती है, और यदि अपने कर्मों और कर्तव्यो का ठीक से पालन न किया जाए तो यह पूरा जीवन ही खराब हो जाता है ।


      खाया हुआ अन्न न पचने पर विष हो जाता है, अभ्यास न करने पर विद्या विष हो जाती है, वृद्ध पुरुष के लिए नवयुवा स्त्री का सहवास विष का काम करता है, घी और शहद समान मात्रा में मिलने पर विष हो जाते है, कटु वचन से वाणी विष हो जाती है, तरुणी विधवा के लिए कामवासना विष हो जाती है, विद्यार्थी के लिए आलस्य विष हो जाता है, कर्कशा पत्नी का साथ पति के लिए और पौरूषहीन पति का साथ पत्नी के लिए विष के समान होता है तथा अति करना सब जगह विष का काम करता है। 


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