🌹 विश्वानि मंत्र व्याख्या 🌹

ओ३म् 🔥🕉


               


🌹मंत्र🌹


ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥


🌹भाष्यम्🌹


 हे सच्चिदानन्तस्वरूप! हे परमकारुणिक! हे अनन्तविद्य! हे विद्या- विज्ञानप्रद! (देव! हे सूर्यादि-सर्वजगद्विद्या-प्रकाशक! हे सर्वानन्दप्रद! (सवितः) हे सकलजगदुत्पादक ! (नः) अस्माकम् (विश्वानि) सर्वाणि (दुरितानि) दुःखानि सर्वान् दुष्टगुणांश्च (परासुव) दूरे गमय। (यद्भद्रं) यत्कल्याणं सर्वदुःखरहितं सत्यविद्या-प्राप्त्याऽभ्युदय-निःश्रेयस-सुखकरं भद्रमस्ति (तन्नः) अस्मभ्यं (आसुव) आ समन्तादुत्पादय कृपया प्रापय।```


🌹मंत्रार्थ🌹 


 हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये।
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🌹व्याख्या🌹


दुरितानि परासुव अर्थात् जो कुछ भी दूर करने योग्य है त्याज्य है उसको त्याग करना दुर्गुणों अशांति और दुःख का त्याग करना।


🌹दुःख और अशान्ति के मूल कारण🌹


संसार में जो दुःख और अशांति है इसके तीन मूल कारण हैं। अज्ञान, अभाव, अन्याय। जब तक इन कारणों को दूर न किया जाए तब तक सुख और शांति नहीं हो सकती। 


🌹अज्ञान🌹


 अज्ञान के कारण लोग कई प्रकार के मिथ्या विश्‍वासों में फँसकर बहुत दुःख उठाते हैं। संसार में इस प्रकार अनेक प्रकार के मिथ्या विश्‍वास फैले हुए हैं। परन्तु मैं इस लेख में केवल कुछ बातों का वर्णन करना चाहता हूँ। 


 जो लोग निराकार शुद्ध चेतन सर्वज्ञ ईश्‍वर के स्थान पर अपने प्रकार के देवी-देवताओं की जड़ मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करते हैं, वे घोर अन्धकार को प्राप्त होकर बहुत दुःख उठाते हैं, क्योंकि उपास्य देव के गुणों को ही उपासक ग्रहण करता है। इसलिए जड़ मूर्तियों के उपासक जड़त्व को ही ग्रहण करते हैं। इससे यह लोग उस परम आनंद से वंचित रह जाते हैं जो आनंद, आनंद-स्वरूप सुखस्वरूप परमात्मा की उपासना से प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त भिन्न-भिन्न देवी- देवताओं की पूजा से अपने मत-मतान्तर फैल जाते हैं, जिससे आपस में विरोध बढ़कर लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं जो कि बहुत ही, दुःख का कारण होते हैं। 


जो लोग ईश्‍वरीय ज्ञान को वेद न मानकर, उसके स्थान पर मनुष्यकृत ग्रंथों में विश्‍वास रखते हैं और उनमें लिखी हुई सृष्टि नियम के विरुद्ध, विज्ञान और बुद्धि के विपरीत, असत्य कहानियों को सत्य मान लेते हैं, वे लोग कई और अन्धविश्‍वासों में फँसने से नहीं रह सकते। 


जो लोग राम-कृष्ण आदि महापुरुषों को ईश्‍वर का अवतार मानकर इन महापुरुषों के जीवन से कोई भी शिक्षा ग्रहण नहीं करते, और इस अन्धविश्‍वास के कारण इन महापुरुषों के नाम की माला जपने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, यज्ञ परोपकार आदि शुद्ध कर्मों के कारने की आवश्यकता नहीं समझते, वे स्वार्थ परायण बनकर अशुभ कर्मों में फँस जाते हैं। अशुभ कर्मों के करने से दुःख और अशांति तो बढ़ती ही है। 


ऐसे सम्प्रदाय, जो केवल यीशू मसीह को ही भगवान का एकमात्र पुत्र और केवल मोहम्मद साहब को ही परमेश्‍वर को परमेश्‍वर का रसूल मानते हैं और इन पर ईमान लाने को ही स्वर्ग का साधन मानते हैं, उनके मत के अतिरिक्त शेष सब मतो के लोग काफिर हैं, ऐसे सम्प्रदाय संसार में सबसे अधिक अशान्ति  फैलाते हैं। अपने को अच्छा अन्यों से बुरा समझना, प्रेम के स्थान पर घृणा का प्रचार करना, इससे अधिक और क्या होगा। 
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🌹अभाव🌹


