उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है, धन संपत्ति का कम।


       


 



 


 


 


 


उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है, धन संपत्ति का कम।
        दो मित्र थे, मोहन और महेश। अनेक विषयों में उनके विचार मिलते थे, और किसी-किसी बात में नहीं भी मिलते थे। (क्योंकि संसार में ऐसा देखा जाता है कि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के विचार 100 %  एक समान नहीं होते। कहीं न कहीं, कुछ-न-कुछ अंतर तो होता ही है।) 
           फिर भी अनेक  विषयों में मोहन और महेश के विचार मिलते थे, इस कारण उनकी मित्रता बन गई। दोनों पढ़े लिखे और बुद्धिमान थे। परोपकारी स्वभाव के भी थे । दोनों में अंतर यह था कि मोहन की रुचि धन संपत्ति इकट्ठी करने में अधिक थी। परंतु महेश की रुचि उत्तम आचरण में अधिक थी। 
          अपनी रुचि के अनुसार मोहन ने व्यापार करके धन संपत्ति जमा की, और महेश ने उत्तम आचरण करके पुण्य जमा किया। संसार के बुद्धिमान लोगों ने उन दोनों का परीक्षण किया और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार दोनों को नंबर दिए। मोहन के नंबर कम रहे। महेश के नंबर अधिक रहे। क्या आप सोच पाएंगे, कि  ऐसा क्यों हुआ? 
इसलिए कि धन संपत्ति का मूल्य कम है, और उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है। क्योंकि धन संपत्ति से सुविधाएं तो मिलती हैं, परंतु शांति नहीं मिलती। जबकि उत्तम आचरण करने से स्वयं को और दूसरों को भी शांति मिलती है।
इसलिये सुविधाओं की अपेक्षा शांति का मूल्य अधिक होने से, मोहन की अपेक्षा महेश को नंबर अधिक मिले। 
       अब मृत्यु के बाद अगले जन्म में, ईश्वर भी उन दोनों को नंबर देगा। तो आप समझ ही गए होंगे, कि ईश्वर भी किसको नंबर कम और किसको अधिक देगा?
          ईश्वर भी अगले जन्म में मोहन को नंबर और सुविधाएं कम देगा। तथा महेश को नंबर और सुविधाएं अधिक देगा।  यही न्याय है।
           अब आप यदि स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं, तो विचार करें, कि मोहन का अनुकरण किया जाए, या महेश का?
                             


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