विपल्व  भूमि बंगाल

 


 




 


 भारत में अंग्रेजों ने सर्वप्रथम सूरत से अपना व्यापार करना आरम्भ किया था मगर उनका राज्य सर्वप्रथम भारत के पूर्वी समुद्री छोर से आरम्भ हुआ। पश्चिमी किनारे पर मराठा शक्ति  उनकी सत्ता कायम न हो पाई। इधर बंगाल का समुद्री तट अरक्षित था। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को मरते समय अलीवर्दी खान ने आगाह किया था कि, ""अंग्रेजों को किलेबंदी करने की या फौज रखने की इजाज़त मत देना, नहीं तो तुम इस मुल्क में नहीं रह पाओगे। " नवाब ने समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया। अन्तत प्लासी की लड़ाई में उसकी  हार हुई और अंग्रेजों का बंगाल पर अधिकार हो गया। यह केवल बंगाल ही नहीं अपितु भारत के स्वातंत्रय-सूर्य के अस्त का प्रारम्भ था। जहाँ प्लासी की लड़ाई के तीन साल पहले तक अंग्रेज व्यापारी ढाका और मुर्शिदाबाद की सड़कों पर डरते हुए चला करते थे। वहां आज उनका राज था। 


 नवाब से गद्दारी करने वाले मीर जाफ़र को बदले में अंग्रेजों को इतनी कीमत चुकानी पड़ी कि उसका राजकोष खाली हो गया पर अंग्रेजों की मांग की पूर्ति नहीं हुई। उसके बाद मीर कासिम बैठा तो उसने 27 दिसम्बर, 1760 को बर्दमान, मिदनापुर और चटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को दे दी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1766 में जंगल महाल के जमींदारों को मालगुजारी देने के लिए बाध्य किया। परिणामस्वरूप 300-400 मील तक विद्रोह की आग भड़क उठी। फर्ग्युसन ने अपनी फौज लेकर अनगिनत अत्याचार किये।  अंग्रेजों की सुसंगठित फौज के समक्ष जमींदार हार गए। मगर अंग्रेजों की अधीनता उन्होंने स्वीकार नहीं की। वे अपने महलों और किलों में आग लगाकर जंगलों में जा छिपे। 


यह विद्रोह अभी शांत भी नहीं हुआ था कि पूर्वी बंगाल के सशस्त्र सन्यासियों ने विद्रोह कर दिया। इतिहास में पहले भी सन्यासी अकबर और औरंगज़ेब से टक्कर ले चुके थे। बंकिमचंद्र के 'देवी चौधरानी' नामक उपन्यास में भवानी पाठक और देवी चौधरानी की चर्चा कोई काल्पनिक नहीं है, बल्कि वे दोनों साधुओं के दल के साथ जिसका नेता मजनूशाह था, सम्बंधित थे। ये सन्यासी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक फैले हुए थे। देश की आम जनता इनका धन, राशन पानी और हथियार उपलब्ध करवाती थी।    सन 1763 में  सन्यासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की ढाका वाली कोठी पर कब्ज़ा कर लिया। अंग्रेज ढाका छोड़कर भाग गए। दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी, मैमनसिंह, रंगपुर और राजशाही में सन्यासियों की अंग्रेजों से मुठभेड़ हुई। अधिकांश स्थानों पर अंग्रेजों की सेना हारी। 1772 में जलपाईगुड़ी में सन्यासियों की बड़ी हार हुई। अनेक सन्यासी मारे गए। उसके बाद जलपाईगुड़ी पर अंग्रेजों का अधिपत्य हो गया। 1776-1786 के मध्य सन्यासियों और अंग्रेजों की अनेक मुठभेड़ हुई। यह संघर्ष 1794 में जाकर शांत हुआ। 


इसके बाद मिदनापुर के जंगल महाल इलाके में चुहाड़ लोगों ने विद्रोह कर दिया। जिन जमींदारों की जागीरदारी जब्त हुई थी। उन्होंने संघर्ष में साथ दिया। इस विद्रोह में मिदनापुर, वीरभूम, बर्दवान और मानभूम के जिलों के लोग शामिल थे। यह संघर्ष अभी शांत नहीं हुआ था कि मिदनापुर के उत्तरी भाग के लोगों ने विद्रोह कर दिया। इसे इतिहास में नायकों के विद्रोह की संज्ञा दी गई है। नायक लोगों के राजा छत्रसिंघ को गद्दी से अंग्रेजों ने उतार दिया था। जिसके विद्रोह में पहले छत्रसिंघ बाद में अचल सिंह ने चलाया। 1816 में अंग्रेजों ने नायक विद्रोह का दमन करने के लिए उनके केंद्र में आग लगा दी और सवा दो सौ आदमियों को फांसी पर लटका दिया। 