भारत वर्ष में कई वस्तुओं का अभाव है जो दूसरे देशों से मंगवानी पड़ती है। परन्तु जनसाधारण की जीवनोपयोगी भोजन-वस्त्र आदि की कमी नहीं है। फिर भी अधिक लोगों को खाने की रोटी, पहनने को वस्त्र, रहने को मकान हीं मिलता। शीत ऋतु में रात को जब मकान के भीतर रजाई ओढ़कर भी मनुष्य सर्दी अनुभव करता है, उस कड़ाके की सर्दी में मैंने स्वयं अपनी आँखों से, दिल्ली चाँदनी चौक फव्वारा बस-स्टैण्ड पर कई मजदूरों को रात के समय नीले आकाश की छाँव में टाट ओढ़कर सोए देखा है। ये बेचारे कितने कष्ट में हैं। आँखों में आँसू आ जाते हैं। जब मनुष्य की स्त्री फटे-पुराने चीथड़ों में शीत से ठिठुर रही हो और वह उसे वस्त्र न दे सके, जब मनुष्य की सन्तान या उसकी पत्नी या वह स्वयं बीमार हो, किन्तु दवाई का प्रबन्ध न हो सके, जो मनुष्य अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता हो, परन्तु पढ़ाई खर्च पूरा न कर सकता हो, जब मनुष्य पर कोई दुःख-सुख आ जाए और कोई उसकी सहायता करने वाला न हो, ऐसी अवस्था में उसका हृदय फटेगा  नहीं, तो क्या होगा? भारत वर्ष में अधिक संख्या ऐसे लोगों की है जिनकी धन के अभाव के कारण साधारण आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं। इससे इनका मन दुःखी और अशान्त हो जाता है। इनकी आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है और जब इनको धैर्य देने वाला भी कोई नहीं होता, तब ये अभागे मनुष्य या तो आत्महत्या कर लेते हैं या ईसाई पादरियों अथवा मौलवियों के जाल में फँसकर अपने पूर्वजों का धर्म गँवा बैठते हैं और भारतवर्ष के लिए कई प्रकार की उलझनें उत्पन्न कर देते हैं। 
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🌹अन्याय🌹


 महर्षि स्वामी दयानंद ने लिखा है कि पापी दुराचारी चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका वाणी से भी सत्कार नहीं करना चाहिए, और धर्मात्मा सदाचारी चाहे कितना भी निर्बल- निर्धन क्यों न हो, उसका आदर सत्कार अवश्य करना चाहिए। परन्तु वर्तमान समय में लोग इसके विपरीत चलते हैं। धनवान व्यक्ति चाहे कितान भी झूठा, फरेबी, बेईमान, दुराचारी और अयोग्य क्यों ना, फिर भी समाज में उसका अधिक से अधिक सम्मान होता है, क्योंकि वह सभाओं संस्थाओं को दान दे सकता है। बड़े-बड़े नेताओं को पार्टियाँ दे सकता है। परन्तु निर्धन चाहे कितना भी योग्य, विद्वान, सदाचारी, धर्मात्मा क्यों न हो, उसका समाज में कोई नहीं होता। क्या यह अन्याय नहीं? एक धनवान व्यक्ति बड़े से बड़ा अपराध करके भी घूस देकर दंड से बच सकता है, परन्तु एक निर्धन व्यक्ति यदि किसी अपराध के संदेह में भी पकड़ा जाए तो इसका छुटकारा कठिन होता है। निर्धन की न कोई जमानत देता है, और न उसके लिए कोई गवाही देता है। यह कितना घोर अन्याय है। जो लोग प्रातः से सायं तक परिश्रम अथवा मजदूरी करते हैं, उन्हें तो भरपेट रोटी नहीं मिलती, परन्तु जो कुछ भी काम नहीं करते उन्हें अधिक खा-खाकर अजीर्ण हो जाता है। 


सत्य तो यह है कि अमीर के कुत्ते भी गदेलों पर आराम करते हैं, कारों में घूमते हैं, दूध और मक्खन खाते हैं। परन्तु गरीब के बच्चों के भाग्य में रूखी रोटी भी नहीं होती। समाज का इससे अधिक अन्याय और क्या हो सकता है? सवर्ण हिन्दू हरिजनों पर कितना अत्याचार करते हैं? यदि हरिजन बन्धु कानून का सहारा लेना चाहें तो उन्हें डराया-धमकाया जाता है और वे भय के कारण चुपचाप अत्याचार सहन करते रहते हैं। कई युवक बिना दहेज के किसी निर्धन कन्या से विवाह नहीं करना चाहते चाहे वह कितनी भी सुन्दर, सुशील और योग्य क्यों ना हो। क्या यह पुरुष जाति का स्त्री जाति के प्रति घोर अन्याय नहीं? बड़े-बड़े साहूकार गरीबों को अधिक से अधिक ब्याज पर उधार देकर आयुपर्यन्त उनका खून चूसते हैं। क्या यह कम अत्याचार है? 


हमें अपने आप को और समाज को बुराई और दुर्गुण के इस मूल कारण से बचाना होगा। जब समाज मे हर व्यक्ति ज्ञानी होगा, एक दूसरे का हित चाहने वाला होगा, न्यायप्रिय और उदार होगा , सबसे आत्मवत व्यवहार करने वाला होगा तो समाज से दुरित दूर हो सकेंगे और भद्र की प्राप्ति होगी।


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