पञ्चमहायज्ञ


                                 


साभार -धर्म शिक्षा 


लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती 


   


 


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पञ्चमहायज्ञ


परिवारों में पञ्चमहायज्ञ अवश्य होने चाहिएँ


प्रत्येक घर में पाँच स्थान ऐसे हैं,  कछ हिंसा जाने-अनजाने हो ही जाती है।


वे स्थान _चल्हा, चक्की, झाड़, ओखली और पानी का घडा।


जीवन में कुछ पुण्य का सञ्चय भी करना चाहिए।


उस पुण्य सञ्चय के लिए पञ्चमहायज्ञ हैं


आपत्ति और विपत्ति में भी इन्हें त्यागना नहीं चाहिए


इन्हीं पञ्चमहायज्ञों से स्वर्ग सुख-विशेष और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।


वे पाँच महायज्ञ निम्न हैं


१. ब्रह्मयज्ञ-परमपिता परमात्मा की उपासनाप्रतिदिन सन्ध्या करना तथा वेद का स्वाध्याय करना ब्रह्मयज्ञ कहलाता है।


२. देवयज्ञ-प्रतिदिन अग्निहोत्र करना। मनुष्य अपने मल-मूत्र और श्वास द्वारा वायु को दूषित करता हैअपने सुख के लिए पशु-पालन करता है, उनके द्वारा भी वायु-प्रदूषण होता है। आज तो मोटरोंकारों, रेलों, फैक्ट्रियों, कारखानों द्वारा भयङ्कर प्रदूषण हो रहा है। इस प्रदूषण को दूर करने का एक उपाय है-अग्निहोत्र करो। प्रत्येक व्यक्ति कम-सेकम सोलह-सोलह आहुति अवश्य दे। गाय का और उत्तमोत्तम सामग्री आदि का हवन करने से वायु प्रदूषण दूर होता है। 


३. पितृयज्ञ-जीवित माता-पिता, दादा-दादीपरदादा-परदादी-इनकी सेवा करना। वस्त्र, अन्नजल से उन्हें सदा सन्तुष्ट रखना। मरे हुए व्यक्तियों के नाम पर धूम्रपान करनेवाले, आचारहीन, बिना पढ़े लिखे तथाकथित ब्राह्मणों को भोजन कराना व्यर्थ हैसावधान! बिना पतेवाला पत्र अपने गन्तव्य स्थान पर नहीं पहुँच सकता।


४. अतिथियज्ञ-जिसके आने-जाने की कोई तिथि न हो, जो वेदादि शास्त्रों का विद्वान् हो, लोगों को धर्मोपदेश देकर उन्हें सन्मार्ग में चलानेवाला हो, ऐसे व्यक्ति को अतिथि कहते हैं। ऐसा अतिथि कभी घर पर आये तो वस्त्र, अन्न-पान आदि के द्वारा उसका भी सत्कार करना चाहिए।


५. बलिवैश्वदेवयज्ञ-जब भोजन पक जाए तो क्षार और लवणान्न को छोड़कर चूल्हे की अग्नि में दस आहुतियाँ देनी चाहिएँ तथा कौआ, कुत्ता, कीट-पतङ्ग, अशक्तजन आदि को भी अन्न आदि देना चाहिए।


साभार -धर्म शिक्षा 


लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती 


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