उस एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक है। द्वितीय बर्मा युद्ध की घटना है। बर्मा में युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों की टुकड़ी भेजी जानी थी। सवारी के लिए सैनिकों को बैल की सवारी करने का आदेश दिया गया। अधिकांश सैनिक देहाती हिन्दू थे जो बैल को शिवजी का वाहन नंदी के रूप में मानते थे और उसकी सवारी करना पाप कर्म मानते थे। उन्होंने जाने से मना कर दिया। अंग्रेज कप्तान कार्टराइट ने गुस्से में उन्हें पहले निशस्त्र किया पश्चात पंक्ति में खड़ा कर गोलियों से भून दिया। उनकी लाशों को समुद्र में फेंक दिया। यह कांड 1824 में हुआ जिसमें 700 सैनिकों के प्राण गए थे। जलियांवाला कांड से 100 वर्ष पूर्व घटे इस कांड का किसी इतिहास पुस्तक में उल्लेख तक नहीं मिलता। 


1831 में तीतू मियां के नेतृत्व में नदिया, फरीदपुर और चौबीस परगना में अंग्रेजों के विरुद्ध लोग उठ खड़े हुए। ये मुख्यत मुसलमान थे। अंग्रेजों ने टुकड़ी भेजकर इन्हें रोका। तितू मियां मरते दम तक लड़ते रहे। अंत में उनकी पराजय हुई। मियां के साढ़े तीन सौ सैनिकों को बंदी बना लिया गया। 


1854 में कंपनी के अत्याचारों से तंग आकर संथालों ने प्रतिकार आरम्भ कर दिया। यह विद्रोह एक गांव से दूसरे गांव में फैल गया। 30 जून 1855 को 30 हज़ार संथाल धनुष बाण और भाले लेकर कोलकाता की ओर चल पड़े। आरम्भ में यह जुलुस शांत था। दो संथाल नेताओं पर चोरी का आरोप लगाकर उन्हें बंदी बनाया गया तो वे भड़क उठे। उन्होंने लूटमार और बस्तियों को जलाना आरम्भ कर दिया। अंग्रेजी फौज ने उन्हें घेरकर गोलियों से भून दिया। यह खुला हत्याकांड था। इस विद्रोह का कारण अंग्रेजों के नीति था। वे संथालों से केवल कर लेते थे मगर उन्हें बदले में कोई सुख-सुविधा नहीं देते थे। इस प्रतिकार को दबाने में जितना धन अंग्रेजों के व्यय करना पड़ा। उससे 10 वर्ष का शासन व्यय निकल जाता। 


1757 की प्लासी की लड़ाई के 100 वर्ष बाद तक स्थानीय संघर्ष बंगाल में चलता रहा। 1857 में फिर एक क्रांति हुई जो बंगाल के बैरकपुर छावनी से मंगल पांडेय के रूप में जागृत हुई। इस क्रांति में करीब दो लाख भारतीयों के प्राण गए। हज़ारों को बिना मुकदमा चलाये पेड़ों पर फांसी दे दी गई। सैकड़ों गांव जला दिए गए। वृद्ध, शिशु, अबाल , स्त्री-पुरुष सबका अमानवीय रूप से क़त्ल किया गया। विश्व इतिहास में ऐसे अत्याचार संभवत ही सुनने को मिले। यह राष्ट्र भावना हमें आगे चलकर बंग भंग आंदोलन, अलीपुर बम कांड, चिटगांव कांड आदि के रूप में प्रदर्शित होती रही है।    


हमारी इतिहास पुस्तकों में अंग्रेजों के अत्याचारों को वर्णित करने के स्थान पर अंग्रेजों ने हमें रेलगाड़ी दी, डाक और तार व्यवस्था दी ऐसा पढ़ाया जाता हैं। खेदजनक बात यह है कि यह बौद्धिक अत्याचार बंगाल के साम्यवादियों द्वारा ही प्रायोजित हैं। हम आशा करते है कि बंगाल के जन इस लेख को पढ़कर अपने पूर्वजों के बलिदानों का पुन: स्मरण करेंगे। 
 
विपल्व भूमि बंगाल को प्रमाण।


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