महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मृति भवन न्यास जोधपुर का इतिहास.

 


 


 


 


 


 


 



महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मृति भवन न्यास जोधपुर का इतिहास.


 


इस भवन का निर्माण 1840 ई0 में जोधपुर के तत्कालीन नरेश ने बनवाया । उस समय के महाराजा ने अपने खास मर्जीदान और दीवान मियां फैजुल्ला खान को रहने का निवास बनाया ।इसका नाम मियां फैजुल्ला खान की कोठी से जाना जाता था ।
आजादी के बाद इस भवन को सन 1972 में राजस्थान सरकार ने ऋषि दयानंद के निवास स्थान होने के कारण स्मारक रूप में आर्य समाज को प्रदात किया व इसको महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मृति भवन न्यास जोधपुर के नाम से जाना जाता है व आर्य समाज की गतिविधियो का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है ।
ऋषि दयानन्द जी 28 मई सन 1883 को अजमेर से रवाना हो कर पाली होते हुए जोधपुर राज्य में 31 मई 1883 को पधारे तथा ईसी भवन में साढ़े चार माह तक विराजे ।तथा इस महल की भूमि पर घूम घुम कर पवित्र किया ।यहां के दरवाजे खिड़किया कमरो ने ऋषि की हर गतिविधियों को निहारा ।
इन साढ़े चार माह में ऋषि ने जोधपुर वासियो को उपदेश में निराकार ईश्वर, उपासना,सदाचार का पालन,गौ रक्षा, बालविवाह,श्राद्ध, व मूर्ति पूजा का खंडन किया।राजा को सदाचारी व न्याय प्रिय होना चाहिये ।इस कारण निजी स्वार्थ वाले व्यक्ति मूर्ति पूजा का खंडन व वेश्यावृत्ति के खण्डन से ऋषि के विरोधी हो गए । वेश्यावृत्ति पापरूप कीचड़ से कई को निकाला ।
जोधपुर के तत्कालीन महाराजा को एक वेश्या नन्ही भगतन के साथ देख कर ऋषि ने महाराजा को इस कीचड़ से निकलने की सलाह दी तो नन्ही भगतन ऋषि रूपी कांटे को भगाने का प्लान बनाने की सोचने लगी ।
आखिर वो दुखद घड़ी 29 सितम्बर 1883 तारीख आ गई जैसा ऋषि ने पहले सोचा था ।यहां के मूर्तिपूजक , राजा के मुस्लिम सहलाकर और वेश्या नन्ही भगतन मिलकर षड्यंत्र रचकर रसोइये जगन्नाथ को विश्वास में ले कर रात के दूध में विष पिला दिया । हमारे ऋषि को कुछ देर में एहसास हो गया कि जगन्नाथ को लालच देकर कुछ पिला दिया है । ऋषि के पेट मे प्रबल दर्द व उल्टियां होने लगी ।
30 सितम्बर 1883 को सुबह ऋषि नही उठे तो अन्य सेवको को चिंता हुई। तब तक पता चला शरीर मे जहर फेल चूक था । ऋषि की महानता देखो कि दुष्ट जगन्नाथ को बुलाकर कहा , तुमने ये क्या किया मेरे साथ ,मेरा सारा काम अधुरा ही रह जायेगा व कितना नुकशान किया । तुम्हे यहां सजा देगे लो ये पैसे व भाग जाओ यहां से ।
1 अक्टूम्बर 1883 से 15 अक्टूबर 1883 तक ऋषि का उपचार यहां के डाक्टर अली मरदान जो यहाँ के राजकीय अस्पताल में नियुक्त थे कराया पर स्वास्थय बिगड़ते ही गया क्योंकि नन्ही भक्तन व कुछ स्वार्थी व्यक्तियों ने उसको भी लालच दे दिया जिससे उनका शरीर बिल्कुल जर जर हो गया ।
आखिरकार 16 अक्टूबर 1883 को उस समय के भक्तों की सलाह पर जोधपुर से माउंट आबू के लिए विदा हो गये । आर्य जगत में जोधपुर का नाम ऋषि भक्तो के लिए बदनाम हो गया ।
प्यारो ऋषि भक्तो क्या आप इस पवित्र भवन को नमन करन केे लिये जीवन मे एक बार जोधपुर जरूर पधारे।यह भवन आप के लिये 12 महीने 24 घंटे खुला मिलेगा तथा आपके निवास की पूरी सुविधा है व यहां के ट्रस्टी आपका स्वागत करेंगे ।
इस पवित्र स्थान पर कई कार्यो का निर्माण बिना मूल भवन को छति पहुचाये किये जा रहे है जिसमे आप सहयोग भी कर सकते है ।


sarvjatiy parichay samelan,marigge buero for all hindu cast,love marigge ,intercast marigge 


 rajistertion call-9977987777,9977957777,9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app


Popular posts from this blog

वैदिक धर्म की विशेषताएं 

ब्रह्मचर्य और दिनचर्या

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।