योग का अंग "सम्प्रज्ञात समाधि

 


 



 


 


योग का अंग "सम्प्रज्ञात समाधि


प्रवक्ता: अन्तराष्ट्रीय वैदिक विद्वान् आचार्य प्रभामित्र जी 


ओ३म 


सभी को सादर नमस्ते 


महर्षि पतञ्जलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' के रूप में परिभाषित किया है। योगसूत्र में उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग, आठ अंगों वाले, योग को आठ अलग- अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। 
महर्षि पतंजली ने योगदर्शन के पाद 2 सूत्र 29 मे योग को आठ भागो मे विभाजित किया हैं: 
यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार 
धारणा ध्यान समाधयोङष्टावंगानि॥ 
अर्थात:- 
आष्टांग योग के आठ अंग हैं: 
1) यम  2) नियम  3) आसान 4)प्राणायाम 5) प्रत्याहार 6) धारणा 7) ध्यान 8) समाधि


समाधि क्या हैं तथा यह कितने प्रकार की होती हैं ?


अष्टांग योग की उच्चतम सोपान समाधि है। यह चेतना का वह स्तर है, जहां मनुष्य पूर्ण मुक्ति का अनुभव करता है। योग शास्त्र के अनुसार ध्यान की सिद्धि होना ही समाधि है।


समाधि को समझने से पुर्व हमे जप को समझना चाहिए महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने कहा हैं कि, अगर साधक ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है तो पहले जप का अभ्यास करें।


महर्षि पतंजली कहते हैं कि -
तस्य वाचक: प्रणव: (योगदर्शन, १.२७)
अर्थात- ॐ परमात्मा का वाचक है।


ॐ का जप अर्थ के साथ करना चाहिए जप तीन प्रकार से कर सकते हैं- 
1) वाचिक-बोलकर 
2) उपान्शु - इसमें केवल होठ हिलते है जिसे कोई सुन नही सकता हैं केवल हम बोले और हम ही सुन सकते है।
3) मानसिक- मन द्वारा बार-बार मंत्र  चिन्तन होता हैं। यही जप धारणा बन जाता हैं अर्थात एक विषय मे मन रुक जाता है और वही ध्यान बन जाता हैं और वही ध्यान समाधि बन जाती हैं।


इसिलिए यहाँ कहा जा सकता हैं कि जप से ही समाधि का आधार प्रारम्भ हो जाता हैं।


समाधि की परिभाषा देते हुए महर्षि 
पतंजली कहते हैं कि-


तदेवार्थमात्र निर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:।


अर्थात -  वह ध्यान ही समाधि है जब उसमें ध्येय अर्थमात्र से भाषित होता है और अन्य स्वरूप शून्य जैसा हो जाता है। यानि ध्याता (योगी), ध्यान (प्रक्रिया) तथा ध्येय (ध्यान का लक्ष्य) इन तीनों में एकता-सी होती है। समाधि अनुभूति की अवस्था है। वह शब्द, विचार व दर्शन सबसे परे है।


समाधि दो प्रकार की होती हैं:-
1) सम्प्रज्ञात समाधि 
2) असम्प्रज्ञात समाधि 


सम्प्रज्ञात समाधि:- यह समाधि का प्रथम चरण हैं  जो चित्त से सम्बंध रखता है इस समाधि को समझने के लिए हमे पहले समापत्ति (एकाग्रता) को समझना होगा।


1) सवितर्का समापत्ति :- कोई भी साधक जब शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों को एकत्व भाव मे समझता है तथा अपने मन को स्थूल पदार्थ मे लगाता है तो उसे सवितर्का समापत्ति कहते हैं।


समापत्ति को समझने के लिए इन तीनो (शब्द, अर्थ, ज्ञान) को कुछ उदहारण से समझते हैं।


1) उदाहरण:- शब्द: गौ (गाय) एक शब्द है 
अर्थ: उस गाय की गर्दन मे जो माँस की एक झालर लटक रही है, वह गौशाला मे बंधी हैं जिसके चार पैर है दो सिंग हैं यह अर्थ हो गया जोकि गौशाला मे "गाय" है।
ज्ञान: ज्ञान कहते हैं समझ को कि इसी को गौ कहा जाता हैं।
 
शब्द,अर्थ और ज्ञान यह तीनो एकत्व भाव से रहते है तथा आपस मे मिश्रित रहते है।


2) उदाहरण:- शब्द  रसगुल्ला
अर्थ- जो हलवाई की दुकान पर ट्रे मे रखा हैं गोल-गोल ज्ञान इसी को रसगुल्ला कहा जाता हैं।


स्थूल पदार्थो मे शब्द, अर्थ और ज्ञान एकत्व भाव से प्रकट होना जिनको अलग-अलग कर पाना सम्भव ना हो तो यह सवितर्का समापत्ति हैं।


निवितर्का समापत्ति:- वह स्थूल पदार्थ जिसमे केवल अर्थ की प्रतिती (अनुभूति) हो शब्द तथा ज्ञान गौण हो गया हो वह निवितर्का समापत्ति कहलाती हैं।


जैसे:- जब तक रसगुल्ला हमारे मुह मे नही जायेगा हमे उसका लाभ नही मिलेगा अर्थात शब्द तथा ज्ञान से मुह मीठा नही होगा।


सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेद हैं- (1) वितर्कानुगत (2) विचारानुगत (3) आनन्दानुगत (4) अस्मितानुगत।


(1) वितर्कानुगत:- जहा शब्द,अर्थ और ज्ञान ये तीनो मे केवल अर्थ की प्रतिती हो तथा साधक (आत्मा या कर्ता ), साधन (चित्त या बुद्धि) गौण हो और केवल साध्य (गौ) मे प्रतिती हो।


