सब रिश्ते स्वार्थ से जुड़े हैं

 


                                                                             


 


 


 


 


 


सब रिश्ते स्वार्थ से जुड़े हैं


मृत्यु से मृत व्यक्ति को इतना दु:ख नहीं होता जितना पीछे अवशिष्ट उसके सगे-सम्बन्धियों को होता दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि 'जाने वाला' तो सब दु:खों से छूट गया किन्तु इस संसार से विदा हो वह दूसरों के दु:ख का कारण अवश्य बन गया। इस प्रश्न को भी भावुकता की दृष्टि से नहीं अपितु तात्त्विक दृष्टि से विचारना चाहिए।


"मृत्यु और परलोक" नामक पुस्तक में महात्मा नारायण स्वामी लिखते हैं―"जगत् में प्राणियों के वियुक्त होने पर जो दु:ख अवशिष्ट परिवार को हुआ करता है, उसका हेतु यह नहीं होता कि वियुक्त प्राणी उन्हें बहुत प्रिय था, बल्कि असली कारण यह होता है कि वियुक्त प्राणी के साथ अवशिष्ट परिवार के स्वार्थ जुड़े थे और वियोग स्वार्थसिद्धि में बाधक होता है। बस, असली दु:ख इतना ही होता है कि स्वार्थहानि हुई। जिसे पुत्र का शोक है, वह केवल इसलिए कि उसने पुत्र को बुढ़ापे की लाठी समझ रखा था। पुत्र क्या मरा, उसके बुढ़ापे की लाठी छिन गई। अब चिन्ता केवल इस बात की है कि बुढ़ापे में सहारा कौन देगा?....अत: यह स्पष्ट है कि जिसे मृत्यु का शोक कहते हैं वह शोक असल में बन्धु-बान्धवों के लिए नहीं, किन्तु अपने ही स्वार्थ में बाधा पहुँचने से किया जाता है।"
बृहदारण्यकोपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को विस्तार से इस स्वार्थवृत्ति के सम्बन्ध में उपदेश दिया है―


न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्ति।
आत्मनस्तु कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्ति।।
―(बृहदार० उप० ४/५/६)
भावार्थ―निश्चय ही पुत्रों की कामना के लिए (माता-पिता) को पुत्र प्रिय नहीं होते किन्तु अपनी कामना के लिए ही पुत्र प्रिय होते हैं, आदि।


अत: मृत्युजन्य दु:ख का एक कारण स्वार्थहानि है। जो मनुष्य इस स्वार्थवृत्ति को जितना कम कर सके उसे उतना ही कम मृत्युदु:ख अनुभव होगा। फिर पिता-पुत्रादि सम्बन्ध का आधार क्या है? शरीर और आत्मा के वियोग होने पर यह सम्बन्ध टूट जाता है तब इन सम्बन्धों की भी कोई वास्तविक सत्ता शेष नहीं रहती, अत: उनके लिए दु:खी होना केवल ममता या मोह ही कहा जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि "मरनेवाले के लिए रोना-पीटना, दु:खित और क्लेशित होना व्यर्थ और सर्वथा अनावश्यक है। बल्कि इसके विपरित, अवशिष्ट परिवार को यह सोचना चाहिए कि एक वस्तु ईश्वर की थी, उसने उसे जब चाहा ले लिया।"


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