यम-नियम

 


 


 


साभार -धर्म शिक्षा 


लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती 



यम-नियम - परमात्मा की प्राप्ति का साधन है


 महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में अष्टाङ्गयोग (योग के आत अडों) का वर्णन किया है। उनमें प्रारम्भ के दो अङ्ग यम और नियम हैं।


ये दोनों अङ्ग दिव्य मानव जीवन आवश्यक हैं,  अतः उनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा हे 


यम पाँच हैं


 १. अहिंसा-मन, वचन, कर्म से किसी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना


२. सत्य-मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करना।


३. अस्तेय-चोरी न करना। बिना स्वामी आज्ञा के किसी पदार्थ को न उठाना।


. ब्रह्मचर्य-ईश्वर में विचरण करना, वेदअध्ययन करना, ज्ञानोपार्जन और वीर्य की रक्षा करना


. अपरिग्रह-अभिमानी न होना और पदार्थों का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।


नियम भी पाँच हैं


१. शौच-बाहर और भीतर की पवित्रता रखना।


२. सन्तोष-अपनी शक्ति के अनुसार प्रबल पुरुषार्थ करना और उस पुरुषार्थ से जो फल मिले उसमें सन्तुष्ट रहना।


३. तपः-गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति में सम रहना, शोक और हर्ष से ऊपर उठना। . वेदादि


. ४. स्वाध्याय-जीवन को ऊँचा उठाने वाले वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करनाओम् का जप करना और 'मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाना -इन तत्त्वों पर विचार करना


५. ईश्वरप्रणिधान-अपने-आपको ईश्वर के अर्पित कर देना।


प्रभु की आज्ञा में चलना, उसकी आज्ञा के विरुद्ध कोई भी कार्य न करना। वैयक्तिक और सामाजिक उन्नति के लिए यमनियमों का पालन आवश्यक है। ये सार्वभौम महाव्रत हे | 


साभार -धर्म शिक्षा 


लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती 


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