आज का वैदिक विचार

       


 


 



 


गुण दोष बताने वाला एक व्यक्ति अपने जीवन में ऐसा जरूर रखें, जो आपको निर्भयतापूर्वक आपके दोष बता सके।
        प्रत्येक व्यक्ति में कुछ गुण भी होते हैं, और कुछ दोष भी होते हैं। गुण सदा सुख ही देते हैं। और दोष सदा दुख ही देते हैं।
 दुख भोगना कोई भी नहीं चाहता। इसका अर्थ हुआ कि दोष जब भी होंगे,  जहां भी होंगे, वे आपको और दूसरों को दुख ही देंगे।       जब आपके दोषों से दूसरों को दुख होता है, तो उस दुख से बचने के लिए, दूसरे लोग आपके दोषों का निवारण करना चाहते हैं। निवारण कब होगा, जब वे आपको आपके दोष बताएंगे। वे आपको आपके दोष तभी बताएंगे, जब उनको दोष बताते हुए आपसे डर न लगे।
       जब तक वे आपको आपके दोष बताएंगे नहीं, तब तक आप को पता नहीं चलेगा कि आपमें क्या क्या दोष हैं? जब दूसरे लोग आपको दोष बताने लगते हैं, तो सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार, आपको अच्छा नहीं लगता। अपमान सा अनुभव होता है, क्रोध आता है , और आप अपना दोष पूरा सुने बिना ही, अथवा सुनकर भी आप क्रोधित हो जाते हैं। और फिर उसकी प्रतिक्रिया करते हैं। दुखी होकर आप भी दोष बताने वाले के 2/4 दोष बता देते हैं, ताकि वह आपके और अधिक दोष न बताए।
 ऐसी स्थिति में दोष बताने वाले को डर लगता है, कि यदि वह आपके दोष बताएगा तो 2/4 दोष उसको भी आप के मुख से सुनने पड़ेंगे। वह भी अपने दोष सुनना नहीं चाहता। इसलिए वह चुप रहना ही ठीक समझता है। 
      इस सारी मानसिक प्रक्रिया का परिणाम यह होता है, कि किसी के भी दोष दूर नहीं हो पाते। वे दोष वर्षों तक एक दूसरे को दुख देते रहते हैं। इसलिए संसार में झगड़े चलते रहते हैं।
     बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। जब लोग आपके मुख पर आपको दोष नहीं बता पाते, तो आपके दोषों से दुखी होकर किसी और के सामने वे आपके दोष बताते हैं , ताकि उनका दुख हल्का हो जाए। परंतु इस से समस्या का कोई समाधान नहीं निकलता। समाधान तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दोष सुने। उन दोषों पर ठंडे दिमाग से विचार करे। और यदि वास्तव में वे दोष उसमें हों, तो उन्हें दूर करें,  जिससे उसका और दूसरों का दुख कम हो जाए। उन दोषों को छोड़कर उनके स्थान पर उत्तम गुणों को धारण करे, जिससे उसका और दूसरों का सुख बढ़े।
        इसके लिए आपको यह करना होगा, कि कम से कम एक व्यक्ति आप अपने जीवन में ऐसा चुनकर रखें, जो आपको दोष बताने में डरे नहीं। उसके मुँह से अपना दोष सुनकर आप क्रोधित न हों। उस पर वापसी आक्रमण न करें। इतनी निर्भयता यदि उसे आपकी तरफ से हो जाए, तो वह निर्भय होकर आपके दोष बताएगा। आप उन दोषों पर शान्ति से विचार करें। यदि दोष हों, तो उन्हें दूर करें। यदि न हों, तो उस व्यक्ति को प्रेम पूर्वक स्पष्टीकरण कर दें, कि मुझमें यह दोष नहीं है। हो सकता है आपको भ्रांति हो  गई हो। ऐसा आचरण करने से तो संसार में दुख कम होंगे और सुख बढ़ेगा, अन्यथा नहीं।
 - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक


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