अर्थात में आत्मा अपने चित्त से गौ रुपी अर्थ का प्रत्यक्ष कर रहा हूँ। इस समाधि मे अर्थ की प्रतिती होगी शब्द तथा ज्ञान गौण रहेगा। जहा पर अर्थ को आत्मसाध कर लिया जाता हैं वहा पर शब्द नही बोले जाते हैं:-
जैसे:- "जल" आप गर्मी मे तप रहे हैं और आपको बहुत तेज प्यास लग रही हैं और आपने जल मांगा तो प्यास की स्थिति मे आपके चित्त मे जो वह तरल पदार्थ हैं वही परिभाषित हो रहा है भले आपने जल शब्द का प्रयोग किया हैं और आपका ज्ञान है की तरल पदार्थ को ही जल कहा जाता हैं। यह जो ज्ञान है गौण हो गया है शब्द ज और ल आपका मस्तिष्क रिप्लाई नही कर रहा हैं क्योकिं आपको इतनी तेज प्यास लग रही हैं कि आप उस जल के अर्थ मे समादिष्ठ हैं कि कब वह तरल पदार्थ मिले और मेरी प्यास बुझ जाये।


स्थूल विषय मे अर्थ की प्रतिती होना और उस अर्थ के साथ जो साधक हैं उसे अपना बोध रहेगा तो ऐसी स्थिति मे वह वितर्कानुगत समाधि कहलाएगी।


(2) विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि :-
जिस भावना द्वारा स्थूलभूतों के कारण पंच सूक्ष्मभूत तन्मात्राएं तथा अन्तः करण आदि का सम्पूर्ण विषयों सहित साक्षात्कार किया जाये 


अर्थात साधक को केवल यह अनुभूति होनी चाहिए कि में आत्मा अपने चित्त से केवल शब्द स्पर्श, रूप रस गंध की अनुभूति कर रहा हूँ। सूक्ष्म विषय मे जैसे ही अर्थ की प्रतिती होने लगे तो वह विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है। 


(3) आनन्दानुगतय सम्प्रज्ञात समाधि :- 
यह वह समाधि हैं जिसमे बुद्धि,मन, इन्द्रियाँ और अहंकार को विषय बना लेते हैं और केवल इनका साक्षात्कार होता हैं सिर्फ अर्थ की प्रतिती हो रही है और शब्द तथा ज्ञान गौण हैं।


आँख,कान, नाक आदी स्थूल हैं यह इन्द्रियाँ नही है जो देखने सुनने का सामर्थ्य हैं वह इंद्रियाँ है जो जन्मों जन्मान्तर जब तक मोक्ष ना मिले या महाप्रलय ना हो हमारे साथ चलती जाती हैं।


 (4)अस्मितानुगत:- यह वह समाधि है जिसमें केवल मैं ही में को देख रहा हूँ अर्थात आत्मा का प्रत्यक्ष कर रहा हूँ (स्वयं की प्रतिती) 


आत्मा का ज्ञान होना ही उसका प्रत्यक्ष होना कहलाता हैं।
जैसे:- दर्पण पर पेंट लगाने वाला अपना चेहरा उस पर नही देख सकता किन्तु पेंट हटाकर वह खुद से खुद को देख सकता हैं उसी प्रकार चित्त एक ऐसा दर्पण हैं जिसके माध्यम से साधक स्वयं ही स्वयं को देखता है।


साधक सम्प्रज्ञात समाधि मे वृत्तिया रहती हैं, वहा पर ज्ञान (समझ) रहती हैं तो वह कौनसी समझ रहती हैं एक उदहारण से समझते हैं:-


जैसे:- पैर मे काटा लगने पर उसे दुसरे काटे से निकाला जाता वैसे ही जो संसारिक विचार हमारे मन मे चल रहे हैं सब मिथ्यावृत्ती हैं इन वृत्तियों को हटाने के लिए जो ज्ञान की वृत्ति हमे पैदा करनी होती है वह ध्यान से प्रकट होगी।


अगर संसारिक काटे को हमें हटाना हैं तो विवेकज्ञ ज्ञान पैदा करना होगा जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं और यह ज्ञान हंसवत होता हैं जैसे हंस दुध को पी लेता है पानी को अलग छोड़ देता हैं अर्थात दुध और पानी अलग-अलग कर देता हैं वैसे ही एक योगी (साधक) ऐसी स्थिति मे सत्य तथा असत्य को अलग कर पाता है जो केवल साधना से ही सम्भव है जिस वजह से उसे परमहंस या हंसवत कहते हैं।


सम्प्रज्ञात समाधि मे जाने के लिए कुछ सावधानी रखनी होती हैं जो मन के साथ जुड़ी हैं:
1) मन को जड़ समझना चाहिए।
2) मन को अधिकार मे ना कर पाने का कारण ढूढना।
3) आत्मा के द्वारा ही संस्कार के अनुरुप मन को संचालित मानना ।


जब आप यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, जप और ध्यान आदि का पालन करेगे तथा वेद, योगदर्शन, मोक्षशास्त्र आदी का निरंतर स्वाध्याय करेगे तो आपको समाधि की गहरी बात स्वयं समझ मे आने लगेगी। जिससे साधक के लिए समाधि का मार्ग आसानी से खुलता जायेगा।


नोट:- जितना में सम्प्रज्ञात समाधि को समझ पायी उतना मैने वर्णन कर दिया अत: विद्वानो से निवेदन हैं कि समझ कर आवश्यक सुधार कर लेवें--नीतु दुबे 


 


 


 


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