चाणक्य नीति श्लोक 

 



 


 


 


 चाणक्य नीति श्लोक 


       माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठित:। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।


        अर्थ:-  ऐसे माता व पिता शत्रु  के समान होते है,  जो अपनी सन्तान या पुत्र को विद्या का अध्ययन नहीं कराते, क्योंकि ऐसा विद्याहीन या अशिक्षित पुत्र विद्वानों व शिक्षित लोगों के बीच  वैसे ही शोभा नहीं देता, जैसे हंसो के बीच बगुला शोभा नहीं देता ।


      जो अपने बालक को पढाते नहीं, ऐसी माता शत्रु समान और पिता वैरी है ।क्योंकि हंसो के बीच बगुले की भांति, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाता ।


    भोज्यं भोजनशक्तिश्चि रतिशक्तिर वरांगना। विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपस: फलम्।।


        अर्थ:- भोज्य पदार्थ,  भोजन-शक्ति,रतिशक्ति, सुन्दर  स्त्री, वैभव तथा दान - शक्ति, ये सब कुछ किसी अल्प तपस्या का फल नहीं होते ।


      भोजन के योग्य पदार्थ और भोजन करने की क्षमता, सुन्दर स्त्री और उसे भोगने के लिए काम शक्ति, पर्याप्त धनराशि  यथा दान देने की भावना  - ऐसे संयोगो का होना किसी सामान्य तप का फल नहीं है ।


     ते पुत्रा ये पितुभक्ता:स: पिता यस्यु पोषक:। तन्मित्रं यत्र विश्वास: सा भार्या या निवृत्ति:।।


           पुत्र वही है, जो पिता का भक्त है। पिता वही है, जो पोषक है ।मित्र वही है, जो विश्वास पात्र हैं ।पत्नी वही है, जो हृदय को आनन्दित करें ।


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