वर्तमान स्थिति को देखकर कुछ प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं। जैसे -

 


 


 


 


 



वर्तमान स्थिति को देखकर कुछ प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं। जैसे -
० चमत्कार दिखाने वाले लोग अब कहां है ?
० जिनके आशीर्वाद से कैंसर जैसे भंयकर रोग दूर हो जाते थे, वे बाबा आज कल कहां हैं?
० कृपा बरसाने वाले बाबा जिनकी कृपा से किस्मत चमक जाती थी, वे कहां है?
० तन्त्र-यन्त्र, टोने-टोटके, झाड़-फूंक, डाकिनी-साकिनी, भूत-प्रेत, पीर-मजार, मूर्ति आदि में शक्ति बताने वाले स्याने/पोप आदि कहां हैं ?
० आश्चर्य तो तब होता है जब स्वयं को पढ़ा-लिखा कहने वाला व्यक्ति ऊँचे-ऊँचे पदों पर विराजमान होते हुए भी उपरोक्त अवैज्ञानिक, अवैदिक, हानिकारक बातों में विश्वास करता है और स्वयं को बहुत बडा़ समझदार मानता है। और जो लोग तर्कहीन इस अन्ध विश्वास से छुड़ा सर्व कल्याणकारी, वैदिक, वैज्ञानिक और लाभकारी बातें बताते हैं उनका विरोध करता है।
० मूर्ति में शक्ति मानने वालों को वह इतिहास पढ़ना चाहिए जिसमें मन्दिरों को तोड़ा गया था।
० पीर/मजार पूजने वालों को उनमें दफन लोगों का इतिहास पढ़ना चाहिए कि ये कैसे लोग थे, इन्होंने क्या क्या काम किये, सम्भव है उससे इनको पूजने वालों की आंखे खुल जाय ।
० आज चिन्तन करने का समय मिला है। कुछ सैद्धान्तिक पुस्तकों का  स्वाध्याय करें, उपरोक्त प्रश्नों पर तर्क युक्त विचार करें, वैदिक विचार धारा से जुड़े हुए लोगों से सम्पर्क करें ( वर्तमान समय में फोन से सम्पर्क करें) तो सम्भव है कुछ सही मार्ग मिले।
० हम सब इन बातों पर विचार करें तो पायेंगे कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा बताया वेद मार्ग ही सभी समस्याओं का समाधान है। 
० वर्तमान स्थिति से मुक्त होने के लिए स्वच्छता, शाकाहार, आयुर्वेद, यज्ञ और योग ही समाधान है। आदि काल से जब तक इस सब बातों का ध्यान रखा गया तब तक प्राणी मात्र सुखी और सम्पन्न रहा। हमें पुनः आयुर्वेद आदि वैदिक मान्यताओं को जीवन में अपनाना होगा। अर्थात् हमें फिर से वैदिक जीवन शैली अपनानी पड़ेगी तभी हम सुखी हो पायेंगे।
० हमारे सुख और दुःख का आधार कर्म होता है, कर्म करने के लिए सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं लेकिन फल पाने के लिए स्वतन्त्र नहीं है कुछ कर्मों का फल माता, पिता, आचार्य, अधिकारी और न्यायाधीश आदि प्रदान करते है और शेष सभी कर्मों का फल परमेश्वर देता है, एक बात और ध्यान देने योग्य है - यदि अधिकारी न्यूनाधिक न्याय करे तो उसका न्याय भी परमेश्वर करता है और न्यायाधीश भी अन्याय करे तो उसका न्याय भी परमेश्वर करता है, अन्ततः किसी के साथ अन्याय नहीं होता है
० कर्म ज्ञान से होता है और ज्ञान मनुष्य के पास स्वयं का नहीं है। ज्ञान स्रोतों से एकत्रित किता जाता है। मनुष्य सही स्रोतों से सही और गलत स्रोतों से गलत ज्ञान एकत्रित कर लेता है और उसी के आधार पर सही और गलत कर्म करता है और सुख दुःख पाता है।
 ० ज्ञान का आदि और सही स्रोत वेद ही है इसीलिए वेद ज्ञान के आधार पर किया हुआ कर्म ही सुख देता है।
० इसीलिए वेद कर्म करने का उपदेश करता है - 


कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। ( यजुर्वेद )
       मनुष्य (इह) इस संसार में (कर्माणि) धर्मयुक्त वेदोक्त निष्काम कर्मों को (कुर्वन्) करता हुआ (एव) ही ( शतम्) सौ (समाः) वर्ष (जिजीविषेत्) जीवन की इच्छा करे (एवम्) इस प्रकार धर्मयुक्त कर्म में प्रवर्तमान (त्वयि) तुझ (नरे) व्यवहारों को चलानेहारे जीवन के इच्छुक होते हुए (कर्म) अधर्मयुक्त अवैदिक काम्य कर्म (न) नहीं ( लिप्यते) लिप्त होता (इतः) इस से जो ( अन्यथा) और प्रकार से (न, अस्ति) कर्म लगाने का अभाव नहीं होता है।
       अर्थात् मनुष्य आलस्य को छोड़कर सब देखनेहारे न्यायाधीश परमात्मा और करने योग्य उसकी आज्ञा को मानकर शुभ कर्मों को करते हुए अशुभ कर्मों को छोड़ते हुए ब्रह्मचर्य 
के सेवन से विद्या और अच्छी शिक्षा को पाकर उपस्थ इन्द्रिय के रोकने से पराक्रम को बढ़ाकर अल्पमृत्यु को हटावे, युक्त आहार विहार से सौ वर्ष की आयु को प्राप्त होवें। जैसे जैसे मनुष्य सुकर्मों में चेष्टा करते हैं वैसे ही पाप कर्म से बुद्धि की निवृत्ति होती है और विद्या, अवस्था और सुशीलता बढ़ती है। 
० वैदिक मान्यताओं को सहजता से समझने के लिए और  वैचारिक क्रान्ति के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज का अमर ग्रन्थ "सत्यार्थ प्रकाश" अवश्य पढ़ें/पढ़ायें।
० इस आपत्ति काल में जो तन, मन और धन से मानव और मानवता की रक्षा कर रहे हैं, हम उनका हृदय से धन्यवाद करते हैं।


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