पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का संस्कृत से अद्वितीय लगाव [युवाओ के प्रेरणास्रोत]

 



 


 


 



पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का संस्कृत से अद्वितीय लगाव [युवाओ के प्रेरणास्रोत]
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एक दिन गुरुदत्त अपने सहपाठी तथा चेतनानंद के घर गया। वहाँ मनुस्मृति रखी थी। उसे पाँव से ठुकराकर बोला ,"चेतनानंद ! किस गली-सड़ी एवं मातृभाषा में लिखी पुस्तक पढ़ते हो? "


ईश्वर की लीला देखिए। थोड़े ही दिनों पश्चात स्वयं गुरुदत्त पर संस्कृत का जादू हो गया। उसके ह्रदय में संस्कृत पढ़ने की लालसा पैदा हो गई। श्रेय गया स्कूल में इतिहास पढ़ाने वाले उस अध्यापक को जो इतिहास पढ़ाते समय अनेक अंग्रेजी शब्दों का मूल संस्कृत में बताया करता था।


उसके पश्चात संस्कृत की ऐसी लगन लगी कि संस्कृताध्यापक भी उनकी शंकाओं का समाधान नहीं कर पाते थे और एक दिन तो गुरुदत्त को झिड़क कर कक्षा से बाहर ही निकाल दिया।


अब जल की धारा अपना मार्ग स्वयं बनाने निकल पड़ी।


सर्वप्रथम डॉo बेलनटाइन कृत "Easy Lessons in Sanskrit Grammar " पढ़ा।


संयोगवश तभी दयानन्द सरस्वती की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका हाथ लग गई। उसका संस्कृत भाग शब्दकोष की सहायता से पढ़ लिया। फिर क्या था ! संस्कृत पढ़ने की रूचि बढ़ती चली गई ।


ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का पारायण कर आर्यसमाज मुलतान के अधिकारियों से जा कहा - "मेरी अष्टाध्यायी तथा वेदभाष्य पढ़ने का प्रबंध कर दो अन्यथा मैं जनता में प्रसिद्ध कर दूंगा कि तुम्हारे एक भी व्यक्ति में संस्कृत पढ़ाने की योग्यता नहीं है। तुम केवल संस्कृत का ढोल पीटते हो। " विचित्र बालक है। किस चपलता से संस्कृत अध्ययन का प्रबंध करवा रहा है ?


आर्यसमाजियों में भी खूब उत्साह था। तत्काल पंडित अक्षयानंद को मुलतान बुलाया गया।


भक्त रैमलदास और गुरुदत्त आदि ने संस्कृत पढ़नी आरम्भ कर दी।


गुरुदत्त को अष्टाध्यायी पढ़ने की इतनी रूचि थी कि एक बार पूर्णचन्द्र स्टेशन मास्टर बहावलपुर के निमंत्रण पर पंडित अक्षयानंद वहां चले गए तो वह किराया खर्च कर पढ़ने के लिए बहावलपुर ही पहुँच गया परन्तु इतिहास की फिर पुनरावृत्ति हुई। पंडित अक्षयानंद भी उसे पढ़ाने में असमर्थ सिद्ध हुए।


गुरुदत्त कोई साधारण विद्यार्थी तो था नहीं। उसकी संतुष्टि न हो सकी। डेढ़ माह में डेढ़ अध्याय अष्टाध्यायी का पढ़ने के पश्चात अक्षयानंद से पढ़ना छोड़ दिया।


शेष अष्टाध्यायी सभवतः ऋषि दयानन्द के वेदांगप्रकाश की सहायता से स्वयं पढ़ी। सम्पूर्ण अष्टाध्यायी नौ मास में पढ़ लिया। कॉलेज में प्रविष्ट होने से पूर्व अष्टाध्यायी पर उनका अच्छा अधिकार था।


--सन्दर्भ : डॉ रामप्रकाश जी की पुस्तक -"पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी


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