वैदिक परम्परा में वर्ण किसे कहते हे

 


 



 


. वर्ण


वर्णका अर्थ-गुण और कर्म के योग को ही वर्ण कहते ।


अर्थात् जिस व्यक्ति के जैसे गुण-कर्म हों उसे वैसा ही अधिकार दिया जाना चाहिये। 


वर्ण का निर्धारण-वर्ण का निर्धारण गुरुकुल में पच्चीस वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद गुरुओं द्वारा किया जाता है। वर्ण का निर्धारण जन्म और वर्तमान में प्रचलित जाति के आधार पर नहीं वरन् मनुष्य के कर्म के आधार पर होता है।


वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य-मानवसमाज को सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए ही वर्ण-व्यवस्था की गई है। 


 वर्ण के भेद-वैदिक - मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक समाज में सभी मनुष्यों को गुण-कर्म के अनुसार चार वर्गों में विभाजित किया गया है-१. ब्राह्मण, २. क्षत्रिय, ३. वैश्य और ४. शूद्र। इन चारों वर्गों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है


. 1ब्राह्मण-पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकारी, जितेन्द्रिय, सदा सत्यवादी तथा विद्या और धर्म के प्रचार-प्रसार में तत्पर रहनेवाल मनुष्य ब्राह्मण-वर्ण में आते हैं


 ब्राह्मण के मुख्य कर्त्तव्य इस प्रकार हैं-विद्या पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना तथा दान लेना-देना। इनके अतिरिक्त मन से कभा १ कर्म को इच्छा भी न करना, मन को अधर्म में कभी न लगाना तथा इन्द्रियों को अधर्म से रोककर सदैव धर्म (परोपकार) में ही लगाना,


२. क्षत्रिय-विद्वान्, बलवान, वीर. न्यायकारी मनुष्य क्षत्रिय-वर्ण में आते हैं।


क्षत्रिय के मुख्य कर्तव्य इस प्रकार हैं-न्यायपूर्वक प्रजा का करना, श्रेष्ठ मनुष्यों विद्या और धर्म के कार्यों में पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-करा को बलवान रखना, युद्ध में कभी भयभी श्रेष्ठ मनुष्यों का सत्कार तथा दुष्ट मनुष्यों का तिरस्कार करना धर्म के कार्यों में धन का व्यय करना, वेदादि शास्त्रों का बाना यज्ञ करना-कराना, जितेन्द्रिय रहकर शरीर और आत्मा बना. यद्ध में कभी भयभीत न होना और विजय-प्राप्ति तक धैर्यपूर्वक युद्ध करना, शत्रु को हर नीति से पराजित करना. अपनी परी करना. पक्षपातरहित होकर सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करना, आदि।


३. वैश्य-विद्वान् तथा कृषि, पशुपालन और व्यापार में चतुर मनुष्य वैश्य वर्ण में आते हैं।


३. वैश्य-विद्वान् तथा कृषि, पशुपालन और व्यापार में चतुर मनुष्य वैश्य वर्ण में आते हैं। वैश्य के कर्त्तव्य इस प्रकार हैं-गाय तथा अन्य हितकारी पशुओं का पालन और उनकी वृद्धि करना, विद्या और धर्म की वृद्धि करनेकराने के लिए धन का व्यय करना, कृषि और व्यापार करना, आदि।


४.शूद्र-विद्या-विहीन और उपर्युक्त वर्णों के कर्म न करनेवाले मनुष्य शूद्र वर्ण में आते हैं। - शूद्र का कर्तव्य है कि वह अन्य तीनों वर्गों की सेवा किया करे, क्योंकि वह विद्यारहित होने के कारण वेद-विद्या, ज्ञान-विज्ञान, देश-रक्षा, व्यापार, आदि कर्म नहीं कर सकता


शूद्र को चाहिये कि वह निन्दा, ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान, क्रोध, आदि दोषों को त्यागकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के मनुष्यों की यथावत् सेवा किया करे, और उस सेवा-कर्म से ही अपना जीवन-निर्वाह करे।


 


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